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सनातन धर्म केवल हिन्दुओं के लिए नहीं, मनुष्य मात्र के लिए है – डॉ. मोहन भागवत

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मुंबई (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि ‘राष्ट्र और संस्कृति के प्रति हर नागरिक में प्रेम भाव होता है. हमारे पास विश्व कल्याण की धरोहर है, जिसने हमें अभी तक बनाए रखा है. सुख को लोग बाहर खोजते हैं, पर वह हमारे अंदर है. एक समय के बाद बाहरी सुख फीका पड़ जाता है, जबकि हमारे अंदर उपस्थित सुख कभी फीका नहीं होता. हर धर्म का मूल ही है, सत्य को अपने अंदर खोजना, यही सनातन धर्म की मर्यादा है. सनातन धर्म कहता है कि सत्य सबके अंदर है और वो एक है. हम सब एक ही हैं. इसलिए सनातन धर्म के आचरण को धारण करना सबका कर्तव्य है.

सरसंघचालक मोहन भागवत जी  विलेपार्ले (पश्चिम) स्थित संन्यास आश्रम में आयोजित पांच दिवसीय अमृत महोत्सव के अंतिम दिन (20 जनवरी, 2020) संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने अनुशासन को देशहित में बताते हुए कहा कि समूह में चलने के लिए अनुशासन आवश्यक है, उसके लिए संयम जरूरी है. हम प्रकृति का अभिन्न अंग हैं. उसे भूलने के बाद लोगों ने प्रकृति का गलत तरीके से दोहन किया. साधू संतों का जीवन हमें शिक्षा देता है कि अपने आचरण और शौर्य से धर्म की रक्षा करो. सनातन धर्म केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है, वह मनुष्य मात्र के लिए है. इसके समाप्त होने पर संसार समाप्त हो जाएगा. इस सनातन संस्कृति को सदा के लिए प्रवाहमान बनाने के लिए आद्य शंकराचार्य और अन्य कई संतों ने अपने जीवन को झोंक दिया. यही हमारा इतिहास है.

सरसंघचालक जी ने कहा कि पूर्व में बनी गलत परंपरा का आदरपूर्वक बहिष्कार होना चाहिए. महापुरुष केवल सिखाते नहीं, बल्कि आचरण द्वारा दिखाते हैं. अगर व्यक्ति सत्य और करूणा रखता है तो उसके आचरण में भी लक्षित होना चाहिए. सत्य का आचरण करना और करूणा का आचरण करना यही धर्म है. परंपरा का निर्वाह सत्य और निर्भयता पूर्वक करो, यही धर्म कहता है. प्रामाणिकता के साथ बिना निःस्वार्थ बुद्धि से तन-मन-धन पूर्वक धर्म के आचरण से स्वरक्षण करो.. संस्कृति को अपने आचरण से चलाओ और संस्कृति पर आक्रमण करने वालों का बहिष्कार करो. प्रामाणिकता के साथ तन-मन-धन से निःस्वार्थ बुद्धि से आचरण करते समय प्राणों की परवाह किए बिना आगे बढ़ो. ये संदेश महापुरूषों के लिए नहीं है, हम सबके लिए है. धर्म सबकी उन्नति एक साथ करता है. इस सनातन धर्म के अनुसार चलकर अपने जीवन को उपयोगी और उज्जवल बनाना है.

कार्यक्रम के पांचवें और अंतिम दिन प्रसिद्ध कथावाचकों ने आद्य गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा और उसके पालन पर केंद्रित प्रवचन दिए. इससे पूर्व पहले सत्र में प्रातः 9 से 12 बजे तक भगवान शिव का विशेष अभिषेक एवं अर्चन किया गया. इस दौरान ब्रह्मलीन सूरतगिरि बंगला हरिद्वार नवम् पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी महेश्वरानंद की पुस्तक ‘चातुर्वर्ण्य – भारत समीक्षा’ के हिंदी अनुवाद का विमोचन हुआ.

कार्यक्रम के अध्यक्ष और संन्यास आश्रम के व्यवस्थापक महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि जी ने आभार प्रकट किया.. महामंडलेश्वर स्वामी हृदयानंद गिरि, महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती और कार्ष्णि आचार्य महामंडलेश्वर गुरुशरणानंद ने प्रवचन दिए.

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