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अमृत महोत्सव – स्वाधीनता के बाल मतवाले

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गोपाल माहेश्वरी

बलि देकर भी मातृभूमि का मान बढ़ाना आता है.

खेल मृत्यु के साथ शत्रु को धूल चटाना आता है..

वे सब दसवीं-बारहवीं के छात्र थे. जन्म पाया था बंगाल के मिदनापुर और आसपास के नगरों-गांवों में. मिदनापुर क्रांतिकारियों का गढ़ था. पराक्रम ऐसा कि 1942 में ही अपना क्षेत्र अंग्रेज़ों की दासता से मुक्त करवा लिया था और वहाँ ‘राष्ट्रीय सरकार’ बना ली, लेकिन अंग्रेज़ों के हवाई सैन्य बल से धरती के सपूतों की यह उपलब्धि बमों की वर्षा करके पुनः छीन ली गई थी. फिर भी, साहसी कभी हिम्मत नहीं हारते.

सन् 1931 में यहीं के एक क्रांतिकारी संगठन ने घोषणा कर दी कि “मिदनापुर का जिलाधिकारी कोई भारतीय ही होगा. जब कोई अंग्रेज़ अधिकारी रहेगा तो उसे मार डाला जाएगा”.

जेम्स पैड्डी उस समय मजिस्ट्रेट पद पर नियुक्त था. उसने इस चुनौती को हल्के में लिया, लेकिन वीरों का वचन अटल और संकल्प अटूट होता है. वचन पूरा करने का बीड़ा उठाया एक क्रांतिकारी छात्र संगठन ने. यह गोपनीय ढंग से कार्य करता था. जेम्स पैड्डी एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में अतिथि बना प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहा था, तभी एक छात्र ने उसे गोलियों से छलनी कर दिया और ऐसा छूमन्तर हुआ कि उसे न कोई देख सका, न पकड़ सका. वह 7 अप्रैल, 1931 का दिन था. क्रांतिकारियों की चुनौती सही सिद्ध हुई.

 

अंग्रेज़ सरकार भी कम अड़ियल न थी. उन्हें अपने शस्त्रों और कुटिलता पर बड़ा गर्व था. चोट खाकर भी सुधरे नहीं और रॉबर्ट डगलस को जिला मेजिस्ट्रेट बना दिया गया. लेकिन वह जेम्स की हत्या से अन्दर ही अन्दर डरा हुआ था. धमकी भरे पत्रों ने उसकी नींदें उड़ा रखी थीं. वह जिला बोर्ड का अध्यक्ष भी था. 30 अप्रैल, 1932 को वह बोर्ड की एक आवश्यक मीटिंग पूरी करने ही वाला था कि ठाँय-ठाँय आठ गोलियों के प्राणान्तक शोर से मीटिंग हॉल काँप उठा. डगलस ढेर हो चुका था. गोली दो पिस्तौलों से चली थी. एक चलाने वाला भाग गया, एक पकड़ा गया. पकड़े गए का नाम था ‘प्रद्योत भट्टाचार्य’. वह हिजली जेल में निहत्थे कैदियों की निर्मम हत्या का प्रतिशोध लेने को व्याकुल था और आज उसके बदले के साथ ही क्रांतिकारियों की चेतावनी भी दूसरी बार सही सिद्ध हुई. 21 जनवरी, 1933 को यह छात्र वीर फाँसी का फन्दा चूमकर अमर हो गया.

अंग्रेज़ बौखलाए. पर उनकी स्थिति ऐसी थी कि न वे हार मान सकते थे, न जीत ही पा रहे थे. विचित्र विवशता में इस बार उन्होंने भेजा बी.ई.जे.बर्गे को. सुरक्षा प्रबन्ध ऐसे कि मानों स्वयं ही अपने ही सैनिकों में स्वेच्छा से कैदी हो. न कहीं आना-जाना, न किसी आयोजन में भाग लेना. अपने कार्यालय से ही सम्पूर्ण प्रशासन चलाने वाले बर्गे की एक कमजोरी थी. वह थी उसका वॉलीबाल प्रेम. वह वॉलीबाल का अच्छा खिलाड़ी था. वह टाउन क्लब की वॉलीबाल टीम का सदस्य भी था.

क्रांतिकारी छात्रों के समूह ने इसी कमजोरी को माध्यम बना योजनापूर्वक ‘टाउन क्लब’ और ‘मोहम्मडन स्पोर्टिंग टीम’ का वॉलीबाल मैच तय करवा दिया. पाँच छात्र मृगेन्द्र कुमार दत्त, अनाथ बन्धु पंजा, निर्मल जीवन घोष, ब्रज किशोर चक्रवर्ती और रामकृष्णराय के साथ योजना को अंतिम रूप दे दिया गया. मृगेन्द्र कुमार और अनाथबन्धु तो वॉलीबाल के कुशल खिलाड़ी भी थे.

2 सितम्बर, 1933 निर्धारित समय पर मैच आरम्भ होने वाला था. मृगेन्द्र व अनाथबंधु भी अपने अच्छे खेल के कारण टीम में खेल रहे थे. खेल के पहले का अभ्यास चल रहा था कि ‘बर्गे’ अपने सुरक्षाकर्मियों के चाक चौबन्द पहरे में वहाँ आ पहुँचा. उसका खिलाड़ी मन स्वयं को कैसे रोक पाता, वैसे भी स्वयंस्वीकृत प्रतिबन्धों में वह ऊबा हुआ था. वह खेल मैदान में उतर पड़ा. बस ‘मत चूके चौहान’ की तर्ज पर मृगेन्द्र कुमार और अनाथबंधु की पिस्तौलें बिजली की फुर्ती से निकलीं और अचूक निशानों ने बर्गे को वहीं लुढ़का दिया. सुरक्षाकर्मियों ने दोनों छात्रों को भी गोलियों से वहीं छलनी कर दिया. अनाथबंधु वहीं बलिदान हो गये, मृगेन्द्र कुमार अस्पताल में दिवंगत हुए. खेल मैदान के सभी दर्शकों व खिलाड़ियों की तलाशी में निर्मल जीवन, बृज किशोर और रामकृष्ण भी पकड़े गए. मुकद्दमे के बाद मिदनापुर की केन्द्रीय जेल में फाँसी पर चढ़ गए. अब अंग्रेज़ सरकार की हिम्मत न हुई कि कोई अंग्रेज़ जिला अधिकारी भेजे. अन्ततः एक भारतीय को वहाँ नियुक्त करना पड़ा.

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