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आद्य शंकराचार्य

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सहस्रों वर्ष की बात है. सर्वशास्त्र-निष्णात श्रीशिवगुरु नामक एक अत्यन्त पवित्र धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे. उनकी पत्नी का नाम सुभद्रा था. सुभद्र देवी धर्म की मूर्ति जैसी थीं. अधिक आयु व्यतीत होने के बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई. पुण्यमयी देवी ने भगवान आशुतोष शिव की आराधना आरम्भ की.शशांकशेखरसंतुष्ट हुये और वृद्धावस्था में उनकी कोख से एक अत्यंत तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ.

कहा जाता है, भगवान शंकर ही उपासना से तुष्ट होकर, उक्त महिमामय बालक के रूप में अवतरित हुये. इनकी जन्मभूमि अब भी निश्चित नहीं हो सकी. कुछ लोगों का कहना है कि ये मालाबार प्रदेश में उत्पन्न हुये थे और कुछ लोग कर्णाटक देशांतर्गत तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती श्रंगभेरी नामक नगर को इनकी जन्मभूमि बताते हैं. बहुत छोटी आयु में ही इनके पिता का शरीर शांत हो गया.

बालक शंकर असामान्य मेधावी थे. उनकी स्मरणशक्ति अत्यंत तीक्ष्ण और बुद्धि प्रखर थी. एक वर्ष की आयु में ही उन्होंने मातृभाषा की वर्णमाला कंठस्थ कर ली थी. द्वितीय वर्ष में पुराण और काव्य पढ़ने चले गये थे. पंचम वर्ष में इनका यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हुआ और विद्याध्ययन के लिए ये गुरुगृह चले गये. इन्हें पढ़ाने में गुरु को कुछ भी श्रम नहीं होता था. अपने सहपाठियों को तो ये स्वयं पढ़ा दिया करते थे.

सात वर्ष की आयु पूरी करते-करते तो इन्होंने चारों वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण, इतिहास, काव्य और अलंकार प्रभृति शास्त्रों को अच्छी तरह पढ़ ही नहीं लिया अपितु इन विषयों के पूरे पण्डित हो गये. इतनी छोटी उम्र और अदभुत बुद्धि! जो देखता, वही चकित हो जाता. इनके तर्क और प्रमाण के सामने बड़े से बड़े विद्वान को भी पराजय स्वीकार करनी पड़ती थी.

थोड़े ही दिनों में इनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गयी. बड़े-बड़े नरेश इनके दर्शनार्थ आते. केरल नरेश ने इनके चरणों में विविध धर्मोपदेश प्राप्त किये. नरेश ने इन्हें विपुल धनराशि देनी चाही, किन्तु इन्होंने यह धन धनहीनों में वितरित कर दो, मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है, कहकर उसे लौटा दिया. विद्या इनके जीवन में उतर रही थी. ये निःस्पृह तो थे ही, संन्यास लेने का निश्चय किया, किन्तु स्नेहमयी जननी कांप उठी. जर्जर काया से नयन-पुतली किस प्रकार पृथक की जाये! पुत्र को छोड़कर प्रेममयी जननी किस प्रकार जीवित रह सकेगी.

एक दिन शंकराचार्य गांव से कुछ दूर किसी स्वजन के यहां गये थे. मार्ग में एक छोटी सी नदी पड़ती थे. नदी में जल कम था. नाव की आवश्यकता नहीं थे, इसलिए वे पार हो गये. उनकी माता भी साथ ही थी. आते समय नदी वर्षा के जल से उमड़ पड़ी थी. मां के साथ ये पार आ रहे थे. पानी कंठ तक आ गया और ये बहने लगे. इनकी माता घबरायीं. समय देख कर इन्होंने चट से कहा …….. ‘मां! भगवान संन्यासी से प्रसन्न रहते हैं. यदि तुम मुझे संन्यास ले लेने की आज्ञा दे दो तो इस विपत्ति से मुक्ति मिल सकती है.

विचार के लिए अवकाश नहीं था. पुत्र स्नेह कातर जननी ने आज्ञा दे दी. फिर दूने उत्साह से माता के साथ पार हो गये. मैं समय-समय पर स्वयं आकर भेंट करता रहूंगा. इत्यादि वाक्यों से माता को आश्वासन देकर वे पुण्यतोया नर्मदा की ओर चल पड़े.

नर्मदा तट पर जाकर उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्द भगवत्पाद से संन्यास की दीक्षा ली. गुरु ने इनका नाम भगवत्पूज्यपदाचार्य रखा. गुरु के बताये मार्ग से वहां ये शीघ्र ही योगसिद्ध हो गये. गुरु ने इन्हें काशी जाकर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य करने की आज्ञा दी.

गुरु के आदेशानुसार आचार्य शंकर काशी पधारे. वहां चण्डाल वेश में भगवान शंकर ने इन्हें दर्शन दिया. आचार्य ने उन्हें पहचानाऔर चरणों में पड़ गये. फिर तो करुणामय पार्वतीवल्लभ प्रकट हो गये. शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा.

एक दिन सहसा एक वृद्ध ब्रह्मण उपस्थित हुये और एक सूत्र के अर्थ पर शंका कर बैठे. शंकराचार्य ने उत्तर दिया. पुनः शंका हुई, शास्त्रार्थ प्रारम्भ हो गया और वह आठ दिनों तक चलता रहा. पद्यपादाचार्य जो आचार्य शंकर के काशी में प्रथम शिष्य थे और जिनका पूर्व नाम सनन्दन था, आश्चर्यचकित थे. मेरे गुरुजी जैसे अद्वितीय विद्वान से इतने दिनों तक शास्त्रार्थ करते रहने की क्षमता किसमें है.

उन्होंने ध्यानसमाधि से देखा तो पता चला कि ये तो भगवान व्यास वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उपस्थित होकर शास्त्रार्थ कर रहे हैं. तत्क्षण उन्होंने हाथ जोड़कर स्तुति की —

शंकरः शंकरः साक्षाद्

व्यासो नारायणः स्वयम्.

तयोर्विवादे सम्प्राप्ते न

जाने किं करोम्यहम्..

शंकराचार्य ने भगवान व्यास को पहचाना और उनके चरणों में गिर पड़े. अत्यंत प्रसन्नता से श्री व्यास जी बोले —

तुम्हारी आयु केवल सोलह वर्ष की है, वह समाप्त होने पर आयी है. सोलह वर्ष मैं तुम्हें अपनी ओर से देता हूं. धर्म की स्थापना करो.

आचार्य ने भगवान व्यास की आज्ञा का जीवन में अक्षरशः पालन किया. आचार्य जैसे बालक को जन्म देकर हिन्दू जाति कृतकृत्य हुई.

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