14 अगस्त / बलिदान दिवस – देश पर बलिदान होने की खुशी में 4.5 किग्रा बढ़ गया वजन Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. अपनी मृत्यु की बात सुनते ही अच्छे से अच्छे व्यक्ति का दिल बैठ जाता है. उसे कुछ खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, पर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐसे क्रान नई दिल्ली. अपनी मृत्यु की बात सुनते ही अच्छे से अच्छे व्यक्ति का दिल बैठ जाता है. उसे कुछ खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, पर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐसे क्रान Rating: 0
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    14 अगस्त / बलिदान दिवस – देश पर बलिदान होने की खुशी में 4.5 किग्रा बढ़ गया वजन

    vande_mataramनई दिल्ली. अपनी मृत्यु की बात सुनते ही अच्छे से अच्छे व्यक्ति का दिल बैठ जाता है. उसे कुछ खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, पर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐसे क्रान्तिकारी भी हुए हैं, जिनकी फांसी की तिथि निश्चित होते ही प्रसन्नता में वजन बढ़ना शुरू हो गया. ऐसे ही एक वीर थे सरदार बन्ता सिंह. बन्ता सिंह का जन्म वर्ष 1890 में ग्राम सागवाल (जालन्धर, पंजाब) में हुआ था. वर्ष 1904-05 में कांगड़ा में भूकम्प के समय अपने मित्रों के साथ बन्ता सिंह सेवाकार्य में जुटे रहे. पढ़ाई पूरी कर वे चीन होते हुए अमरीका चले गये. वहां उनका सम्पर्क गदर पार्टी से हुआ. उनकी योजना से वे फिर भारत आ गये.

    एक बार लाहौर के अनारकली बाजार में एक थानेदार ने उनकी तलाशी लेनी चाही. बन्ता सिंह ने उसे टालना चाहा, पर वह नहीं माना. उसकी जिद देखकर बन्ता सिंह ने आव देखा न ताव, पिस्तौल निकालकर दो गोली उसके सिर में उतार दी. थानेदार वहीं ढेर हो गया. अब बन्ता सिंह का फरारी जीवन शुरू हो गया. एक दिन उनका एक प्रमुख साथी प्यारा सिंह पकड़ा गया. क्रान्तिकारियों ने छानबीन की, तो पता लगा कि जेलर चन्दा सिंह उनके पीछे पड़ा है. 25 अप्रैल, 1915 को बन्ता सिंह, बूटा सिंह और जिवन्द सिंह ने जेलर को उसके घर पर ही गोलियों से भून दिया. इसी प्रकार चार जून, 1915 को एक अन्य मुखबिर अच्छर सिंह को भी ठिकाने लगाकर यमलोक पहुंचा दिया गया.

    गदर पार्टी पूरे देश में क्रान्ति की आग भड़काना चाहती थी. इसके लिए बड़ी मात्रा में शस्त्रों की आवश्यकता थी. बन्ता सिंह और उसके साथियों ने एक योजना बनायी. उन दिनों क्रान्तिकारियों के भय से रेलगाड़ियों के साथ कुछ सुरक्षाकर्मी चलते थे. एक गाड़ी प्रातः चार बजे बल्ला पुल पर से गुजरती थी. उस समय उसकी गति बहुत कम हो जाती थी. 12 जून, 1915 को क्रान्तिकारी उस गाड़ी में सवार हो गये. जैसे ही पुल आया, उन्होंने सुरक्षाकर्मियों पर ही हमला कर दिया. अचानक हुए हमले से डर कर वे हथियार छोड़कर भाग गये. अपना काम पूरा कर क्रान्तिकारी दल भी फरार हो गया. अब तो प्रशासन की नींद हराम हो गयी. उन्होंने क्रान्तिकारियों का पीछा किया. बन्ता सिंह जंगल में साठ मील तक भागते रहे. वे बच तो गये, पर उनके पैर लहूलुहान हो गये. थकान और बीमारी से सारा शरीर बुरी तरह टूट गया. वे स्वास्थ्य लाभ के लिए घर पहुंचे, पर उनके एक सम्बन्धी को लालच आ गया. वह उन्हें अपने घर ले गया और पुलिस को सूचना दे दी.

    जब पुलिस वहां पहुंची, तो बन्ता सिंह आराम कर रहे थे. उन्होंने पुलिस दल को देखकर ठहाका लगाया और उस रिश्तेदार से कहा, यदि मुझे पकड़वाना ही था, तो मेरे हाथ में कम से कम एक लाठी तो दे दी होती. मैं भी अपने दिल के अरमान निकाल लेता. पर अब क्या हो सकता था ? उनकी गिरफ्तारी का समाचार मिलते ही उनके दर्शन के लिए पूरा नगर उमड़ पड़ा. हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़े बन्ता सिंह ने नगर वासियों को देखकर कहा कि मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. कुछ समय बाद ही ये अंग्रेज आपके पैरों पर लौटते नजर आयेंगे. ‘भारत माता की जय’, ‘बन्ता सिंह जिन्दाबाद’ के नारों से न्यायालय गूंज उठा.

    बन्ता सिंह को 25 जून को पकड़ा गया था. उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर 14 अगस्त, 1915 को फांसी दे दी गयी. देश के लिए बलिदान होने की खुशी में 50 दिनों की अवधि में बन्ता सिंह का वजन 4.5 किलो बढ़ गया था.

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