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दिवा स्वप्न का नहीं, अपितु संकल्पित होने का अवसर है अमृत काल

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आकाश अवस्थी

मनुष्य का स्वभाव है स्वप्न देखना और कहा भी जाता है कि देश वैसा ही बनेगा जैसा उसके नागरिक चाहेंगे. भारत भी इससे अछूता नहीं है. हम एक कदम बढ़ते हैं और दस कदमों के हसीन सपनों में खो जाते हैं. वर्तमान में भारत का नेतृत्व इस बात पर यकीन रखता है जो भारत को बेहतर मॉडल के रूप में विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सके. भारतीय राष्ट्र सीमाओं से घिरा होने के कारण राष्ट्र नहीं है, अपितु एक व्यापक सांस्कृतिक विरासत को अपने आप में समेटकर नागरिकों के मन में उत्साह का संचार कर रहा है.

राष्ट्र के उत्थान के लिए उपनिषदों के कथन ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जिथा को आत्मसात करना होगा जो कहता है कि जितना उपभोग के लिए आवश्यक है, उतना ही लेना चाहिए अर्थात त्यागपूर्वक उपभोग. क्या आज के परिवेश में हम इसे स्वीकार कर सकते हैं? चींटी देखी है, वह पहले वर्ष भर का भोजन जुटाती है, फिर उसके अनुसार उपभोग करती है. लेकिन हमने स्वान्तः सुखाय की पद्धति को धारण कर लिया है. यही कारण है कि हम पूर्वजों की भाँति सुखमय जीवन व्यतीत नहीं कर पा रहे हैं.

किसी भी देश की प्रगति के लिए आवश्यक है कि वह शिक्षा और अनुसंधान पर विशेष बल दे. नयी शिक्षा नीति इस दिशा में बढ़ता हुआ कदम भी है. भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सभ्यता के आरंभ से ही विज्ञान ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए थे. सिंधु घाटी सभ्यता के समय ही हमने बेहतरीन नगरीकरण की बुनियाद रख दी थी. जिसे आज सिविल इंजीनियरिंग या वस्तुकला के रूप में जानते हैं. भारत के पास आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा में अग्रणी होने के ऐतिहासिक साक्ष्य हैं. परंतु आज की स्थिति क्या है?

भारत अत्याधुनिक तकनीकों को विकसित करने के लिए काफी तत्पर है, आज उसी तत्परता का नतीजा है कि हम तकनीकी नवाचार में विश्व में दूसरे स्थान पर हैं. हमारी सॉफ्टवेयर कंपनियां इस इंडस्ट्री का नेतृत्व कर रही हैं. आज का दौर मशीन लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नैनो टेक्नोलॉजी, 5जी कम्युनिकेशन इत्यादि आधुनिक प्रोद्योगिकी का है, अगर भारत इसमें निवेश करता है तो भविष्य में हम आर्थिक और सामाजिक रूप से अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं जो सामरिक रूप से भी हमें मजबूती प्रदान करेगा.

भारत ने इस दिशा में कदम भी बढ़ाया है, कुछ समय पहले भारत ने नई, उभरती और रणनीतिक तकनीक (New and Emerging Strategic Technologies) डिविजन का गठन किया है. यह डिविजन नवीन तकनीकों के साथ साथ विदेश नीति तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विषय में अध्ययन करके भारत की भागीदारी को सुनिश्चित करेगा.

देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए शिक्षा के बजट पर विशेष ध्यान देना होगा. शिक्षा को नयी दिशा देने के उद्देश्य से गठित कोठारी आयोग ने बजट को 6 प्रतिशत करने की सिफारिश की थी. 31 जनवरी, 2022 को प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2019-20 में शिक्षा पर व्यय जीडीपी का 2.8 प्रतिशत था. जबकि 2020-21 एवं 2021-22 में यह जीडीपी का 3.1 प्रतिशत था. अमृत महोत्सव वर्ष में शिक्षा बजट ने भले ही एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया हो, किंतु अभी भी यह जीडीपी के 6 प्रतिशत के वांछित स्तर का लगभग आधा है.

चाणक्य के राज्य से संबंधित सप्तांग में सेना का विशेष महत्व है. सेना का राष्ट्रहित हेतु तत्पर रहना तथा दूसरे पर निर्भर नहीं होना किले को बचाने का प्रमुख नियम है. रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की सीख हमें रूस- युक्रेन युद्ध से भी लेनी होगी. प्रधानमंत्री अपने संबोधनों में निरतंर इस बात का जिक्र करते रहे हैं कि सेना को आत्मनिर्भर होना चाहिए. इसके लिए सैन्य उपकरण बनाने वली कंपनियों से राजनाथ सिंह ने आह्वान कियाकि  “Make in India, Make for India, Make for world”. यह हुआ भी है – 13 लाख से अधिक सैनिकों वाली भारतीय सेना 68% स्वदेशी उपकरणों का प्रयोग कर रही है. भारतीय नौसेना तो 95% जरूरतों को देश में ही पूरा कर रही है. आयात में आत्मनिर्भर होने के साथ साथ भारत को निर्यात में अपनी शक्ति को लगाना होगा, एक समाचार के अनुसार पिछले 8 वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 8 गुना तक बढ़ा है. यह नीति भी भारत के विकास में सहायक होगी.

साथ ही भारत में पिछले कुछ वर्षों में स्वच्छता अभियान, आयुष्मान भारत, जनधन योजना, एक देश एक कर जैसी नागरिक उपयोगी योजनाएं क्रियान्वयित हुई हैं. देश में महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, ट्रिपल तलाक, उज्ज्वला योजना जैसे कार्यों को भी संपादित किया गया है. जम्मू काश्मीर को मुख्यधारा में लाने के लिए अनुच्छेद 370 तथा धारा 35ए को भी हटाया गया ताकि वहाँ के नागरिकों को अन्य योजनाओं का बिना किसी भेदभाव के लाभ मिल सके. भारत की अपनी एक सांस्कृतिक पहचान है जो वर्षों से पार्श्व में अपना नंबर आने का इंतजार कर रही थी. वर्तमान सरकार ने राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर आदि का निर्माण कर उस विरासत को सहेजा है.

लेकिन क्या इतना काफी है? आज भारत को आंतरिक रूप से कमजोर करने की साजिश हो रही है. धर्म और जाति आधारित भेद खड़ा कर समाज में विभाजन की साजिश रची जा रही है. इस कार्य के लिए विदेशों से फंड मिल रहा है. किसान आंदोलन के दौरान लाल किला की घटना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. धर्मांधता में कुछ संकुचित मानसिकता के लोग आतंकी संगठनों में शामिल हो रहे हैं या अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मदद कर रहे हैं. अमृत काल का यह समय इन समस्याओं से निपटने का है.

भारत सरकार द्वारा घोषित 25 वर्ष का यह अमृतकाल आत्मनिर्भरता का है, गुलामी से संकुचित हुए विकास का है, त्याग का है. प्राचीनता को सँजोए रखते हुए नवीनता को धारण करने का है. हृदय की विशालता का है, नवाचारों की विविधता का है. यह समय छोटी छोटी उपलब्धियों पर हर्ष का नहीं, अपितु भविष्य के विश्वगुरु की भूमिका पर चिंतन मनन करने का है.

स्वतंत्रता का यह अमृतकाल हमारे करणीय कार्यों का है. यह जन कल्याण में लगने का समय है. अर्थात यह समय दिवा स्वप्न में रहने का नहीं, अपितु दृढ़ संकल्पित होकर सामूहिक प्रयास से भविष्य का भारत बनाने का समय है.

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