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भगत सिंह, राजगुरु के बाद सुखदेव के बदले कुर्बान हुसैन क्यों?

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महाराष्ट्र में राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए क्रांतिकारियों के नाम के साथ खेल

मुंबई. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव. भारतमाता के ये सपूत देश की स्वाधीनता के लिए हँसते हँसते फांसी पर चढ़ गए. इन क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी थी. पहले लाहौर में साण्डर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय संसद में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुला विद्रोह किया. असेम्बली में बम फेंककर भागने से मना कर दिया और फांसी पर चढ़ गए.

लेकिन, महाराष्ट्र में क्रांतिकारियों के नाम से राजनीतिक स्वार्थ साधने का खेल चल रहा है, नए घटनाक्रम ने मंशा पर सवाल खड़े किये हैं. मराठी भाषा में आठवीं कक्षा की पुस्तक में भगत सिंह, राजगुरु के बाद स्वाभाविक रूप से सुखदेव का नाम आता है, लेकिन उनका नाम नहीं है, उनके स्थान पर तीसरा नाम कुर्बान हुसैन का दिया गया है. आखिर, यह मामला क्या है?

आठवीं कक्षा की पुस्तक (बालभारती) में दूसरा पाठ है “माझ्या देशावर माझे प्रेम आहे.” अर्थात् मैं मेरे देश से प्यार करता हूँ. ये वही पंक्ति है जो हम प्रतिज्ञा में बोलते हैं. इस पाठ के पहले पन्ने पर एक वाक्य में कहा गया है, “भगत सिंह, राजगुरु, कुर्बान हुसेन हे फासावर गेले. ते देशावर खरे खुरे प्रेम करत होते.” (भगत सिंह, राजगुरु और कुर्बान हुसैन फांसी पर चढ़ गए. वे देश से बहुत प्यार करते थे) यह पाठ ज्येष्ठ लेखक जदुनाथ थत्ते की प्रतिज्ञा पुस्तक से लिया गया है.

बता दें कि जदुनाथ थत्ते, भारतीय स्वातंत्र्य समर में सहभागी हुए थे और समाजवादी विचारक थे. लोगों के असंतोष पर बालभारती ने अपनी भूमिका स्पष्ट की है. उनका कहना है कि लेखक ने जैसे लिखा है, वैसा ही यह पाठ, बिना कोई बदलाव किये लिया गया है. उसमें बदलाव करने का हमें कोई हक़ नहीं है.

कौन है कुर्बान हुसैन?

अब्दुल रसूल कुर्बान हुसेन ये सोलापुर के पत्रकार थे, जो स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी हुए थे. कुर्बान हुसैन को १२ जनवरी १९३१ को फांसी दी गयी. तब उनकी आयु २२ वर्ष थी. सोलापुर में स्वाधीनता संग्राम पर रोक लगाने के लिए अंग्रेजों ने मार्शल कानून लागू किया था. इसके पश्चात सोलापुर में अंग्रेजों के विरोध में भव्य जुलूस निकाला गया, जिसका नेतृत्व कुर्बान हुसैन ने किया. इस अपराध के लिए उन्हें येरवडा में फांसी दी गयी. इनके साथ मलप्पा धनशेट्टी, किशन शारदा, जगन्नाथ शिंदे इन्हें भी फांसी दी गयी.

कुर्बान हुसैन के योगदान पर लोगों को कोई आशंका नहीं. बल्कि ऐसे सपूतों पर हमें गर्व है. परंतु, जिस पाठ के कारण विवाद होने की सम्भावना हो या लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचती हो, क्या उन्हें टालना संभव नहीं है? बच्चों की मानसिकता का विचार किया जाए तो भगत सिंह, राजगुरु के पश्चात सुखदेव का नाम आना अत्यंत स्वाभाविक है और इतिहास के पाठों में भी हम वही पढ़ते हैं. वर्तमान घटनाक्रम में सत्ता की मंशा पर सवाल खड़े स्वाभाविक है.

सर्वधर्म समभाव का भान रखते समय बच्चों की मानसिकता का विचार करना भी आवश्यक है? अपना सर्वधर्म समभाव का तत्त्व कायम रखने के लिए वह तत्त्व लोगों पर लादना योग्य है? पिछले कई वर्षों में बालभारती ने यह तत्त्व अपनाया है, सामाजिक एकता का विचार करते हुए वह स्वीकार्य है. परन्तु यह तत्त्व अगर लोगों की आस्था एवं श्रद्धा स्थानों को ठेस पहुँचाता हो तो वह कदापि योग्य नहीं. पाठ्यक्रम का नियोजन करते समय इन सभी चीजों का भान रखना आवश्यक है.

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