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सुप्त स्वाभिमान को झंकृत करने वाली वीरांगना

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प्रणय कुमार

विरला ही कोई होगा जो महारानी लक्ष्मीबाई के साहस, शौर्य एवं पराक्रम को पढ़-सुनकर विस्मित-चमत्कृत न होता हो. वे वीरता एवं संघर्ष की प्रतिमूर्त्ति थीं. मात्र 23 वर्ष की अवस्था में अंग्रेजों से लड़ते हुए 18 जून, 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं. पर, अपने जीवन का साहसपूर्ण बलिदान देकर उन्होंने देशभक्त हृदयों में क्रांति एवं स्वतंत्रता की ऐसी चिंगारी पैदा की, जो आज भी प्रेरणा की अग्निशिखा बन प्रज्ज्वलित होती है और अंधेरों के मध्य भी प्रकाशपुंज बन मार्ग दिखाती है. ध्येय के प्रति अद्भुत समर्पण सिखाती है. जनरल ह्यूरोज का यह कथन उनके साहस एवं पराक्रम का परिचय देता है कि ”अगर भारत की एक फीसदी महिलाएं इस लड़की की तरह आज़ादी की दीवानी हो गईं तो हम सब को यह देश छोड़कर भागना पड़ेगा.”

एक पुरुष प्रधान समाज में एक महिला का यूं डटकर मुक़ाबला करना, अपने समय के सबसे बड़े साम्राज्य से मोर्चा लेना सरल नहीं होता. और मोर्चा भी ऐसा कि अंग्रेज उनके नाम से थर-थर काँपते थे. उन्होंने अपनी बहादुरी, व्यावहारिक सूझ-बूझ, युद्ध-कौशल, बुद्धिमत्ता भरी रणनीति से ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलाकर रख दी थीं.

चिंताजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन-चरित्र तो दूसरी ओर आज की कूल डूड बेबियों की छुई-मुई सिनेमाई अदा और नाज़ो-नख़रे. वीरांगना लक्ष्मीबाई के देश की कूल ड्यूड बेबियाँ ”क्या अदा, क्या जलवे तेरे” जैसे गीतों के बोल पर मुग्ध होकर रीझ-रीझ जा रही हैं. प्रेम की गहराइयों में डूब जाने पर किसे आपत्ति होगी. पर यथार्थ से दूर कोरा स्वप्न और कायर पलायन जीवन को भीरु और निरुद्देश्य बनाता है. प्रसाधन-उद्योग ने पूरे देश को सौंदर्य-प्रतियोगिताओं के बाज़ार में परिणत कर दिया है. माँ-बहन-बेटियाँ-बहू जैसे संबोधन प्रायः निरर्थक हो गए हैं, स्त्रियाँ केवल उत्पादों को परोसने वाली उपकरण बनकर रह गई हैं या बनाकर रख दी गई हैं. आधुनिकता के नाम पर निर्लज्ज खुलेपन व अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है. वीरता व धीरता के स्थान पर ऐन्द्रिक कामुकता या भीरुता ही हमारी पहचान बनती जा रही है. त्याग-तपस्या के स्थान पर भौतिकता की भयावह आँधी चल पड़ी है और महाभोज की सार्वजनिक तैयारियाँ चल रही हैं. चलचित्र के रंजक युवा पीढ़ी के सबसे बड़े मार्गदर्शक बनते जा रहे हैं. नकली भवों, पुते गालों, कजरारे नयनों, मचलते दिलों में लक्ष्मीबाई जैसे उज्ज्वल और धवल चरित्र कैसे समा सकते हैं. कदाचित कभी समा भी सकेंगें या नहीं, तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता. परिवर्तन यदि जीवन का सत्य है तो कौन कहता है कि हर परिवर्तन सुखद और कल्याणकारी ही होता है.

ज़रा कल्पना कीजिए, दोनों हाथों में तलवार, पीठ पर बच्चा, मुँह में घोड़े की लगाम; हजारों सैनिकों की सशस्त्र-सन्नद्ध पंक्तियों को चीरती हुई एक वीरांगना अंग्रेजों के चार-चार जनरलों के छक्के छुड़ाती हुई, उन्हें काटती-चीरती हुई आगे बढ़ती है – क्या शौर्य और पराक्रम का इससे दिव्य एवं गौरवशाली चित्र कोई महानतम चित्रकार भी साकार कर सकता है? जो सचमुच वीर होते हैं, वे अपने रक्त से इतिहास का स्वर्णिम चित्र व भविष्य गढ़ते हैं. महारानी लक्ष्मीबाई, पद्मावती, दुर्गावती ऐसी ही दैदीप्यमान चरित्र थीं. विश्व-इतिहास में महारानी लक्ष्मीबाई जैसा चरित्र ढूँढे नहीं मिलता, यदि उन्हें विश्वासघात न मिलता तो इतिहास के पृष्ठों में उनका उल्लेख किन्हीं और ही अर्थों व संदर्भों में होता. देश की तस्वीर और तक़दीर कुछ और ही होती.

नमन है उस वीरांगना को – जिनके स्मरण मात्र से नस-नस में विद्युत- तरंगें दौड़ जाती हैं, स्वाभिमान से मस्तक ऊँचा हो उठता है, छातियाँ तनकर संगीनों के सम्मुख खड़ी हो जाती हैं, हृदय देशभक्ति के भाव से आप्लावित हो उठता है. कितना शुभ-सुंदर-स्वस्थ व कल्याणकारी होता कि इस देश की ललनाएँ, इस देश की बेटियाँ लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं से प्रेरित-पोषित-संचालित होतीं. कितना साहसिक होता कि इस देश की मां अपनी बेटियों के हाथों में गहने-कंगन-चूड़ियों के शृंगार के साथ-साथ साहस के तलवार और उपहार भी सौंपती, ताकि उनके दामन को छूने से पहले शोहदे-मनचले हजार बार सोचते.

वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान-दिवस पर कदाचित संभव हो तो अपनी बेटियों को उनका तेजोमय-उज्ज्वल जीवन-चरित्र अवश्य बताएँ-सुनाएँ. और बेटों को तो निश्चित बताएँ ताकि उन्हें यह याद रहे कि इस देश ने यदि सती सावित्री, देवी सीता, माता अनुसूया जैसे सेवा, त्याग, निष्ठा व समर्पण के चरित्र गढ़े हैं तो रानी लक्ष्मीबाई, महारानी पद्मावती, वीरांगना झलकारी बाई जैसे शौर्य व पराक्रम, साहस व स्वाभिमान के निर्भीक-जाज्वल्यमान चरित्र भी गढ़े हैं, जो हिम्मत हारने वालों को हौसला देती हैं तो दुष्टों-दुर्जनों-असुरों को सचेत-सावधान-स्तब्ध-भयाक्रांत करती हैं.

अपनी संततियों को निश्चित बताएँ कि यह भारत-भूमि वीर-प्रसूता है. यहाँ त्याग-बलिदान एवं साहस-स्वाभिमान की गौरवशाली परंपरा रही है. हमें देश व मातृभूमि के लिए जीना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो मर मिटने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. इसी में तरुणाई है, इसी में यौवन का असली शृंगार है, इसी में जीवन की सार्थकता है और इसी में कुल-गोत्र-परिवार का मान व गौरव है. जो देश  शोणित के बदले अश्रु बहाता है, वह सदा-सर्वदा के लिए स्वाधीन नहीं रह पाता. सनद रहे, राष्ट्र-देव पर ताजे-टटके पुष्प ही चढ़ाए जाते हैं, बासी-मुरझाए पुष्प तो राह की धूल में पड़े-सने अपने भाग्य को कोसते-तरसते-धिक्कारते रहते हैं. हम राष्ट्र-देव पर चढ़ाए जाने वाले ताजे-टटके पुष्प बनें, राह में पड़े, ठोकरें खाते बासी-मरझाए फूल नहीं. वही उस अद्भुत वीरांगना को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

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