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बताइये न पिताजी, आप सब दान कर रहे हैं, मुझे किसको दान कर रहे हैं. ऐसा दो तीन बार होने के बाद पिताजी गुस्सा हो गए. जाओ तुमको हमने यमराज को दान दिया, ऐसा उन्होंने बोला. अब ये बालक है, ये सीखने वाला बालक और गुरु के घर उस समय जाने की पद्धति थी, उसके पहले माता पिता ही शिक्षक हैं. आज भी ऐसा ही है, जब तक विद्यालय में जाता नहीं. केजी में, नर्सरी में जाने नहीं लगता. उसके पहले, उसका जो एटीट्यूड कहते हैं वो एटीट्यूड तैयार हो जाता है, घर में माता पिता को देख कर.

उसका प्रथम गुरु माता है, द्वितीय गुरु पिता है. तो गुरु ने कह दिया कि तुमको यम को दिया है तो मुझे यम को दिया है और उसने प्रस्थान किया यमराज के यहां. यमराज के यहां गया तो यमराज घर पर नहीं थे, प्रवास पर थे. वो वहां तीन दिन बैठा रहा भूखा. यमराज वापस आए देखा कि एक ब्रह्मचारी बालक है और वो भूखा बैठा है. हाथ जोड़कर पहले क्षमा मांगी. ब्रह्मचारी बालक यानि पढ़ने वाला बालक, गुरूगृह में जाने के बाद, पढ़ाई शुरू होने के बाद, विवाह तक का जो काल है वो सीखने का काल है, सीखने के लिए संयम पालन करने का काल है, ब्रह्मचर्य है.

किसी सीखने वाले को तीन दिन अपने यहां प्रतीक्षा करनी पड़े, ये जिसको मिलने को वो गया है उसके लिए दोष है, अपराधी है. इसलिए यमराज नचिकेता की पहले क्षमा मांगते हैं और फिर पूछते हैं कि क्या चाहिए.

तो नचिकेता का प्रश्न, ये शिक्षा का प्रारंभ है. नचिकेता देखकर आया है कि बुद्धि से तो हमारे पिता जी भी सब जानते हैं. लेकिन जानी हुई बात भी, संपन्न होने के बाद भी, गाय दान दे सकने की स्थिति होने के बाद भी, वो आचरण वैसा नहीं करते, ये क्यों है. ये सनातन प्रश्न है, हम सब लोगों के सामने, पूरी मानवता के सामने ये प्रश्न है.

आज मानवता भी इतनी पुरानी हो गई है. हमारे यहां तो युगों की कल्पना है, हजारों वर्षों में गणना होती है. आज का आधुनिक ज्ञात इतिहास तो कम से कम पांच हजार वर्षों का विकास मानवों ने देखा है और आज तो वो प्रकृति ने उनको जो जानने के लिए साधन दिए हैं, उनकी शक्ति हजारों-करोड़ों गुना अधिक बढ़ाकर दूर-दूर के और बिल्कुल सूक्ष्म ऐसे सब अनुसंधान कर रहे हैं, इतना जान रहे, बुद्धि बहुत जानती है, तो सब मानव ये जानते हैं कि प्रकृति को नष्ट करने से हम नष्ट हो जाएंगे. लेकिन प्रकृति को नष्ट करने का काम थमा नहीं है.

सब जानते हैं कि आपस में झगड़ा करने से दोनों की हानि होती है. लेकिन आपस में झगड़ा करने की बात अभी तक बंद नहीं हुई. सब जानते हैं कि स्वार्थ, ये बहुत खराब बात है, लेकिन अपने स्वार्थों को बहुत कम लोग छोड़ पाए, देशों का उदाहरण लीजिए या व्यक्तियों का. तो जानने के बाद भी जो करना चाहिए वो आदमी नहीं करता और जो नहीं करना चाहिए, वो करते रहता है. ये क्यों होता है.

अब उसको लगता है कि ये मैं करूं तो लाभ होगा तो उसको ये बताया भी जाता है कि ये तुम करोगे तो अभी तुमको लाभ मिलेगा, लेकिन बाद में तुमको इसके कटु फल भोगने पड़ेंगे. बाद में याने कब, ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्होंने जो नहीं करना चाहिए वो जीवनभर किया और जीवन भर बड़े सुख से रहे. तो अपने यहां उसका उत्तर देते हैं, सब लोग देते हैं, अपने यहां जो आध्यात्मिक विचारधाराएं हैं, जो मौलिक विचारधाराएं हैं अपने देश की, वो जड़वादी भी हैं, निरीश्वरवादी भी हैं. ईश्वर को मानने वाली भी हैं, न मानने वाली भी हैं. चैतन्य से विश्व की उत्पत्ति मानने वाली हैं, जड़ से उत्पत्ति मानने वाली हैं. लेकिन सबकी एक समान बात है, सब लोग पुनर्जन्म मानते हैं. फिर से जन्म होने वाला है, यहां खत्म नहीं होगी. यहां तुम कुछ उल्टे सीधे काम करके छूट भी जाओगे तो अगले जन्म में तुमको भरना पड़ेगा.

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