22 मई / बलिदान दिवस – अमर बलिदानी मुरारबाजी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की. फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गय नई दिल्ली. पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की. फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गय Rating: 0
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    22 मई / बलिदान दिवस – अमर बलिदानी मुरारबाजी

    नई दिल्ली. पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की. फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गये. तभी उन्हें सूचना मिली कि मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ पूना में पुरन्दर किले की ओर बढ़ रहे हैं. शिवाजी दक्षिण अभियान को स्थगित करना नहीं चाहते थे, पर इन्हें रोकना भी आवश्यक था. कुछ ही समय में मुगल सेना ने पुरन्दर किले को घेर लिया. वह निकटवर्ती गांवों में लूटपाट कर आतंक फैलाने लगी. इससे शिवाजी ने मुगलों की चाकरी कर रहे मिर्जा राजा जयसिंह को एक लम्बा पत्र लिखा, जो अब एक ऐतिहासिक विरासत है, पर जयसिंह पर कोई प्रभाव नहीं हुआ. उल्टे पुरन्दर किले पर हमले और तेज हो गये.

    पुरन्दर किला दो चोटियों पर बना था. मुख्य किला 2,500 फीट ऊँची चोटी पर था, जबकि 2,100 फीट वाली चोटी पर वज्रगढ़ बना था. जब कई दिन के बाद भी मुगलों को किले को हथियाने में सफलता नहीं मिली, तो उन्होंने वज्रगढ़ की ओर से तोपें चढ़ानी प्रारम्भ कर दीं. मराठा वीरों ने कई बार उन्हें पीछे धकेला, पर अन्ततः मुगल वहां तोप चढ़ाने में सफल हो गये. इस युद्ध में हजारों मराठा सैनिक मारे गये. पुरन्दर किले में मराठा सेना का नेतृत्व मुरारबाजी देशपाण्डे कर रहे थे. उनके पास 6,000 सैनिक थे, जबकि मुगल सेना 10,000 की संख्या में थी और फिर उनके पास तोपें भी थीं. किले पर सामने से दिलेर खाँ ने, तो पीछे से राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह ने हमला बोल दिया. इससे मुरारबाजी दो पाटों के बीच संकट में फँस गये.

    उनके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे. शिवाजी ने समाचार पाते ही नेताजी पालकर को किले में गोला-बारूद पहुंचाने को कहा. उन्होंने पिछले भाग में हल्ला बोलकर इस काम में सफलता पाई, पर वे स्वयं किले में नहीं पहुंच सके. इससे किले पर दबाव तो कुछ कम हुआ, पर किला अब भी पूरी तरह असुरक्षित था. किले के मराठा सैनिकों को अब आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी. मुरारबाजी को भी कुछ सूझ नहीं रहा था. अन्ततः उन्होंने आत्माहुति का मार्ग अपनाते हुए निर्णायक युद्ध लड़ने का निर्णय लिया. किले का मुख्य द्वार खोल दिया गया. बचे हुए 700 सैनिक हाथ में तलवार लेकर मुगलों पर टूट पड़े. इस आत्मबलिदानी दल का नेतृत्व स्वयं मुरारबाजी कर रहे थे. उनके पीछे 200 घुड़सवार सैनिक भी थे. भयानक मारकाट प्रारम्भ हो गयी.

    मुरारबाजी मुगलों को काटते हुए सेना के बीच तक पहुंच गये. उनकी आँखें दिलेर खाँ को तलाश रही थीं. वे उसे जहन्नुम में पहुंचाना चाहते थे, पर वह सेना के पिछले भाग में हाथी पर एक हौदे में बैठा था. मुरारबाजी ने एक मुगल घुड़सवार को काटकर उसका घोड़ा छीना और उस पर सवार होकर दिलेर खाँ की ओर बढ़ गये. दिलेर खाँ ने यह देखकर एक तीर चलाया, जो मुरारबाजी के सीने में लगा. इसके बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर दिलेर खाँ की ओर अपना भाला फेंककर मारा. तब तक एक और तीर ने उनकी गर्दन को बींध दिया. वे घोड़े से निर्जीव होकर गिर पड़े.

    यह ऐतिहासिक युद्ध 22 मई, 1665 को हुआ था. मुरारबाजी ने जीवित रहते मुगलों को किले में घुसने नहीं दिया. ऐसे वीरों के बल पर ही छत्रपति शिवाजी क्रूर विदेशी और विधर्मी मुगल शासन की जड़ें हिलाकर ‘हिन्दू पद पादशाही’ की स्थापना कर सके.

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