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संस्कृति के सारस्वत साधक हरिभाऊ

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पुरातत्वविद पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की 100वीं जयंती (04 मई, 2020) पर विशेष

दिनेश पाठक

“भारतीय इतिहास मात्र कालक्रम का आकलन ही नहीं है, वरन् उसमें संस्कृति का सामाजिक स्वरूप भी सम्मिलित है. परंपरा से परिचित हुए बिना संस्कृति को नहीं समझा जा सकता है, अतः इतिहास लेखन में परंपरा, पौराणिक आख्यान और जन भावनाओं का विचार करना परम आवश्यक है, किंतु पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारतीय संस्कृति के इस पक्ष को इतिहास लेखन में सदैव नजरअंदाज किया है.

यह मानने वाले, पुरातत्वविद पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने सन् 1985 ई. में इतिहास संकलन परियोजना के अंतर्गत वैदिक कालीन विलुप्त सरस्वती नदी के मार्ग और उसके तटवर्ती नगरों, मंदिरों और घाटों के पुराअवशेष खोजने के लिए हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला में स्थित आदिबद्री से गुजरात में कच्छ तक की लंबी यात्रा के बाद पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था, कि प्रचलित धारणा अनुसार आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे. उन्होंने ऋग्वेद में वर्णित और महाभारत तथा पुराणों में पुण्यतमा के रूप में चर्चित पुण्य सलिला सरस्वती के उद्गम स्थल से लेकर उसके सिरसा जिले में दृषद्वती (हाकड़ा) नदी में विलीन होने और अंततः सिंधु में मिलने तक के अधिकांश मार्ग को प्रमाण सहित मानचित्र पर अंकित भी किया था. विस्तृत शोध के आधार पर डॉक्टर वाकणकर का मानना था कि चीन, मेसोपोटामिया और भारत में सभ्यता और संस्कृति का विकास एक साथ और समान परिस्थितियों में हुआ था तथा आर्यों के बाहर से आगमन की बहुप्रचलित धारणा सही नहीं है. क्योंकि पूर्व स्थापित मान्यताओं को एकाएक नहीं नकारा जा सकता था, इसलिए डॉ. वाकणकर के जीवन काल में उनकी इस शोध को पूर्ण मान्यता नहीं मिल सकी और लुप्त सरस्वती की खोज का कार्य पूर्ण होने के पूर्व ही 03 अप्रैल, 1988 को एक  पुरातत्व सम्मेलन के लिए सिंगापुर गए डॉ. वाकणकर का हृदयाघात से निधन हो गया. लेकिन,जनवरी 2020 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, डेक्कन कॉलेज, पी.जी. आर.आई. पुणे, फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्रीअहमदाबाद और संस्कृति विभाग, गुजरात के साथ आई.आई.टी. खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने विस्तृत भूगर्भीय शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि सिंधु सरस्वती सभ्यता कालीन स्थल धोलावीरा के उजड़ने का कारण हिमालय से निकलने और कच्छ के रण से होकर गुजरने वाली वेदवती सरस्वती नदी का सूख जाना ही था. इस शोध के उपरांत, 35 वर्ष पश्चात डॉ. वाकणकर की अवधारणा की पुष्टि हुई है.

युगपुरुष पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ना केवल एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरातत्ववेत्ता वरन एक प्रतिष्ठित कला आचार्य, मुद्राशास्त्री, साहित्यकार, इतिहासविद, भाषा एवं लिपिविद, अभिलेखविद और समाजसेवी संस्कृति साधक भी थे. 4 मई 1919 को नीमच (म. प्र.)में जन्मे डॉ. वाकणकर को पुणे विश्व विद्यालय द्वारा उनके शोध प्रबंध, “पेंटेड रॉक शेल्टर्स ऑफ इंडिया” पर पी. एच. डी.की उपाधि प्रदान की गई थी. अपने मित्रों और शिष्यों में हरिभाऊ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. वाकणकर को विश्वव्यापी प्रसिद्धि वर्ष

1957 में उनके द्वारा भोपाल के पास भीम बैटका नाम के प्रागैतिहासिक मानव आश्रय स्थल की खोज से मिली. सन् 1972 से 1977 तक लगातार इस पर शोध कार्य करके उन्होंने प्रागैतिहासिक शैल चित्र कला के क्षेत्र में इसे विश्व के महानतम आद्यमानव क्षेत्र के रूप में घोषित किया. इस स्थल की प्राचीनता तथा महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने जुलाई 2003 में इसे विश्व धरोहर की सूची में भी सम्मिलित किया है. यहां 700 से भी अधिक शैलाश्रय हैं, जिनमें से 400 शैलाश्रय विविध चित्रों से सज्जित हैं.

उन्होंने अपने जीवन काल में भारत, अमेरिका तथा यूरोप में 4000 से अधिक प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रयों की खोज की, शैल चित्रकला पर व्याख्यान एवं प्रदर्शनियों का आयोजन किया और वर्ष 1976 में अमेरिकन पुरातत्वविद आर. आर. ब्रुक्स के साथ शैल चित्रों पर “स्टोन एंड पेंटिंग्स ऑफ इंडिया” पुस्तक की रचना भी की. डॉक्टर वाकणकर का एक कहानी संग्रह और आर्य समस्या पर हिंदी व अंग्रेजी में पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं. वे इतिहास संकलन समीति और संस्कार भारती के महामंत्री, भारतीय संस्कृति अन्वेषण न्यास के अध्यक्ष भी रहे. वर्ष 1984 में उनके द्वारा अमेरिका में “इंडियाज कंट्रीब्यूशन टू द वर्ल्ड थॉट” शीर्षक से एक बृहद पुरातत्व प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसमें उनके द्वारा आधुनिक युग में की गई एक सौ तेईस खोजों का तस्वीरों के साथ संपूर्ण विवरण, प्राचीन भारतीय ग्रंथों के संदर्भित संस्कृत श्लोकों तथा उनके अंग्रेजी अनुवाद के साथ प्रदर्शित किया. उन्होंने अपनी पुरातत्व खोजों के आधार पर एक पुस्तक “ए लॉस्ट पैराडाइज” अंग्रेजी भाषा में विशेष तौर पर इसलिए लिखी ताकि सारा संसार भारत की प्राचीनता को जाने और समझकर उसे नमन करे. उन्होंने भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन का बीजारोपण भी किया था. डॉक्टर वाकणकर ने भोज की सरस्वती ही नहीं वेद की सरस्वती को भी स्थापित और प्रभावमय किया, वे सही अर्थों में संस्कृति के सारस्वत साधक थे.

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