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14 अगस्त/जन्म-दिवस; वरिष्ठ प्रचारक: शशिकांत चौथाइवाले

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श्री शशिकांत कृष्णराव चौथाइवाले का जन्म 14 अगस्त, 1937 (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) को कलमेश्वर (महाराष्ट्र) में हुआ था. यह परिवार मूलतः बारसी (सोलापुर) का निवासी है. इनकी माता श्रीमती इंदिरा चौथाइवाले थीं.

पूरा परिवार संघ में सक्रिय होने के कारण गांधी जी की हत्या के बाद इनके इतवारी स्थित घर पर डेढ़-दो हजार कांग्रेसियों ने हमला बोल दिया. उस समय सबसे बड़े भाई बाबूराव शाखा के मुख्यशिक्षक थे. शाखा का ध्वज उनके घर पर ही रहता था. सब भाइयों ने मिलकर ध्वज को अनाज के कुठार में छिपा दिया. कुछ देर तक उपद्रवी घर को छानते रहे; पर जब कुछ नहीं मिला, तो निराश होकर चले गये. बाबूराव के कारण इस घर में संघ के सभी कार्यकर्ताओं का आवागमन लगा रहता है. श्री गुरुजी इसे अपना दूसरा घर कहते थे.

शशिकांत जी अपने बड़े भाइयों श्री बाबूराव, मधुकरराव, सुधाकरराव तथा शरदराव के साथ नागपुर में ही स्वयंसेवक बने. उन्होंने नागपुर के प्रख्यात साइंस कॉलिज से सांख्यिकी विषय लेकर प्रथम श्रेणी में एम.एस-सी की उपाधि ली थी. इसके बाद उन्हें साइंस कॉलिज में ही प्राध्यापक बनने का निमन्त्रण मिला; पर उन्होंने इसे ठुकराकर प्रचारक बनने का निश्चय कर लिया था.

इससे उनके कई मित्र और अध्यापक नाराज हुये. उन्होंने कहा कि यदि प्रचारक ही बनना था, तो इतने परिश्रम से एम.एस-सी क्यों की ? शशिकांत जी ने उत्तर दिया कि पढ़ाई का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है, नौकरी करना नहीं. इससे पूर्व उनके बड़े भाई शरदराव भी प्रचारक बन कर विदर्भ में काम कर रहे थे. शशिकांत जी के बाद उनके छोटे भाई अरविंद चौथाइवाले भी प्रचारक बने. सबसे बड़े भाई बाबूराव चौथाइवाले ने अध्यापन कार्य तथा परिवार चलाते हुए 1954 से 94 तक नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर सरसंघचालक श्री गुरुजी और फिर बालासाहब देवरस का पत्र-व्यवहार संभाला था.

इस प्रकार 1962 में उनका प्रचारक जीवन प्रारम्भ हुआ. उन दिनों असम में काम बहुत नया तथा कम था. वहां प्रतिभावान, सुयोग्य तथा कष्टों में भी काम करने वाले प्रचारकों की आवश्यकता थी. अतः शशिकांत जी को असम में तिनसुकिया जिले में प्रचारक का कार्य दिया गया. असम में अनेक भाषा और बोलियां प्रचलित हैं. खानपान की भिन्नता भी वहां पर्याप्त है; पर शशिकांत जी ने सबसे सामंजस्य बैठाते हुए दूरस्थ स्थानों पर शाखायें स्थापित कीं.

इसके बाद वे विभाग प्रचारक, प्रान्तीय शारीरिक प्रमुख, सह प्रान्त प्रचारक, प्रान्त प्रचारक और क्षेत्र प्रचारक रहते हुए असम में काम करते रहे. असम में वनवासी एवं पर्वतीय क्षेत्र की बहुलता है. अतः वहां वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती आदि के कार्य को भी उन्होंने सशक्त किया. इन दिनों उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं रहता. अतः वे क्षेत्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के नाते सबको अपने अनुभव से लाभान्वित करते रहते हैं.

1975 के प्रतिबंध के समय शशिकांत जी भूमिगत रहकर असम में ही  सत्याग्रह का संचालन करते रहे. वे कई बार ब्रह्मदेश की सीमा तक होकर आये तथा वहां रह रहे हिन्दुओं से संबंध स्थापित किया. सरल स्वभाव वाले शशिकांत जी की आवाज बहुत मधुर है. अपनी बात को सरल और स्पष्टता से रखने के कारण उनकी बात को लोग ध्यान से सुनते और समझते हैं.

शशिकांत जी स्वस्थ रहें, यही कामना और प्रार्थना है.

(संदर्भ: नागपुर, शरदराव से वार्तालाप 14.4.2012)

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