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अमृत महोत्सव – वीर सावरकर कृत ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक का इतिहास

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रवि कुमार

कहते हैं 1857 की क्रांति विफल हुई. क्या यह कहना सही है? नहीं.! 1857 का महासंग्राम उसके बाद की पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए सतत प्रेरित करता रहा. विचार करने का प्रश्न यह भी है कि आगे की पीढ़ियों को 1857 के महासंग्राम से जो प्रेरणा मिली, वह किस माध्यम से मिली? उत्तर एक ही है – वीर सावरकर कृत ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक. इस पुस्तक के विषय में विख्यात साहित्यकार देवेंद्र स्वरूप लिखते हैं, “यह इतिहास की पुस्तक नहीं, स्वयं भी इतिहास है.” स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा का माध्यम बनी एक पुस्तक का क्या इतिहास रहा होगा?

यह विश्व की पहली पुस्तक है, जिसे प्रकाशन से पूर्व प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त है. सन् 1909 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से लेकर 1947 में इसके प्रथम खुले प्रकाशन के 38 वर्ष के लंबे कालखंड में कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में छपकर देश-विदेश में वितरित होते रहे होंगे. इन संस्करणों की असंख्य प्रतियों की गणना करना कठिन कार्य है. इस कालखंड के दौरान इस पुस्तक को देशभक्त क्रांतिकारियों की ‘गीता’ कहा जाता रहा.

1906 में विनायक दामोदर सावरकर वकालत पढ़ने के नाम पर शत्रु के घर इंग्लैंड जाते हैं और श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इंडिया हाउस’ को अपनी क्रांति साधना का केंद्र बनाते हैं. 1907 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 50वीं वर्षगांठ पर विभिन्न समाचार पत्रों में 1857 के घटनाक्रम के पूर्वाग्रह से ग्रसित समाचार पढ़कर सावरकर के मन में इस संग्राम में बारे में गहराई से जानने की इच्छा जागृत होती है. 6 मई, 1907 को लंदन के प्रमुख दैनिक ‘डेली टेलीग्राफ’ में मोटे अक्षरों में शीर्षक छपा – “पचास वर्ष पूर्व इसी सप्ताह शौर्य प्रदर्शन से हमारा साम्राज्य बचा था”.

सावरकर के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं – 1857 का यथार्थ क्या है? यह मात्र सैनिक विद्रोह था या देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया सुनियोजित महासंग्राम था? महासंग्राम की योजना का स्वरूप क्या था? भारत की भावी पीढ़ियों के लिए 1857 का संदेश क्या था?

सावरकर लंदन की इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी व नेशनल म्यूजियम लाइब्रेरी की सदस्यता प्राप्त करते हैं. इन दोनों लाइब्रेरी में तीन-चार प्रकार के दस्तावेज उपलब्ध थे. 1857 के समय जो ब्रिटिश अफसर भारत में थे, उनकी डायरियां वहाँ उपलब्ध थीं. दूसरा, उस समय में ब्रिटिश अफसरों व सैनिकों द्वारा लिखे गए पत्र जिसमें युद्ध का वर्णन था. तीसरा, भारत में जो घटित होता था, वह लंदन के समाचार पत्रों में छपता था और चौथा, उस समय के ब्रिटिश लेखकों द्वारा 1857-1859 के घटनाक्रमों पर लिखी अनेक पुस्तकें. 1907-1909 के मध्य दो वर्षों तक इन चारों प्रकार के दस्तावेजों और पुस्तकों का विस्तृत अध्ययन कर वीर सावरकर ने 1909 में मराठी में इस पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की. प्रथम गुप्त संस्करण 10 मई, 1909 में अंग्रेजी में लंदन से प्रकाशित हुआ. जिसका नाम था – The Indian War of Independence Of 1857 और लेखक का नाम छपा था – An Indian Nationalist. इस प्रथम गुप्त संस्करण की भूमिका में सावरकर ने लिखा था कि यद्यपि उन्हें इंडिया हाउस लाइब्रेरी व नेशनल म्यूजियम लाइब्रेरी में केवल ब्रिटिश सरकार के दस्तावेजों एवं ब्रिटिश लेखकों की पुस्तकों पर ही अवलंबित रहना पड़ा, किंतु उस पूर्वाग्रह-युक्त विशाल सामग्री में भी उन्हें ‘सिपाही विद्रोह’ के पर्दे के भीतर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य समर के स्पष्ट दर्शन हुए.

10 मई, 1908 को 1857 के महासंग्राम की वर्षगांठ पर ‘O Martyrs’ (हे बलिदानियों) शीर्षक से चार पृष्ठों का एक पेंफलेट वीर सावरकर द्वारा रचना कर प्रकाशित होता है और वितरित होता है. इस पेंफलेट के माध्यम से वीर सावरकर 1857 के महासंग्राम को सैनिक विद्रोह की बजाय स्वातंत्र्य समर के सिंहासन पर आरूढ़ करते हैं. यह पेंफलेट इस पुस्तक की झलक मात्र था, लेकिन ब्रिटिश सरकार के अफसर इस आशंका में आ जाते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध कुछ अजीब प्रकाशित होने वाला है. ब्रिटिश गुप्तचर विभाग में यह तो पता था कि सावरकर लाइब्रेरी में दो वर्षों से कुछ अध्ययन तो कर ही रहे हैं. इसके बाद पुस्तक की पांडुलिपि को पकड़ने, प्रकाशित न होने देने, प्रकाशन पूर्व विभिन्न प्रकार से प्रतिबंधित करने का क्रम भारत व लंदन में प्रारम्भ होता है. राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित सरकारी फ़ाइलों के अनुसार 6 नवम्बर, 1908 से 23 जुलाई, 1909 तक पूरे नौ महीने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग एवं भारत सरकार जी-तोड़ कोशिश करके भी पुस्तक की भाषा, शीर्षक, मुद्रण स्थान एवं उस पर प्रकाशित लेखक के नाम के बारे में सही जानकारी नहीं पा सके और अंधेरे में तीर चलाते रहे. प्रकाशन के पूर्व ही किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की ब्रिटिश सरकार की इस हताश कार्यवाही ने उसे हास्यास्पद स्थिति में ला दिया था.

पुस्तक की मराठी पांडुलिपि सावरकर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर के पास नासिक में प्रकाशन के लिए जाती है. वहां पुलिस का छापा पड़ने से पहले ही पांडुलिपि हटाकर पेरिस भेजी जाती है. फिर पांडुलिपि पेरिस से जर्मनी जाती है. वहां प्रकाशित न होकर पुनः पेरिस आ जाती है. अब क्रांतिकारी टोली ने निर्णय लिया कि इसे अंग्रेजी में अनुवाद कर प्रकाशित किया जाए. सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी वी.वी.एस. अय्यर के मार्गदर्शन में इंग्लैंड में आई.सी.एस. और लॉ की परीक्षा की तैयारी में लगे देशभक्त मेधावी मराठी छात्रों द्वारा इस पांडुलिपि का मराठी से अंग्रेजी अनुवाद होता है. ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को अंधेरे में रखते हुए कि पुस्तक पेरिस में छप रही है और हॉलैंड के एक छापेखाने में छपने के बाद इस पुस्तक की प्रतियां फ्रांस में भारतीय क्रांतिकारियों के ठिकानों तक पहुंचाई जाती हैं.

पुस्तक की प्रतियों को चोरी-छिपे भारत पहुंचाने के लिए उन्हें विभिन्न लोकप्रिय निरापद पुस्तकों के नकली आवरणों के भीतर छिपा दिया जाता था. पुस्तक को बैग के अंदर नक़ली तलहटी के नीचे छुपाकर और इसके अलावा नए-नए तरीक़े खोजकर विभिन्न स्थानों पर भेजा जाता था. पुस्तक को सुरक्षित भारत पहुंचाना साहस भरा क्रांतिकारी कार्य माना जाता था. इस दुर्लभ पुस्तक की एक-एक प्रति उस जमाने में 300 रुपये में बिकती थी. यूरोप, जापान और अमेरिका में भी इस पुस्तक को पढ़ने की चाह पैदा हुई. 1910 में इस पुस्तक का फ्रेंच अनुवाद भी प्रकाशित हुआ. एम.पी.टी. आचार्य और मैडम क़ामा ने वह फ्रेंच अनुवाद तैयार करवाया था. ब्रिटिश अफ़सर और उनकी पत्नियाँ भी इस पुस्तक को पढ़ने के लालायित रहते थे. भगत सिंह ने भी इस पुस्तक का प्रकाशन गुप्त रीति से करवाया था. 1913 में लाला हरदयाल द्वारा ग़दर पार्टी की स्थापना और ग़दर नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया गया था. उसके बाद इस पुस्तक के अंशों को ग़दर पत्रिका में उर्दू व गुरुमुखी (पंजाबी) में छापा जाने लगा था.

आजाद हिंद फौज के गठन और ब्रिटिश विरोधी रणनीति की प्रेरणा रास बिहारी बोस व सुभाषचंद्र बोस को इस पुस्तक से ही प्राप्त हुई थी. इस पुस्तक का विशेष संस्करण छपवाकर सैनिकों को पढ़ने के लिए दिया जाता था. इस पुस्तक के तमिल संस्करण का संपादन आजाद हिंद फौज के एक प्रचार अधिकारी जयमणि सुब्रह्मण्यम ने किया था.

वीर सावरकर द्वारा लिखित इतिहास की इस महान रचना ने सन् 1914 के ग़दर आंदोलन से 1943-45 की आजाद हिंद फौज तक दो पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी. धन्य है यह पुस्तक और धन्य है इसके लेखक!

(लेखक, विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है.)

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