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हम क्यों खोते जा रहे हैं अपने शब्दों को, ऐसे तो विलुप्त हो जाएंगे हमारे शब्द

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अपनी भाषा, बोली और अपने शब्दों का उपयोग न करने या उन्हें प्रचलन में न रखने पर वे मृत हो जाते हैं. ‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है.’ आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गंभीर चुनौती बन कर उभर रही है. अनेक भाषाएं व बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई अन्य का अस्तित्व संकट में है. यह कितना विदारक है!

मैंने देखा है एक शब्द को मरते हुए. कुछ वर्ष पहले की बात है. मैं उत्तर प्रदेश में एक हिंदीभाषी परिवार में भोजन करने गया था. कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी हमें भोजन परोस रही थी. मां गरम-गरम रोटियां बना रही थीं. मैंने उस बिटिया से कहा कि मां से कहना कि भोजन बहुत स्वादिष्ट बना है. फिर हाथ धो कर वापस लौटा तो मां से मिलना हुआ. नमस्कार आदि के बाद जब मैंने पूछा कि बिटिया ने कुछ कहा क्या? तब पता चला कि बिटिया ने तो उनसे कुछ कहा ही नहीं. कारण, उसे ‘स्वादिष्ट’ का अर्थ पता ही नहीं था. उसे ‘टेस्टी’ शब्द तो मालूम था, पर ‘स्वादिष्ट’ शब्द की जानकारी नहीं थी.

अभी हिमाचल प्रदेश के प्रवास के दौरान एक कार्यकर्ता की बेटी से परिचय हुआ. उसके गालों पर सुंदर गड्ढे पड़ते थे, जिसे अंग्रेजी में ‘डिम्पल’ कहते हैं. ‘डिम्पल’ के लिए मुझे मराठी और गुजराती शब्द तो पता था, पर हिंदी में क्या कहते हैं, यह नहीं जानता था. मैंने उस बेटी की मां से पूछा तो उन्होंने कहा कि हिंदी में भी इसे ‘डिम्पल’ ही कहते हैं. मैंने कहा कि ‘डिम्पल’ तो अंग्रेजी शब्द है. हिंदी में इसे क्या कहते हैं? उन्होंने अनभिज्ञता जताई. तब मैंने उस बेटी को ही गूगल में ढूंढने को कहा. उसने ढूंढ कर बताया कि हिंदी में ‘डिम्पल’ को हिलकोरे कहते हैं. इसके बाद हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि हिंदी भाषी प्रदेशों में अनेक स्थानों पर लोगों, विद्वानों, हिंदी में पीएचडी अध्यापकों से पूछा, लेकिन सभी ने इसमें असमर्थता जताई. सभी ने यही कहा कि हिंदी में भी इसे ‘डिम्पल’ ही कहते हैं. बार-बार पूछने पर कहा कि ‘गड्ढा’ कहते हैं. मैंने कहा कि इतनी सुंदर चीज के लिए ‘गड्ढा’ जैसे नीरस शब्द का प्रयोग कैसे हो सकता है, तो सभी मौन हो गए. तब मुझे इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित प्रस्ताव का स्मरण हुआ. इसमें कहा गया है कि अपनी भाषा, बोली और अपने शब्दों का उपयोग न करने या प्रचलन में न रखने पर वे मृत हो जाती है. इसके साथ अपनी संस्कृति भी मृत हो जाते हैं. प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘भाषा किसी भी व्यक्ति एवं समाज की पहचान का एक महत्वपूर्ण घटक तथा उसकी संस्कृति की सजीव संवाहिका होती है.’’ आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गंभीर चुनौती बन कर उभर रही है. अनेक भाषाएं व बोलियां विलुप्त हो चुकी हैं और कई अन्य का अस्तित्व संकट में है. यह कितना विदारक है!

क्या हम हर घर, हर परिवार में ऐसा एक प्रयोग कर सकते हैं कि सप्ताह में कम से कम एक दिन सभी लोग आपस में आधा घंटा अंग्रेजी के एक भी शब्द का प्रयोग किए बिना केवल अपनी मातृभाषा में बात करें? यदि मातृभाषा का शब्द याद नहीं है तो किसी अन्य भारतीय भाषा का समानार्थी शब्द चलेगा, पर अंग्रेजी नहीं. क्या यह संभव है? मोबाइल या इंटरनेट जैसे शब्द आधुनिक हैं, इन्हें इसी रूप में प्रयोग करने में आपत्ति नहीं हो सकती. पर ‘हिलकोरे’ तो अंग्रेजों के भारत में आने के पहले से पड़ते थे. भोजन तो पहले से ही स्वादिष्ट होता था. वह ‘टेस्टी’ क्यों हो रहा है, ‘डिम्पल’ कब से पड़ने लगे, विचार करना चाहिए.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

साभार – पाञ्चजन्य

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14 thoughts on “हम क्यों खोते जा रहे हैं अपने शब्दों को, ऐसे तो विलुप्त हो जाएंगे हमारे शब्द

  1. अनेकों वर्ष पूर्व किसी ने बटन शब्द का हिंदी अर्थ पूछा! न मुझे मालूम था और न ही किसी अन्य व्यक्ति से कोई सहायता मिल सकी! तब मैंने डॉ.रघुवीर का अंग्रेजी हिंदी शब्दकोष मंगवाया! और उसमे बटन का अर्थ दे रखा था कुडम!लेकिन अगर किसी से बटन के स्थान पर कुडम कहकर मांगेंगे तो शायद ही दे पायेगा!

  2. श्रीमान वह दे पाएगा, यदि उसे पता हो। श्री मनमोहन वैद्य जी भी यही तो कह रहे हैं कि अंग्रेजी के आने के पहले भी खाना पकता था, कपड़े पहने जाते थे। अपने मूल की ओर वापस लौटिए।

  3. मेरे अनुभव #हिंदी को ले कर कुछ परिस्थितियों से भिन्न साबित हुए।

    बात इसी रविवार की है, जब मैंने पिता जी के साथ हुए अनुभव और पारिवारिक मूल्यों को #हिंदी में फेसबुक पर साझा किया, प्रतिसाद अत्यधिक ही आया। जिसकी उम्मीद ना थी।

    अर्थात् लोग हिंदी को अपनाना और बढ़ाना जरूर चाहते हैं, परिवेश इसकी पूरी अनुमति नहीं देता।

    आपका कहना सही है, घर से शुरुआत कर दी जाए तो हम विलुप्त होते शब्दों को बचा भावी पीढ़ी के लिए सहेज सकते हैं।

  4. सर … आपने जो भी लिखा है बहुत अच्छा लिखा है। लेकिन इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन है?? हमें अपने मातृभाषाओं से कौन दूर करने पर मजबूर कर रहा है। क्या इसके पीछे बस आम इंसान की गलती है या इस देश की कानून व्यवस्था और वो सविंधान जो इस देश को चलाता है, उसकी गलती है। एक लेख इस पर भी लिखना चाहिये आपको, ऐसी मेरी सोच है।

  5. अति सुंदर लिखा है बंधु आपने। सरल शब्दों में बहुत गूढ़ बात समझा दी। बहुत दिनों बाद ऐसा सुंदर लेख पढ़ा, ह्रदय प्रफुल्लित हो गया। बहुत बहुत धन्यवाद।

  6. वास्तव में हमारे देश में हम समस्त भारत वासी अपनी ही भाषा के शब्दों की पहेली ही भूल चुके है। जब तक परतन्त्र भारत था, तब तक हिंदी की मूल भाषा के शब्दों के विचारक समस्त भारतवासियों ने आजादी की लड़ाई में अपनी मातृभाषा से ही शब्दों का आदान प्रदान किया, निश्चित आपके विचार चिंतनीय है

  7. wo sab to thik hai hum bhi bhagwat ji se sahmat hain lakin kya aaj k time me hamen koi hindi bol ke ya sun ke job dega nahi. aur uske bina ghar chalana asambhav hai.. angreji kon bolna chahta hai ye to aajkal majburi ban gai hai sabki.

    1. नहीं सर आज वो बात नहीं है आज लगभग सभी सरकारी विभागों ने यहाँ तक की कुछ प्राइवेट संस्थानों ने भी हिंदी में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया है आप हिंदी में आवेदन दे सकते हैं

  8. Ek baat ki taraf dhyan dilana chahunga sabhi ka……aaj ke samay mein angreji bolne wala jyada rupay kamata h aur hindi bolne wala kahut kam. Aur angreji bolne wale ko shi samjha jata h aur hindi bolne wale ko jhutha…aakhir aisa kyu….

  9. ह्रदय को छू लेने वाला लेख है …..

    गोष्ठी, सेमिनार etc के माध्यम से लोग अपनी भाषा की ओर लौट सकते हैं …

  10. सादर चरण वंदन गुरुजी,
    आपके विचार अनुकरणीय है, जीवन में जो धारण कर लेगा, वो सन्मार्ग के पथ पर सदैव अग्रसर होता रहेगा।

  11. इसकी शुरुआत देश की सबसे बड़ी कानून व्यवस्था उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट ) से होनी चाहिए । इस व्यथा को मैं भुगत चुका हूँ । वहाँ सिर्फ अंग्रेजी भाषा बोली जाती है ।वकील जज को आम आदमी से कोई मतलब नहीं।

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