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हम प्रकृति के एक अंग हैं, प्रकृति के स्वामी नहीं – डॉ. मोहन भागवत

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कर्णावती (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि हमारे परम वैभव बनने की संकल्पना अकेले परम वैभव बनने की नहीं है. हमारे वैभव से विश्व का कल्याण हो, ऐसा हमें वैभव चाहिए. हमारी प्राचीन दृष्टि के सूत्र को लेकर संघ काम करता है. जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे कार्य का दायरा व्यापक होता है, और भाषा भी व्यापक बनती है. परन्तु जब कार्य का दायरा बहुत छोटा था और कार्य भी इतना व्यापक नहीं था, तब भी विचार यही था. सरसंघचालक कर्णावती में माधव सृष्टि न्यास द्वारा आयोजित श्री गुरुजी व्याख्यानमाला में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि सन् 1920 में संघ की स्थापना के 5 वर्ष पूर्व नागपुर में कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्ताव नियामक समिति के सामने डॉक्टर हेडगेवार ने दो प्रस्ताव रखे थे. पहला प्रस्ताव था कि संपूर्ण देश में गौ हत्या बंद करना और दूसरा प्रस्ताव था कि कांग्रेस घोषित करे कि हमारा लक्ष्य भारत के लिए संपूर्ण स्वतंत्रता का हो और स्वतंत्र भारत दुनिया के देश को पूंजी के चंगुल से मुक्त करेगा. लेकिन समिति ने इन दोनों प्रस्तावों को  मान्य नहीं किया. वो इसलिए नहीं कि उनका मतभेद था, वो इसलिए कि उस समय इन प्रस्ताव की भाषा पर बोलना शायद उन्होंने उचित नहीं समझा.

बाद में, इन सब बातों को कांग्रेस द्वारा कहा गया. गांधी जी उस अधिवेशन के अध्यक्ष थे. अर्थ प्रधान व्यवस्था की जकड़न आज हम पूरे विश्व में अनुभव कर रहे हैं, उसके आज के स्वरूप का अनुमान लगाकर तभी डॉक्टर हेगडेवार ने कहा था कि स्वतंत्र भारत को ये सब करना पडेगा. इसलिए यह विषय नया नहीं है. इस पर चिंतन करना है. आज के विश्व की स्थिति क्या है. उसकी आवश्यकता क्या है? आज हम विकसित विश्व में रहते हैं. तरह-तरह की सुविधाओं और तरह-तरह के भोगों से युक्त ऐसा सुविधामय जीवन मनुष्यों को प्राप्त है. विश्व एक बहुत बड़ा ग्लोबल विलेज है. विज्ञान और तकनीकी से कई असंभव कार्य संभव हो गए. मनुष्य आगे-आगे बढ़ने लगा, जिससे भौतिक जगत के ज्ञान का विस्तार हुआ. उपभोग तो सब प्रकार के मनुष्यों को उपलब्ध है, लेकिन सभी जगह समाज उपलब्ध नहीं है. विज्ञान का उपयोग दुनिया को सुखी बनाने में कम हुआ, दुनिया को नष्ट करने में ज्यादा हुआ. ज्ञान बढ़ा तो लालच बढ़ा क्यों कि सामर्थ्य आ गया. आज दुनिया के स्थायी ऊर्जा स्रोत को समाप्त किया जा रहा है. हमें त्याग और संयम के मूल्य पर चलना पड़ेगा. हमको ये समझना पड़ेगा कि हम प्रकृति के एक अंग हैं, प्रकृति के स्वामी नहीं हैं.

दुनिया कितनी निकट आ गई है, निकट आने से झगड़ा कितना बढ़ रहा है. हम कहीं भी पहुंच सकते हैं, जिसको हम अंग्रेजी में रिमोट एरिया (दुर्गम क्षेत्र) कहते हैं, वहां तक रास्ते बने हैं, जिसमें जाना संभव नहीं था, वहां तक उड़कर जाते हैं. हम कहीं भी पहुंच सकते हैं, किसी के पास भी जा सकते हैं. लेकिन हम अपने पड़ोसी से भी दूर हो रहे हैं. बहुत चौड़े अच्छे रास्ते बन गए, रास्ता क्रॉस करके अपने पड़ोसी के घर जाना बंद हो गया. और दुनिया इतनी पास आई कि पास आते-आते दो विश्व युद्ध कर डाले तथा तीसरे का खतरा मंडरा रहा है.

ऐसा कहते हैं कि एक अलग रूप में वो तीसरा महायुद्ध आज चल रहा है. यहां मारकाट हो गई, वहां मारकाट हो गई. यहां असंतोष, वहां असंतोष. कौन सुखी है, कोई सुखी नहीं. सब लोग आंदोलन करते हैं. मिल मालिक आंदोलन करते हैं, मिल का मजदूर आंदोलन करता है. मालिक भी आंदोलन करता है, सेवक भी आंदोलन करता है. सरकार भी आंदोलन करती है, यानि सरकार में जो लोग हैं, वो दूसरी जगह सरकार में नहीं है, तो वहां आंदोलन करते हैं. जनता भी आंदोलन करती है, छात्रों का भी आंदोलन है, शिक्षकों का भी आंदोलन है, सभी दुखी हैं. सभी असंतुष्ट हैं, और सभी में कलह है. इतना प्रगत हो गया विज्ञान, इतना निकट आ गए लोग, ज्ञान की कक्षा इतनी बढ़ गई, लेकिन कट्टरवाद बंद हुआ! नहीं हुआ. हिंसा बंद हुई, नहीं हुई. उग्रवादियों का संकट कम हुआ, कम नहीं हुआ वो बढ़ता ही चला जा रहा है.

विश्व का एक संदर्भ है, जिसमें धनबल विश्व का बढ़ा है, साधन बल बढ़ा है. उसके कारण मनुष्य का अपना बल भी बढ़ा है. आयु मर्यादा बड़ी हो गई है, रोगों से मुक्ति मिल गई है, अधिक स्वस्थ बन सकते हैं सब लोग. और ज्ञान भी बढ़ गया है, परंतु परिणाम क्या हो रहा है. विवाद बढ़े हैं, कलह बढ़ी है, खून खराबा हो रहा है. ये भी दूसरा एक संदर्भ है, ऐसा क्यों हुआ है? तो अपने यहां ऐसा कहते हैं कि यह दृष्टि का परिणाम है. सबको यह प्राप्त होने के बाद भी परिणाम क्या निकालना यह तो हमारी बुद्धि पर है ना.

जिसकी दुष्ट बुद्धि है वो क्या करता है? विद्या विवादाय, धनं मदाय यानि ज्ञान बढ़ता है तो अपने अहंकार को लेकर उसका उपयोग विवाद के लिए करता है. मेरी ही सही, बाकि सब गलत, इस अहंकार में चलता है. अथवा उसका उपयोग करके लोगों को लड़ाने के लिए जो करना चाहिए वो करता है. अपने यहां यह चल रहा है, नया-नया मनगढ़ंत ऐसा कुछ रचकर, उसको कच्चे दिमागों में भरकर उनको एक दूसरे के द्वेष्टा (दुश्मन, शत्रु) बनाने का काम अपने यहां तो चल ही रहा है, सारी दुनिया में चलता है. सोशल मीडिया जैसा साधन आ गया है, कितना अच्छा साधन है. सारी जानकारी मिल सकती है. एक दूसरे से संवाद कर सकते हैं, ऐसा ही होना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता, एक दूसरे से विवाद करते हैं. जानकारियां भ्रष्ट करके इधर-उधर भेजते हैं. ये सारी बातें होती हैं, क्यों? विद्या विवादाय, धनं मदाय खलस्य, ये साधनों या विद्या का परिणाम, प्रताप नहीं है. प्रताप है दुष्ट बुद्धि का.

साधो विपरितवेतत् जबकि अच्छे लोग इससे विपरीत करते हैं. ज्ञानाय, दानाय च रक्षणाय. यानि विद्या का उपयोग लोगों का ज्ञान बढ़ाने में करते हैं, धन का उपयोग दान करके लोगों का जीवन अच्छा करने में करते हैं और बल का उपयोग दुर्बलों को सुरक्षित करने में करते हैं. यह दृष्टि का अंतर है.

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