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24 सितंबर / पुण्यतिथि – अजातशत्रु श्री महीपति बालकृष्ण चिकटे

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Chikte ji Vyaktitvaचिकटे जी के बड़े भाई श्री गोविन्द बालकृष्ण चिकटे मध्य प्रदेश के राज्यपाल श्री चांडी के पी.ए. रहे थे. वे अनेकों मंत्रियों के भी पी.ए रहे. चिकटे जी की पूज्य माता जी का स्वर्गवास हुआ, तब वे केवल एक वर्ष के ही थे. उनके मैट्रिक करते ही पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया. किन्तु भाई-बहनों का प्रेम उन्हें भरपूर मिला. सबसे छोटे होने के कारण सब प्यार से उन्हें बाल बुलाते थे. अतः स्वाभाविक ही अपने भाई-बहनों से उनका अथाह स्नेह था. उनकी तीन बड़ी बहनों में से केवल सबसे बड़ी बहन शकुन्तला जी ही विवाहित थी. उनका विवाह शाजापुर जिले के आगर में हुआ. शेष दो बहनें गोदावरी तथा सुशीला अविवाहित ही रहीं. दोनों शा.उ.मा.वि. की प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुई.

बाल्यकाल से ही चिकटे जी के जुझारू तेवर रहे. गांधी जी की हत्या के मिथ्या आरोप में लगाए गए प्रथम प्रतिबन्ध काल में संघ के विरुद्ध इकतरफा दुष्प्रचार चल रहा था. संघ की ओर से कहने-सुनने वाला कोई नहीं था. ग्वालियर के कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति से निपटने के लिये एक समाचारपत्र प्रकाशन का निश्चय किया. तदनुसार “सुदर्शन” नाम से पंजीयन कराया गया. उसके प्रकाशक भगवती प्रसाद जी तथा मदन मोहन दुबे जी सम्पादक बने. श्यामाचरण लवानियां नामक एक कांग्रेसी मानसिकता के प्रेस मालिक उसे छापने को तैयार हो गये और पहला अंक छपकर तैयार भी हो गया. किन्तु तब तक भगवती प्रसाद सत्याग्रह कर गिरफ्तार हो गये. प्रेस मालिक श्यामाप्रसाद जी ने समाचारपत्र देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मेरी बात तो भगवती प्रसाद जी से हुई है, उन्हें ही समाचार पत्र दूंगा. किन्तु दैवयोग से भगवती प्रसाद जी की दादी जी का स्वर्गवास हो जाने के कारण उन्हें अंतिम संस्कार के लिये जमानत मिल गई. उस दौरान समाचार-पत्र का वह प्रथम अंक प्रेस मालिक से ले लिया गया.

Chikte ji with Atal jiअब समस्या थी, उस समाचारपत्र को वितरित करने की. जिसका जिम्मा उठाया किशोर स्वयंसेवकों की एक टोली ने, जिसकी अगुआई की महीपति बालकृष्ण चिकटे ने. ग्वालियर का ह्रदय स्थल कहे जाने बाले महाराज बाड़े पर इन स्वयंसेवकों ने उस समाचार पत्र का वितरण शुरू किया. जब तक पुलिस को जानकारी मिले तब तक सारे समाचार पत्र वितरित हो गये. किन्तु पुलिस ने सभी बाल स्वयंसेवकों को सत्याग्रह करने के आरोप में बंदी बनाकर जेल भेज दिया, साथ ही सुदर्शन के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी.

बंदी जीवन के तत्काल बाद चिकटे जी संघ प्रचारक के रूप में कार्य करने लगे. इसी समय वे लखनऊ में राष्ट्रधर्म पत्रिका के प्रकाशन में श्री दीनदयाल जी उपाध्याय तथा श्री अटल बिहारी जी वाजपेयी के सहयोगी रहे. यहाँ प्रेस में छपाई कार्य करते समय उनका हाथ भी दब गया, जिसके कारण उनके एक हाथ की चार उंगलियाँ चपटी हो गईं.

प्रारम्भिक दौर में, चिकटे जी को मौ में विद्यालय स्थापित करने हेतु भेजा गया. योजना यह थी कि उस दुर्गम क्षेत्र में वे शिक्षा के माध्यम से संघ कार्य करेंगे. अत्यंत परिश्रम से उन्होंने लोकमान्य तिलक विद्यालय प्रारम्भ किया. किन्तु वहां विद्यालय संचालन समिति के अध्यक्ष तथा प्रमुख कांग्रेसी नेता भूता जी से मतभेद के चलते मामाजी, चिकटे जी तथा गंभीर सिंह जी आदि ने तय किया कि एक नया विद्यालय प्रारम्भ किया जाये. इस हेतु अडोखर, टपरा तथा लहार के बीच एक स्थान का चयन कर विद्यालय भवन का निर्माण प्रारम्भ किया गया. अडोखर से अ, टपरा से ट तथा लहरा से ल अक्षर मिलाकर इस स्थान का नाम अटल नगर रखा गया. तत्कालीन जिलाधीश आर सी राय मामाजी से अत्याधिक प्रभावित थे. उनके सहयोग से आठ बीघा भूमि विद्यालय के लिये मिल गई तथा जन सहयोग से विद्यालय निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ.

उन दिनों चूने से भवन निर्माण होता था तथा पत्थर के बड़े-बड़े चक्कों से चूने को मिलाया जाता था. इन चक्कों को दो बैल मिलकर खींचते थे. दैवयोग से केवल एक ही बैल उपलब्ध हुआ. काम को रुका देखकर चिकटे जी बैल की जगह स्वयं जुत गये. ग्रामवासी कुछ समय तक तो यह तमाशा देखते रहे किन्तु फिर उन्हें लगा कि हमारे बच्चों की खातिर चिकटे जी इतना श्रम कर रहे हैं. उनके हृदय में चिकटे जी के प्रति सम्मान जागृत हुआ और फिर तो क्या वृद्ध क्या जवान, सभी कार्य में जुट गये. इस घटना के बाद से अवैतनिक प्रधानाचार्य चिकटे जी तो पूरे गाँव ही नहीं, पूरे क्षेत्र के लिये श्रद्धेय हो गये. इस घटना ने संघ कार्य स्थापित करने में अहम् भूमिका निभायी.

आज भी उस स्थान पर पहुँचना काफी कठिन होता है, फिर उस समय तो वह बिल्कुल ही दुर्गम क्षेत्र था. सड़क से तीस कि.मी. पैदल चलकर अथवा बैलगाड़ी से ही वहां जाया जा सकता था. वहां प्रारम्भ में सरस्वती उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तथा बाद में राजमाता विजयाराजे सिंधिया महाविद्यालय प्रारम्भ होना संघ स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम का ही प्रतिफल है. महापुरुषों के श्रम सीकरों से सिंचित उस क्षेत्र में संघ कार्य की जड़ें गहरी हैं.

सनक सनंदन सनत्कुमार की तपोभूमि सनकुआ सेवढा में प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति के अवसर पर मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं. ग्वालियर से एक बार चिकटे जी के साथ वरिष्ठ स्वयंसेवक श्री अरविंद धारप, श्री उदय काकिर्ड़े, श्री पद्माकर मोघे, श्री विवेक शेजवलकर भी मेले में पहुंचे. लौटते समय बसों में भारी भीड़ थी. ऊपर छत पर भी यात्री बैठे हुये थे. यह स्थिति देखकर इन लोगों को चिंता हुई कि वापस ग्वालियर कैसे पहुचेंगे. किन्तु चिकटे जी मस्ती से मुस्कुराकर स्थिति का आनंद ले रहे थे. शेष लोगों के अचरज का ठिकाना नहीं रहा, जब देखा कि चिकटे जी को देखते ही लगभग पूरी बस के यात्री नीचे उतरकर अपनी-अपनी सीट देने लगे. भिंड और दतिया क्षेत्र में इतना आदर का भाव था चिकटे जी के लिये. हरजूपुरा के बलबंत सिंह, मढेपुरा के नाथूसिंह व जगन्नाथ सिंह, रोन के अरविंद सिंह कुशवाह, लहार के कृष्णकांत शर्मा के पिताजी आशाराम त्यागी, अड़ोखर महाविद्यालय के प्राचार्य श्री रामसिया चौहान, प्रसिद्द लेखक व कवि श्री शैवाल सत्यार्थी आदि लोग चिकटे जी के अनन्य भक्तों में से थे.

परम पूज्य सुदर्शन जी चिकटे जी की क्षमताओं से भली भाँती परिचित थे, अतः जब वे उत्तर पूर्व क्षेत्र प्रचारक नियुक्त हुये, तब उन्होंने चिकटे जी को असम की जन जातीय भाषा को लिपि देने के दुष्कर कार्य हेतु असम भेजा. असम के दुरूह वनवासी अंचलों में घूम-घूम कर चिकटे जी ने बंगला व असमिया भाषा, उसके उच्चारण तथा उच्चारणकर्ता की भाव-भंगिमा का गंभीर अध्ययन किया. उनके अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप ही परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान उनकी जीवनी जनजातीय बोली में तथा देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुई. बंगला, मराठी, तेलुगु, असमी, मणिपुरी, तमिल भाषाओं पर चिकटे जी का पूर्ण अधिकार था. अंग्रेजी में तो उन्होंने एम.ए. किया ही था. उनका संस्कृत उच्चारण भी अत्यंत परिष्कृत था. मीसाबंदी के रूप में एक सह बंदी से उन्होंने जर्मन भी पूरे मनोयोग से सीखी थी.

उनके स्वभाव में चुनौतियों से जूझने में एक जिद का भाव अत्यंत प्रबल था. 1947 में उन्होंने हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की थी. यद्यपि अन्य विषयों में उनके अंक पर्याप्त बेहतर थे, किन्तु अंग्रेजी में उनको पूरक परीक्षा देनी पड़ी. उस दुर्बलता को उन्होंने बहुत गंभीरता से लिया, एक कचोट उन्हें लग गई. और उसी के चलते स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने सबसे पहले अंग्रेजी में ही एम.ए. किया. उनकी विद्वत्ता को देखकर उन्हें माधव महाविद्यालय में अंग्रेजी का व्याख्याता नियुक्त कर दिया गया. वहां भी एक बड़ा रोचक प्रसंग सामने आया. अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में चिकटे जी धोती कुर्ता पहिनकर पढ़ाने जाते थे, किन्तु संस्कृत के व्याख्याता श्री चिंतामणि केलकर पेंट शर्ट पहिनकर आते थे. इस पर साथियों ने केलकर जी को चिढ़ाना शुरू किया और फिर तो स्थिति यह बनी कि चिंतामणि केलकर उपाख्य चिंतू भैया ने फिर आजीवन धोती कुर्ता ही पहिना.

परम पूज्य श्री गुरुजी ने ग्वालियर प्रवास के दौरान प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक में तत्कालीन महानगर कार्यवाह श्री महीपति बालकृष्ण चिकटे जी से पूछा कि नगर में कितने स्वयंसेवकों को प्रार्थना कंठस्थ है ? चिकटे जी ने तुरंत उत्तर दिया कि 60 प्रतिशत को. गुरूजी ने दूसरा प्रश्न किया कि कितनों को शुद्धता से आती होगी ? चिकटे जी ने उत्तर दिया 35 प्रतिशत को. गुरूजी का अगला प्रश्न था कि कितनों को अर्थ आता है. चिकटे जी ने कुछ सोचकर उत्तर दिया कि 20 प्रतिशत को. किन्तु गुरूजी के प्रश्न यहाँ ही समाप्त नहीं हुये. उनका अगला प्रश्न था कि “किती लोकांना चिकटली आहे” ? अर्थात प्रार्थना को कितने लोगों ने आचरण में उतारा है ? इसी प्रश्न में चर्चा का सार भी निहित था. चिकटे जी ने बिना कोई उत्तर दिये, बैठना ही उचित समझा.

1977 में जेल से छूटने के बाद जहां शेष मीसाबंदी विजय जुलूसों में स्वागत सत्कार कराने में व्यस्त थे, चिकटे जी कंधे पर एक थैला लटकाये पैदल पहुँच गये अरविंद धारप जी के घर शोक-संवेदना व्यक्त करने. श्री धारप के पिताजी एवं बड़े भाई इस आपातकाल के दौरान ही स्वर्गवासी हुये थे. छिंदवाड़ा के पास समसर में शासकीय शिक्षक रहे धारप जी ग्वालियर में सरस्वती शिशु मंदिर प्रारम्भ होने पर चिकटे जी के कहने पर नौकरी छोड़कर आ गये थे. धारप जी जब महाराष्ट्र से ग्वालियर आये थे, तब उन्हें हिन्दी नही आती थी, जो उन्हें चिकटे जी ने ही सिखाई. धारप जी को तैरना भी उन्होंने ही सिखाया. शुरुआत में ही महलगांव के कुंवर बाबा तालाब में लगभग 30 फुट ऊंचाई से कूदने को प्रेरित किया तथा उसके बाद सहारा देकर तालाब के बीच बने कमल पर बैठा दिया और फिर कह दिया कि अब किनारे आना है तो अपने आप आओ. साथ में गये दूसरे स्वयंसेवक सत्यप्रकाश चौरसिया को भी मदद करने से मना कर दिया. इस प्रकार पहले ही दिन तैरना सीख गये धारप जी. यह अनुभव अकेले धारप जी को ही नहीं वरन अनेकों स्वयंसेवकों को हुआ. सर्व श्री वसंत कुंटे, उदय जी काकिर्ड़े, विवेक शेजवलकर आदि सभी इसी प्रकार चिकटे जी के माध्यम से कुंअर बाबा कुंद में तैरना सीखे.

भावपूर्ण कथा-कहानी सुनाने में चिकटे जी अत्यंत प्रवीण थे. जब कहानी सुनाते तो सुनने बाले रोमांचित हो उठते. ‘पिन ड्रॉप साइलेंस’ हो जाता. सब अपने आप को भूलकर उस कथानक के वातावरण में स्वयं को अनुभव करने लगते. एसा ही एक प्रसंग ग्वालियर जे.सी.मिल में 2003 में लगे संघ शिक्षावर्ग का भी है. संघ शिक्षा वर्ग के समापन के अवसर पर श्री यादव राव जी का दीक्षांत बौद्धिक होना था. बौद्धिक के पूर्व प्रातः चिकटे जी को प.पू. डाक्टर हेडगेवार जी के स्वयंसेवकों को लिखे अंतिम पत्र का वाचन करने को कहा गया. डाक्टर साहब के चित्र पर मं प्रकाश, बांसुरी का गंभीर स्वर और चिकटे जी का भावपूर्ण वाचन, कुल मिलाकर ऐसा समन्वय बना कि सम्पूर्ण वातावरण अत्यंत ही हृदयस्पर्शी हो गया. यादव राव जी तो इतने विह्वल हो गये कि वे कुछ कहने की स्थिति में ही नही रहे. आँखों में आंसू और रुंधे कंठ से कोई क्या बौद्धिक देता? और विवशतः संघ शिक्षावर्ग का वह समापन कार्यक्रम बिना दीक्षांत बौद्धिक के ही हुआ.

वे जन्मजात शिक्षक थे, विद्यार्थी थे और यायावर थे. सीखने सिखाने और देशाटन का कोई अवसर वे अपने हाथ से नहीं जाने देते थे. कई बार तो स्वतः अवसर बना लेते थे. श्री वसंत कुंटे जी को साथ ले एक बार समर्थ रामदास स्वामी से सम्बंधित स्थानों के दर्शन का कार्यक्रम निर्मित किया. फिर क्या था, हो गई यात्रा प्रारम्भ. सतारा जिले में स्थित समर्थ के समाधि स्थल सज्जन गढ़, दासबोध का लेखन समर्थ ने जहां किया, वह शिवथर गुफा, 12 वर्ष की आयु में गृहत्याग कर जहां तपस्या की नासिक जिले का टाकली, समर्थ द्वारा स्थापित सभी 11 हनुमान मंदिर आदि स्थानों पर 15 दिन भ्रमण किया.

उन्हें अपनी मृत्यु का भी पूर्वाभास हो गया था. एक दिन पूर्व, वे मोची से अपनी बड़ी बहिन के लिये सेंडिल बनावाकर लाये. यह एक विशेष प्रकार का होता था. जिसकी एक एड़ी की ऊंचाई कुछ अधिक होती थी. जब मोची ने अगले दिन देने को कहा तो चिकटे जी ने कहा कि कल किसने देखा है. देना है आज ही दे. 24 सितम्बर 1999 को प्रातः काल स्नान उपरांत चिकटे जी प्रभु प्रार्थना में तल्लीन थे. जब भगवान को प्रणाम करने को सर नीचे झुकाया, दिव्य ज्योति में विलीन हो गये. एक परम शुद्ध आत्मा, विशुद्ध संन्यासी ही इस प्रकार की मृत्यु पाता है, जो कि वस्तुतः, चिकटे जी थे भी.

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