18 नवम्बर / जन्मदिवस – परोपकार की प्रतिमूर्ति स्वामी प्रेमानन्द Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. भारत में सन्यास की एक विशेष परम्परा है. हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर सन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है, पर कई लोग पूर्व जन् नई दिल्ली. भारत में सन्यास की एक विशेष परम्परा है. हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर सन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है, पर कई लोग पूर्व जन् Rating: 0
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    18 नवम्बर / जन्मदिवस – परोपकार की प्रतिमूर्ति स्वामी प्रेमानन्द

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    नई दिल्ली. भारत में सन्यास की एक विशेष परम्परा है. हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर सन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है, पर कई लोग पूर्व जन्म के संस्कार या वर्तमान जन्म में अध्यात्म और समाज सेवा के प्रति प्रेम होने के कारण ब्रह्मचर्य से सीधे सन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो जाते हैं. आद्य शंकराचार्य ने समाज में हो रहे विघटन एवं देश-धर्म पर हो रहे आक्रमण से रक्षा हेतु दशनामी सन्यासियों की परम्परा प्रारम्भ की. पर, इन दशनाम सन्यासियों से अलग भी अनेक प्रकार के पन्थ और सम्प्रदाय हैं, जिनमें रहकर लोग सन्यास व्रत धारण करते हैं. ऐसे लोग प्रायः भगवा वस्त्र पहनते हैं, जो त्याग और बलिदान का प्रतीक है.

    ऐसे ही एक सन्यासी थे स्वामी प्रेमानन्द जी, जिन्होंने सन्यास लेने के बाद समाज सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया. वे पूजा पाठ एवं साधना तो करते थे, पर उनकी मुख्य पहचान परोपकार के कामों से हुई. स्वामी जी का जन्म 18 नवम्बर, 1930 को पंजाब के एक धनी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ. सम्पन्नता के कारण सुख-वैभव चारों ओर बिखरा था, पर प्रेमानन्द जी का मन इन भौतिक सुविधाओं की बजाय ध्यान, धारणा और निर्धन-निर्बल की सेवा में अधिक लगता था. इसी से इनके भावी जीवन की कल्पना अनेक लोग करने लगे थे.

    प्रेमानन्द जी का बचपन कश्मीर की सुरम्य घाटियों में बीता. वहाँ रहकर उनका मन ईश्वर के प्रति अनुराग से भर गया. वे अपने जीवन लक्ष्य के बारे में विचार करने लगे. पर, उन्होंने शिक्षा की उपेक्षा नहीं की. उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में और पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए किया. इसके बाद वे अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे, पर उनके लिए तो परमपिता परमात्मा ने कोई और काम निर्धारित कर रखा था. धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक माया मोह से हट गया. वे समझ गये कि भौतिक वस्तुओं में सच्चा सुख नहीं है. वह तो ईश्वर की प्राप्ति और मानव की सेवा में है. उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और अपने आध्यात्मिक गुरु से सन्यास की दीक्षा ले ली. लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते थे, पर अब उनके जीवन का मार्ग दूसरा ही हो गया था.

    स्वामी जी ने मानव कल्याण के लिए अनेक ग्रन्थों की रचना की. उन्होंने हिन्दी में मानव जाग, जीव श्रृंगार, अंग्रेजी में आर्ट ऑफ़ लिविंग, लाइफ ए टेण्डर स्माइल तथा उर्दू में ऐ इन्सान जाग नामक पुस्तकें लिखीं. ये पुस्तकें आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं, क्योंकि इनसे पाठकों को अपना जीवन सन्तुलित करने का पाथेय मिलता है. इन पुस्तकों में उनके प्रवचन भी संकलित हैं, जो सरल भाषा में होने के कारण आसानी से समझ में आते हैं.

    उनके लेखन और प्रवचन का मुख्य विषय विज्ञान और धर्म, विश्व शान्ति, विश्व प्रेम, नैतिक और मानवीय मूल्य, वेदान्त और जीवन की कला आदि रहते थे. उन्होंने साधना के बल पर स्वयं पर इतना नियन्त्रण कर लिया था कि वे कुल मिलाकर ढाई घण्टे ही सोते थे. शेष समय वे सामाजिक कामों में लीन रहते थे. 23 अप्रैल, 1996 को मुकेरियाँ (पंजाब) के पास हुई एक दुर्घटना में स्वामी जी का देहान्त हो गया. आज भी उनके नाम पर पंजाब में अनेक विद्यालय और धर्मार्थ चिकित्सालय चल रहे हैं.

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