करंट टॉपिक्स

हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव – समाज राष्ट्र को बचाने के लिए एकजुट होकर शक्तिशाली बनें

नरेंद्र सहगल

  • हिन्दूपद पादशाही की स्थापना
  • प्रत्येक युद्ध में विजयी शिवाजी
  • धर्मान्तरित हिन्दुओं की घर वापसी
  • गुरिल्ला युद्ध तकनीक का अविष्कार
  • समुद्री बेड़ा (नौसेना) का निर्माण
  • भगवा ध्वज एवं संस्कृत को मान्यता

हिन्दू सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज ने ज्येष्ठ शुक्ल, त्रयोदशी (सन् 1674) के दिन हिन्दुपद पादशाही की स्थापना करके सारे संसार में रणभेरी बजा दी – भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा. भीषणतम एवं विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू समाज जीवित रहेगा. भारत का राष्ट्र जीवन विजय का उपासक है, पराजय का नहीं.

वह समय ऐसा था, जब चारों ओर घोर निराशा का अंधकार व्याप्त था. हिन्दुत्व विरोधी मुगलिया आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर था. मंदिर तोड़े जा रहे थे, विद्या के केंद्र जलाए जा रहे थे, तलवार के जोर पर धर्मान्तरण किया जा रहा था, हिन्दुओं पर जजिया टैक्स लगाकर अमानवीय उत्पीड़न किया जा रहा था. पूर्णतया मरणासन्न की स्थिति में पहुंच चुका था हिन्दू समाज. ऐसी घोर विकट एवं निराशाजनक परिस्थितियों में शिवा जी द्वारा हिन्दुपद पादशाही की घोषणा करके भगवा ध्वज को लहराने का कार्य भारत के गौरवशाली इतिहास का एक और स्वर्णिम अध्याय बन गया.

अपने पौरूष, सैन्य रणकौशल और सामरिक बुद्धिमता के आधार पर छत्रपति शिवाजी ने हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की एक ऐसी दिव्य चेतना जागृत कर दी, जिसके परिणाम स्वरूप औरंगजेब जैसे अत्याचारी मुगल सम्राट के सिंहासन की भी चूलें हिल गईं. अतीत में राष्ट्रनायक श्रीराम द्वारा राक्षसों का संहार करके रामराज्य की स्थापना और योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा अधर्मियों का विनाश करके धर्म की स्थापना जैसा ही यह ऐतिहासिक प्रसंग था, शिवाजी का हिन्दू सम्राट के नाते राज्यभिषेक.

हिन्दू सम्राट छत्रपति शिवा जी ने भारत की सुप्त हो रही वीरव्रती रण परम्परा और क्षीण होते जा रहे राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुन: जागृत करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की थी. अतीत काल में भी सम्राट चन्द्रगुप्त, अशोक, पुष्यमित्र, समुद्रगुप्त, हर्ष, ललितादित्य, अवंतिवर्मन, कृष्णदेवराय और रणजीत सिंह और गुलाब सिंह जैसे शूरवीर हिन्दू सम्राटों ने विशाल साम्राज्यों की स्थापना की थी. भारतीयों के इसी गौरवशाली इतिहास को कुटिल अंग्रेजों ने मिटाने का भरसक प्रयास किया. इस वीरव्रती इतिहास का पुनर्लेखन प्रारंभ हो चुका है.

छत्रपति शिवाजी द्वारा सफलतापूर्वक स्थापित हिन्दवी स्वराज्य की पृष्ठभूमि को समझने के लिए शिवाजी के समस्त जीवन को समझना भी जरूरी हो जाता है. शिवाजी के पिता शाह जी भोंसले तो जीवन भर मुगलिया दरबारों की चाकरी करते रहे. परंतु शिवाजी की माता जीजाबाई ने अपने पुत्र को रामायण, महाभारत एवं सनातन भारत की विजयी गाथाएं सुना कर एक वीरव्रती हिन्दू योद्धा बना दिया.

इतिहास साक्षी है कि राष्ट्रमाता जीजाबाई का परिश्रम सफल हुआ और शिवाजी ने बालपन से ही अपनी तलवार के जौहर और अद्भुत रणकौशल का परिचय देना प्रारंभ कर दिया. मात्र 17 वर्ष की आयु में शिवाजी ने अपनी बाल सेना के साथ तोरण नामक किले पर शत्रु को पराजित करके भगवा ध्वज फहरा दिया. इसके बाद उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक सैकड़ों युद्ध किए और जीते. वे एक ऐसे सेनापति थे, जिन्होंने अपने समस्त जीवन में एक भी युद्ध नहीं हारा.

एक बार शिवाजी के पिता शाह जी भौंसले बाल शिवा को मुगलिया दरबार में ले गए. पिता की इच्छा के विरूद्ध बाल शिवा ने दरबार की परम्परा के अनुसार अपना सिर नहीं झुकाया.

इस बाल सैनिक ने स्पष्ट कहा कि “विदेशी विधर्मी और हिन्दुओं का संहार करने वाले को मैं अपना राजा नहीं मानता.” बाल शिवाजी के इस ‘राजद्रोही’ व्यवहार के बाद जब दरबारी मुगल सैनिक ने इस बालक का सिर काटने का प्रयास किया तो शाह जी भौंसले ने किसी प्रकार बचा लिया.

शिवाजी किस चातुर्य से औरंगजेब की कैद से छूट कर आ गए इस कथा को सभी जानते हैं. वापस आकर शिवाजी ने हिन्दू साम्राज्य की स्थापना के लिए अपनी सैनिक गतिविधियों को युद्ध स्तर पर तेज कर दिया. मुगलिया सेनापति दुर्दान्त अफजल शाह और उसकी समस्त सेना का संहार करने वाले शिवाजी ने इस सातफुटे मुगल सेनापति का सर काट कर अपनी माता जीजाबाई के चरणों में पटक दिया था. इस घटना की सूचना जब दिल्ली सम्राट औरंगजेब तक पहुंची तो उसके पांव के नीचे की धरती हिल गई.

इस तरह एक के बाद एक युद्ध को जीतते चले गए थे शिवा जी महाराज. इन सफलताओं ने शिवा जी को एक सफल हिन्दू सम्राट के रूप में प्रस्तुत कर दिया. विजय के इन क्षणों में शिवा जी ने अपने ‘हिन्दू चरित्र’ पर कभी आंच नहीं आने दी. एक ऐसे ही युद्ध के पश्चात जब इनके सैनिकों ने एक पराजित मुगलिया शासक की युवा बेटी को उपहार के रूप में शिवाजी के सामने प्रस्तुत किया तो शिवा जी ने उस युवती से कहा “अगर मेरी मां भी इतनी सुंदर होती तो मैं भी इतना ही सुंदर होता.” शिवा जी ने मुस्लिम महिला को भी माता का सम्मान देकर वापस उसके घर भिजवा दिया.

शिवाजी ने तलवार के जोर पर धर्मान्तरित हो चुके हिन्दुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाने का अभियान भी छेड़ दिया. अपने घर में वापस लौटने वाले एक सैनिक कुली खान ने जब हिन्दू धर्म को स्वीकार किया तो शिवाजी ने अपनी पुत्री का विवाह इसके साथ करके एक अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत किया. इस तरह से धर्मान्तरित मुसलमान फिर से हिन्दू धर्म में वापस लौटने लगे. शिवाजी की इन सफलताओं के पीछे उनके कुलगुरू कोणदेव और समर्थ रामदास के मार्गदर्शन एवं शिक्षा का भी गहरा स्थान है.

‘स्वयंमेव मृगेन्द्रता’ शेर अपनी शक्ति के बल पर जंगल में राज करता है. दादा कोणदेव, समर्थ रामदास, माता जीजाबाई और प्रजा ने इस अभिजात हिन्दू सम्राट को पहचाना और राज्याभिषेक कर दिया.

भारत के एक हिस्से में स्थापित इस हिन्दवी साम्राज्य की बागडोर सम्भालते ही छत्रपति शिवाजी ने हिन्दुओं के पुर्नुत्थान का विजयी अभियान प्रारंभ करके दिल्ली की मुगलिया सल्तनत को चुनौति भी दे दी.

शिवाजी के राज्य में संस्कृत एवं मराठी भाषाओं को पुनर्जीवित किया गया. फारसी भाषा को तिलांजलि देकर मराठी को राजभाषा बना दिया गया. टूटे मंदिरों के निर्माण से लेकर बहन-बेटियों के सम्मान की व्यवस्थाएं भी की गईं.

राज्य की सुरक्षा के लिए सैनिकों की संख्या दो हजार से बढ़ाकर दो लाख तक कर दी गईं. कोंकण और गोवा जैसे समुद्री तटों की रक्षा के लिए सरदार आंगरे के नेतृत्व में एक विशाल समुद्री बेड़े (नौसेना) का निर्माण किया.

इस सारे कालखण्ड में शिवाजी ने गुरिल्ला युद्ध की तकनीक का आविष्कार करके अपने राज्य को बनाने एवं सुरक्षित करने के सभी उपाय किये.

इसीलिए राष्ट्रीय स्वाभिमान की विजय के प्रतीक हिन्दू साम्राज्य दिवस को समस्त भारतवासी विशेषतः विशाल हिन्दू समाज एक राष्ट्रीय उत्सव की तरह मनाता है.

वर्तमान में विधर्मी तहज़ीब को भारत में सुरक्षित रखने के लिए विधर्मी लोग भारत की सनातन संस्कृति पर तरह-तरह के आघात कर रहे हैं, अतः आवश्यकता इस बात की है कि समस्त हिन्दू समाज अपने राष्ट्र को बचाने के लिए एकजुट होकर शक्तिशाली बने.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *