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संघ का अब होगा रूपांतरणकारी शक्तियों पर ध्यान

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केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनते ही यह प्रश्न पूछा जाने लगा कि अब संघ क्या करेगा. यह अस्वभाविक नहीं है. जैसी धारणा होती हैवैसी ही जिज्ञासा और प्रश्न उत्पन्न होते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के विमर्श में तथ्यों,वास्तविकताअसलियत से कम छविधारणा और अभिप्रायों से कहीं अधिक देखा जाता रहा है. धारणा यही है कि संघ पीछे से राजनीति करता है और छवि यही बनायी गयी है कि यह अल्पसंख्यकों के प्रति असहनशील और संवदेनहीन है. इसलिये उपरोक्त प्रश्न का पहला पक्ष रिमोट कन्ट्रोल” सिद्धांत पर आधारित है. क्या यह सरकार चलायेगाइस प्रश्न का उत्तर जो भी हो, अविवादित नहीं हो सकता है. परन्तु दूसरा प्रश्न कहीं अधिक गम्भीर और महत्व का है. इसका भविष्य का वैचारिक एजेंडा क्या होगा?

पहला प्रश्न इस बात पर आधारित है कि संघ का मूल पिंड राजनीतिक है. जबकि सच्चाई यह है कि संघ और राजनीति का संबंध परिवर्तनशील है. यह स्थायी भाव नहीं है. यदि स्थायी होता तो संघ स्वतंत्र शक्ति के रूप में खड़ा नहीं होता. संघ की स्थापना 1925 में हुई तब से दर्जनों छोटे-बड़े संगठनों का उत्थान और पतन हुआ. परन्तु संघ की जमीन दिनों-दिन बढ़ती ही गयी. समाचारों में संघ सिर्फ सत्ता के गलियारों में जाना-पहचाना जा रहा है, परन्तु इसका वास्तविक कार्य वंचितों, वनवासियों, मजदूरों, विद्यार्थियों के बीच फैला हुआ है. संघ राजनीति को अपने अनुकूल नहीं, समाज सापेक्ष बनाने के उद्देश्य से हस्तक्षेप करता है. लेकिन यह हस्तक्षेप इसकी मूल प्रकृति को परिवर्तित नहीं करता है. राजनीति से संन्यास लिए हुये लोगों एवं संगठनों को राजनीति में हस्तक्षेप देने के लिये बाध्य होना पड़ा. जयप्रकाश और विनोबा भावे इसके उदाहरण हैं. आजादी के पूर्व पंजाब के आर्य समाज और पंजाब कांग्रेस के बीच अंतर समाप्त हो गया था. लाला लाजपत राय इसका उदाहरण हैं.

भाजपा से संघ का संबंध कांग्रेस और सेवादल का जैसा संबंध न था, न है और न हो सकता है. सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह से राजनीति उत्पन्न होती है और उसका निरंतर परिष्कार होता है, उसकी दिशा निर्धारित होती है. संघ-भाजपा संबंध इसका जीता-जागता उदाहरण है. जिस संघ को जमींदारों और पूंजीपतियों का संगठन कहकर आलोचना की जाती थी, उसी संघ ने जनसंघ को जमींदारी उन्मूलन विधेयक का समर्थन करने की नीतिगत प्रेरणा दी थी. राजस्थान में जनसंघ ने अपने शैशवकाल में ही आठ में से पांच विधायकों को इसलिये दल से निकाल दिया था कि वे जमींदारी व्यवस्था के समर्थक थे. एक और घटना उल्लेखनीय है.1945 के चुनाव में नागपुर में संघ के नजदीकी बाबा साहेब घटाटे ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया.1945 की राजनीतिक परिस्थिति में कांग्रेस का कमजोर होना देश के हित में नहीं था. संघ ने घटाटे को उम्मीदवारी वापस लेने का निर्देश दिया और ऐसा हुआ भी. इस पर संघ के नजदीकी और हिन्दू महासभा के नेता डा. बी.एस. मुंजे ने अपनी डायरी में लिखा था कि “मैं आश्चर्यचकित हूं कि संघ इस प्रकार का वाह्यात काम करता है.” वही मुंजे 1934 में चुनाव के दौरान संघ के द्वारा उनका और उनके समर्थन में प्रचार के लिये आए मदन मोहन मालवीय को विरोधियों के पथराव से बचाने के लिये अनुग्रहीत थे जो आज संघ से प्रसन्न हैं, वह कल भी संघ के प्रति वैसा ही भाव रखेगा, यह कोई ज्योतिषी नहीं बता सकता है. संघ परजीविता के भाव से मुक्त संगठन है. इसी में संघ आगे क्या करेगा, इस प्रश्न का भी उत्तर निहित है. यह प्रश्न पहली बार सामने नहीं आया है. हिन्दू महासभा और संघ में काफी वैचारिक समानता थी. महासभा के पास बड़े साइन बोर्ड वाले नाम थे- सावरकर, भाई परमानन्द, डा. मुंजे आदि. उनके समानान्तर संघ के पास एक भी नाम नहीं था. उनका दबाव था कि संघ महासभा के साथ काम करे. उन्हें निराशा तब हुई जब उनके द्वारा की गई संघ की आलोचना को इतिहास ने गलत साबित कर दिया.

वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन अहम और गुणात्मक रूप से भिन्न है. एक विचारधारा पर आधारित पार्टी को जनादेश मिला है. परिवर्तन के इन अर्थों को समझना पड़ेगा. साठ के दशक के बाद बौद्धिक जगत पर मार्क्सवाद-नेहरूवाद का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. राष्ट्रवादी विचारक के.एम. मुन्शी का विद्या भवन इसके प्रतिरोध की अंतिम कड़ी था. पूरा विमर्श वैचारिक रूप से एकतरफा एवं सत्तावादी राजनीति से प्रेरित हुआ. इस विमर्श ने संघ के विचारों को कोई स्थान नहीं दिया. उसके स्थान पर महिला विमर्श, दलित विमर्श की तर्ज पर संघ विमर्श शुरू हो गया. अर्थात् संघ कितना अच्छा, कितना बुरा? बौद्धिक विमर्श कितना असंतुलित और विकलांगता का शिकार था – इसका प्रमाण है संघ के समर्थन में कुछ छपना इसके समर्थक और विरोधियों दोनों के बीच कौतूहल का विषय होता रहा.

पिछले दशकों में देश का आर्थिक विकास, औद्योगिक नीति जैसे विषय उपेक्षित रहे और पूरी बौद्धिकता साम्प्रदायिकताऔर धर्मनिरपेक्षता के चारों ओर घूमने लगी. ऐसा लगा कि भारतीय राज्य, समाज और राष्ट्र कल ही बना हो. इसमें धर्म निरपेक्षता स्थापित करने का संघर्ष चल रहा हो. पिछले दशक में सच्चर कमेटी, धर्म परिवर्तन, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे विषय संस्थागत हो गये. यहां तक कि अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय तक बना दिया गया था. अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक अवधारणा को संघ ही नहीं भारत की संविधान सभा ने भी देश की एकता व अखंडता के लिये जोखिम भरा बताकर नकारा था, पर वह स्थायी भाव बनता चला गया. मोदी सरकार के गठन ने ऐसी नकारात्मक प्रवृत्तियों एवं भावों को सहज रूप से ध्वस्त किया है. जनादेश इसके पक्ष में भी है.

एक लोकप्रिय राजनेता का व्यक्तित्व, विचार और वाणी अपने आप में अनेक सवालों का उत्तर भी होता है. इस संदर्भ में मोदी का वाराणसी का भाषण उल्लेखनीय है. गंगा-प्रदूषण का सवाल तो अहम था ही. उन्होंने जिस सहजता से भारतीय इतिहास के असंतुलित स्वरूप पर प्रकाश डाला, उसे रेखांकित करने की आवश्यकता है, उन्होंने भारत की राजनीति और इतिहास के पन्नों में श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों के योगदानों के प्रति उपेक्षा का प्रसंग उठाया. यह घटना मात्र नहीं है. यह सिर्फ उनके मन की पीड़ा नहीं, बल्कि उस शासकीय विचाराधारा पर सकारात्मक प्रहार भी है जो संकीर्णता के दर्पण में इतिहास और राष्ट्र को देखता रहा. तिलक युग का उन्होंने जिस सम्मान के साथ उल्लेख किया वह विमर्श के गुणात्मक बदलाव का पहला बड़ा संकेत है.

संघ को 1948 से निरंतर नकारात्मक प्रवृत्तियों से लड़ने के लिये अपनी ऊर्जा क्षय करनी पड़ती रही. इसने एक आलसी और सुविधाजीवी छद्मधर्मनिरपेक्षता उड़ेलती बौद्धिकता को जन्म दिया. यह यथार्थ से कटता गया. संघ विमर्श इसकी मूल संपत्ति बन गयी. यही उसके प्रगतिशील समाजवादी और जनवादी होने का आधार बन गया. उन्हें लगता रहा कि संघ परास्त हो रहा है. पर वे गांवों, जंगलों, रेगिस्तानों में बढ़ते भगवा प्रवाह और प्रभाव को देख नहीं पाये.

संघ राष्ट्र निर्माण को समाज-संस्कृति की रचना से जोड़ता है. इसीलिये सकारात्मक कार्यों में इसकी तत्परता देखी जा सकती है.1977 में जनता सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम चलाया, जिसे संघ के स्वयंसेवकों ने सफल बनाया तो आरोप लगाया गया कि संघ की घुसपैठ हो रही है. इतिहास बोध इसे गलत साबित करता है. नेहरू सरकार के खाद्य सचिव ने नेहरू को लिखा था कि खाद्य अभियान में संघ से सहयोग की आवश्यकता है. संघ 1948 में लगे प्रतिबंध से जला-भुना था. पर नेहरू के आग्रह पर संघ इसमें कूद पड़ा. क्या तब भी इसके राष्ट्रीय योगदान को घुसपैठ माना जायेगा ?

सकारात्मक वैकल्पिक पहल एवं नीतियों के दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन के लिये नवीन अवसरों के समय देश के सामने आर्थिक असमानता, जनसंख्या और पर्यावरण जैसे मुद्दे भी संघ को कम उद्वेलित नहीं करते हैं. संघ का यदि अस्तित्व शुद्ध राजनीतिक होता तो इसकी यात्रा में ठहराव आ गया होता. वस्तुत: संघ के मामले में ऐसा कतई नहीं है. इसके सामाजिक-सांस्कृतिक लक्ष्यों के अंतर्गत सरकारों का बनना-बिगड़ना महत्वपूर्ण प्रश्न तो है पर यह अंतिम प्रश्न नहीं है. वर्तमान वातावरण संघ के लिये प्रतिरोधी शक्तियों के स्थान पर रूपांतरणकारी शक्तियों पर ध्यान केन्द्रित करने का संकेत अवश्य देता है.

राकेश सिन्हा

 

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