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हिमालय की वादियों से वापस लौटीं मां नंदा

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nandadevi-rajzat-6 (1)देहरादून. हिमालय की घाटियों से चोटियों तक की यात्रा नंदा राजजात का सुखद समापन शनिवार, 6 सितंबर को  नौटी में स्थित नंदादेवी सिद्धपीठ में वापस आकर हो गया. लगभग छह हजार यात्री 21वें दिन नंदादेवी सिद्धपीठ पहुंचे और पूजा आदि कर उन्होंने अगले 12 साल बाद पुनः इस यात्रा तक के लिये विदा ली. यात्रा के अपने प्रारम्भिक बिन्दु में वापस लौट आने पर लोगों ने यात्रियों का स्वागत किया.

देवभूमि उत्तराखण्ड धार्मिक आस्थाओं का भी प्रतीक है. वर्षभर यहां पारम्परिक रीति-रिवाजों के अनुसार विभिन्न धार्मिक आयोजन होते रहते हैं. विषम भौगोलिक स्थिति के बावजूद अपनी मातृभूमि के प्रति लगाव के नाते यहां आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में प्रवासी उत्तराखण्डवासी अपनी भागीदारी निभाते रहे हैं. इस वर्ष आयोजित श्री नंदादेवी राजजात यात्रा में सम्मिलित होने पहुंचे क्षेत्रवासियों की बड़ी संख्‍या इस बात का प्रतीक है कि इन पहाड़ों में उनके पूर्वजों ने जो समृद्ध सांस्कृतिक व सामाजिक विरासत की शुरुआत की है, वे उसे आगे बढ़ाने के लिये लालायित हैं.

nanda-devi-5409ff427b007_exlst (1)प्रत्येक 12 वर्ष बाद आयोजित होने वाली इस राजजात यात्रा का सामाजिक व सांस्कृतिक सरोकारों को जोड़ने में बड़ा योगदान है. यद्यपि नंदा राजजात मुख्‍यतः देवी नन्दा का अपने मायके से ससुराल जाने की यात्रा है, किन्तु यह यात्रा अपने साथ यात्रा-मार्ग व पड़ावों के गांवों को ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखंड के जनमानस को अपने साथ जोड़ रही है. मुख्‍यतः गढ़वाल के राजवंश के वंशजों के गांव कांसुवा से 17 अगस्त को आरम्भ हुई यह यात्रा जब अपने कुलपुरोहितों के गांव नौटी पहुंची, तभी से क्षेत्र का पूरा वातावरण नन्दा की भक्ति में समाया हुआ है.

भक्ति की शक्ति का प्रतीक यह आयोजन अपनी पुत्री को ससुराल के लिये विदा करने की तैयारियों ही जैसा है. सभी क्षेत्रवासी अपनी सामर्थ्य व श्रद्धा के अनुसार मां नन्दा की आराधना व सेवा में जुड़े हैं. आज जबकि आधुनिकता के दौर में लोग अपनी परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं, ऐसे में श्री नन्दादेवी राजजात यात्रा का पर्व उन्हें अपनी लोक संस्कृति व धार्मिक परिवेश से परिचित कराने में सफल हो रहा है.

पलायन पहाड़ की आज बड़ी समस्या बनी हुई है. हालांकि लगभग तीन चौथाई आबादी बेहतर भविष्य की उम्मीद व आजीविका के लिये शहरों की आबादी का हिस्सा बन गई है. ऐसे में खाली पड़े इन गांवों के निवासी अपने गांवों को लौटे हैं, पुराने पड़े जीर्ण-शीर्ण भवनों को ठीक-ठाक कर रहने लायक बना रहे हैं, मां नन्दा की यह दैविक यात्रा उन्हें अपने पैतृक गांवों में लाई है, इससे कुछ ही समय के लिये सही लगभग सभी गांव आबादी से भरे पड़े हैं. दशकों बाद लोग एक-दूसरे से मिल रही है अपनी आपबीती व पुरानी यादों को ताजा कर रहे हैं.

दिव्य स्मृतियों के साथ लौटे नंदा राजजात यात्री

raj-jat-chhantoli-53fe39d427498_exlst (1)गोपेश्वर. नंदादेवी राजजात यात्रा नौटी में रविवार, 7 सितंबर को पूरी हो गई. लेकिन इस यात्रा की यादों के अलावा तीर्थयात्री भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों की सराहना करते नहीं थक रहे. नंदादेवी राजजात यात्रा की मुश्किल पहाड़ियों से जिंदा वापस लौटने के लिये कई लोगों ने आईटीबीपी के जवानों की भूरि-भूरि प्रशंसा की. कुमायूं से नन्दादेवी की यात्रा में शामिल हुए राकेश कुमार ने बताया कि रूपकुंड के पास मेरी तरह कई तीर्थयात्री आईटीबीपी की मेडिकल टीम और रेस्क्यू के लिये तैनात जवानों की सहायता से बच पाये. नौटी से कांसुवा गांव के कुवरों की विदाई के साथ अगले बारह साल के लिये नंदा की यह यात्रा थम गई है. बैदनी से लेकर सुतोल के बीच भारत तिब्बत सीमा पुलिस के सौ जवान यात्रियों को पड़ावों तक पहुंचाने में सहायता करते रहे. यात्रा में गोपेश्वर से गये महादेव ने कहा,’जहां एक कदम चलने के बाद सांस फूल रही थी, वहीं आईटीबीपी के जवान हर दो सौ मीटर पर यात्रियों का हौसला बढ़ा रहे थे’. वहीं भाजपा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक और टम्टा ने नंदा राजजात यात्रा में बदइंतजामी और अव्यवस्था का आरोप लगाते हुए इस पूरी तरह विफल बताया था. इसके जवाब में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बयान को बेतुका बताते हुए कहा कि इससे उत्तराखंड की छवि को नुकसान पहुंचेगा.

Nanda Deviनंदादेवी राजजात होमकुंड में पूरी हो गई है. बुधवार, 3 सितंबर को दोपहर नंदादेवी को कैलाश विदा करने की आखिरी पूजा शुरू हुई. चौसिंग्या मैढ़े को अकेले कैलाश की ओर विदा किया गया. इसके साथ ही यात्रा के साथ चल रहे पांच अन्य मैढ़े भी हिमालय के उच्च शिखरों के बीच आगे की यात्रा के लिए छोड़े गए. होमकुंड में इसी के साथ राजजात के आयोजकों को जल से भरे घड़े देकर वापसी की यात्रा के लिए रवाना किया गया. होमकुंड में देवी की मूर्ति और राजछतोली का विसर्जन कर यात्रा की वापसी शुरू हुई. घड़े में भरे जल को प्रसाद के रूप में दिया गया. होमकुंड के पानी से भरे ये घड़े कांसवा और नौटी लाकर देवी-देवताओं को समर्पित किए जाएंगे. होमकुंड में इस आयोजन के साथ 280 किमी लंबी पैदल यात्रा अपने 17वें पड़ाव चंदनियांघाट पहुंच गई है. 18 अगस्त को नौटी से शुरू हुई यह यात्रा अब तक लगभग 175 किमी से ज्यादा की यात्रा पूरी कर चुकी है. गौरतलब है कि नौटी, इड़ाबधाणी, कांसुआ, सेम, कोटी, भगोती, कुलसारी, चेपडियूं, नंदकेसरी,फल्दियागांव, मुन्दोली, वाण के यात्रा पड़ाव आबादी वाले क्षेत्रों में थे. वहीं गैरोलीपातल, वेदनी, पातरनचौणियां, शिलासमुद्र और चन्दनियांघाट यात्रा के निर्जन पड़ाव रहे. चन्दनियांघाट के बाद यात्रा आज सुतोल पहुंचेगी.

 

 

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