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3 नवम्बर/जन्म-दिवस; अन्तःप्रेरणा से बने प्रचारक नरमोहन दोसी

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किसी का जन्म और देहांत एक ही दिन हो; ऐसे संयोग कम ही होते हैं; पर मध्य प्रदेश के क्षेत्र प्रचारक श्री नरमोहन दोसी के साथ ऐसा ही हुआ. नरमोहन जी का जन्म तीन नवम्बर, 1947 को बांसवाड़ा (राजस्थान) में श्री देवीलाल दोसी के घर में हुआ था. उनका संघ जीवन भरपूर युवावस्था में प्रारम्भ हुआ.

1964 में उदयपुर के महाविद्यालय में पढ़ते समय वे छात्रावास में रहते थे. उनके कक्ष में रहने वाला दूसरा छात्र प्रह्लाद मेड़ात संघ का स्वयंसेवक था तथा नित्य शाखा जाता था. उसके आग्रह पर वे भी शाखा और कार्यालय जाने लगे और फिर धीरे-धीरे उनका जीवन संघमय होता चला गया.

1968 में उन्होंने संघ का प्रथम वर्ष का शिक्षण लिया. उदयपुर के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री लक्ष्मण सिंह शेखावत के समर्पित जीवन और प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होकर वे प्रचारक बन गये. इसके बाद 1969 और 70 में उन्होंने द्वितीय और तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया.

नरमोहन जी की मान्यता थी कि किसी कार्यकर्ता को प्रचारक बनाने का माध्यम यद्यपि कोई व्यक्ति ही होता है; पर वास्तव में उसकी अन्तःप्रेरणा ही उसे इस पथ पर आगे ले जाती है. उनके प्रचारक बनने के कुछ समय बाद एक समय उदयपुर में उनके जिला प्रचारक रहे श्री कौशल किशोर जी अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के चलते घर वापस चले गये. जाते समय उन्होंने नरमोहन जी से कहा कि मैंने तुम्हें अपनी शिक्षा पूर्ण कर प्रचारक बनने का आग्रह किया था; पर अब मैं ही प्रचारक जीवन को छोड़ रहा हूं. ऐसे में तुम्हारे मन पर कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा ?

नरमोहन जी ने कहा कि देश की आवश्यकता को देखते हुए मैं प्रचारक बना हूं. यद्यपि जिला प्रचारक होने के नाते आप निमित्त बने हैं; पर मेरी प्रेरक शक्ति तो मेरी अंतरात्मा है. इसलिये आपके प्रचारक रहने या न रहने से मेरे निश्चय पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा.

नरमोहन जी पहले उदयपुर तहसील प्रचारक रहे. इसके दो वर्ष बाद उन्हें वहां पर ही जिला प्रचारक का दायित्व दिया गया. 1970 से 1981 तक वे उदयपुर, राजसमुन्द और फिर जयपुर में जिला प्रचारक रहे. 1981 में पाली विभाग तथा 1989 में जोधपुर संभाग का काम उन्हें दिया गया. आगे चलकर जब राजस्थान को तीन प्रान्तों में बांटा गया, तो उन्हें जोधपुर प्रान्त प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी. 1997 में उन्हें मध्य प्रदेश का क्षेत्र प्रचारक बनाया गया. इस प्रकार उनका केन्द्र भोपाल तथा कार्यक्षेत्र राजस्थान से मध्य प्रदेश हो गया.

प्रवास की अधिकता तथा भोजन-विश्राम की अनियमितता से प्रायः वरिष्ठ प्रचारकों को अनेक रोग घेर लेते हैं. नरमोहन जी भी भीषण मधुमेह के शिकार हो गये. इसके बाद भी वे दवा एवं आवश्यक सावधानी के साथ प्रवास करते रहे. संघ की प्रतिवर्ष तीन बार केन्द्रीय बैठकें होती हैं. इनमें देश में चल रहे संघ कार्य की जानकारी लेकर आगामी योजनायें बनाई जाती हैं.

इसी क्रम में वर्ष 2004 की केन्द्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक नवम्बर मास में हरिद्वार में हुई. वहां तीन नवम्बर को नरमोहन जी को अचानक भीषण हृदयाघात हुआ और तत्काल ही उनका शरीरान्त हो गया. मां गंगा के तट पर सब वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया.

जो लोग जीवन भर मां गंगा के दर्शन न कर सकें, उनकी भी इच्छा रहती है कि उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जायें. यह सुखद आश्चर्य है कि जब नरमोहन जी का देहांत हुआ, तब वे भाग्यवश मां गंगा की गोद में ही थे. एक अन्य आश्चर्यजनक संयोग यह भी है कि उनके पिताजी के जन्म और देहांत का दिनांक भी एक ही था.

(संदर्भ: मध्यभारत की संघगाथा)

 

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