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    फिर सामने आया कांग्रेस नेताओं का महिला विरोधी चेहरा व चरित्र

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    – रजनीश कुमार  

    मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेता एवं पूर्व मंत्री जीतू पटवारी ने भारत सरकार को घेरने के लिए अपनी कुत्सित कलंकित सोच को जनता के सामने रख दिया. पटवारी ने केंद्र में भाजपा की सरकार पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया था, ‘पुत्र के चक्कर में पांच पुत्रियां पैदा हो गईं, नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोजगारी और मंदी, परन्तु अभी तक विकास पैदा नहीं हुआ.’ सरकारों को घेरने के लिए महिलाओं के बारे में होने वाली बयानबाजी राजनीति को प्रदूषित करती है, कांग्रेस की सोच को प्रदर्शित करती है.

    दूसरा अशोभनीय बयान कांग्रेस विधायक शशांक भार्गव का आया. डीजल और पेट्रोल की कीमतों मंक बढ़ोतरी को लेकर सरकार को घेरने के क्रम में स्मृति ईरानी पर विवादित एवं अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए शशांक भार्गव एक बार भी नहीं हिचकिचाए.

    महिलाओं को हीन दृष्टि से देखने वाली सोच क्या भारतीय राजनीति में स्वीकार्य है? कोई सहमत नहीं होगा, लेकिन लुटियन्स जोन के 10 जनपथ के एंटोनियो आवास के लिए शायद यह भी स्वीकार है!
    राजनीति नैतिकता का ही सर्वव्यापी रूप है. सामाजिक जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले तत्व नेता होते हैं. नेताओं के नैतिक बोध से, उसके चरित्र से, व्यवहार एवं विचार से समाज की दिशा तय होती है.
    वैदिक काल में नेता हमारे ऋषि-महर्षि थे. उन्होंने संपूर्ण सृष्टि के लिए, राष्ट्र एवं समाज के कल्याण के लिए सूक्तियों एवं ऋचाओं द्वारा जो भी दिशा निर्देश दिए, वे आज भी हमारे ग्रंथों एवं स्मृतियों में संकलित है. वसुधा के नेताओं ने अपने ज्ञान – ध्यान एवं चिंतन – दर्शन से मानव जीवन को संस्कारित बनाया. उनके विचार एवं दर्शन हमारे लिए प्रेरणस्रोत हैं.

    भारतीय संस्कृति ने यहां की जनता के मानसिक पटल पर अमिट छाप छोड़ी है, उसे किसी भी तरह की कुत्सित सोच कुचल तो नहीं सकती है, लेकिन उसको प्रदूषित करने में लगे हुए कुछ नेताओं के मानसिक चरित्र चिंता का विषय है. कभी राजनीतिक मंच से तो कभी सोशल मीडिया से समाज में दुर्भावना फैलाने वाली सोच का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है.

    बाहरी विचारों एवं सभ्यताओं ने पिछले कुछ दशकों में राजनीति को प्रभावित किया है. इसके लिए कभी समाज को जाति एवं वर्ग के आधार पर बांट कर राजनीति करने वाले नेताओं ने समाज में नर-नारी में विभेद करने का भी प्रयास किया है. भारतीय राजनीति की सोच एवं स्वरूप में घुसपैठ करने वाले ये लोग समाज में महिलाओं को हीन दृष्टि से देखते है.

    केंद्र सरकार को घेरने के क्रम में जिस प्रकार के शब्द एवं भाषाओं का इस्तेमाल किया गया, वह कांग्रेस की महिला विरोधी मानसिकता को प्रदर्शित करता है. आखिर, भारतीय संस्कृति में महिलाओं को हीन दृष्टि से कब देखा जाने लगा? स्वयं को सोशल मीडिया पर इस प्रकार के सवाल से घिरे हुए पाकर जीतू पटवारी ने अपने कुत्सित सोच का परिचय देने वाले ट्वीट को तो डिलीट कर दिया, लेकिन सवाल यह है कि इस प्रकार की सोच उनकी वैचारिक मानसिकता से कब डिलीट होगी!

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    भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को महत्व की दृष्टि से देखा गया है. भारत लाखों वर्षों से भोलेनाथ के अर्धनारीश्वर रूप की पूजा करता आ रहा है, नर और नारी के एकात्म अस्तित्व को स्वीकार करता है. हमारे प्राचीन अथर्ववेद का एक श्लोक है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” जिसका शाब्दिक अर्थ ही है, “जहां नारियों की पूजा होती है, उसका सम्मान होता है, वहां ईश्वर का वास होता है.”

    बेटियों के संबंध में ‘महिला विरोधी’ एवं अपमानजनक’ टिप्पणियां करने वाले कांग्रेस नेता जीतू पटवारी से इस बार “राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग” एवं “राष्ट्रीय महिला आयोग” ने जरूर सफाई मांगी है, लेकिन सवाल यह भी है कि, ‘क्या इस प्रकार की सोच की संपूर्ण सफाई नहीं होनी चाहिए जो महिलाओं को हीनता की दृष्टि से देखती है, जो उन पर अमर्यादित टिप्पणियां करती है, जो नर नारी में विभेद पैदा करती है?

    यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के नेताओं की सोच और उनके चरित्र भारतीय जनता के सामने बेनकाब हुए हैं. इससे पहले भी कई वरिष्ठ नेता अपनी कुत्सित सोच का परिचय देते हुए समाज को प्रदूषित करने का प्रयास कर चुके है.

    संजय निरुपम से ब्रजेश पांडे तक की टिप्पणी एवं व्यवहार!

    2012 में एक टीवी चैनल पर सार्वजनिक चर्चा के दौरान कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने अशोभनीय टिप्पणी की थी. उन्होंने स्मृति ईरानी पर व्यक्तिगत हमले करते हुए उन्हें पैसे के लिए ठुमके लगाने वाली कहा था.

    2012 में दिसंबर गैंगरेप के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, दिल्ली में महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन का मोर्चा खोल रखा था. तब भी कांग्रेस की महिला विरोधी मानसिकता देखने को मिली. जब पश्चिम बंगाल के जांगीपुर से कांग्रेस सांसद अभिजीत मुखर्जी ने प्रदर्शन करने वाली महिलाओं पर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें रात में सज संवर कर पब में जाने वाली बताया था.

    24 अप्रैल, 2013 को भिंड में कांग्रेस के पूर्व मंत्री सत्यदेव कटारे ने विवादित बयान दिया. कटारे ने कहा था – जब तक महिला तिरछी नजर से नहीं देखेगी, तब तक पुरूष उसे नहीं छेड़ेगा.

    विवादित बयानों के बेताज बादशाह दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त अमर्यादित शब्दों का प्रयोग कर गए. जुलाई 2013 को अपनी ही पार्टी की सांसद को रिमार्क करते हुए उन्होंने – सौ टका टंच माल जैसे शब्दों से संबोधित किया था.

    कानपुर प्रदेश उपाध्यक्ष और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजाराम पाल ने 4 नवंबर, 2016 को मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा था, “पार्टी में दलित महिलाओं से भेदभाव नहीं किया जाता है. इन महिलाओं को हमारे घर के अंदर ही नहीं, बेडरूम तक आने की इजाजत है. यहां ऐसी कोई महिला नहीं है, जो हमारे बेडरूम तक न आई हो.”

    हरियाणा कांग्रेस के उपाध्यक्ष सुभाष चौधरी पर अक्तूबर, 2017 में दिल्ली के तुगलग रोड पुलिस स्टेशन में रेप का एक मुकदमा दर्ज हुआ. आरोप है कि सुभाष चौधरी ने कांग्रेस के राज्यसभा सांसद के घर की नौकरानी के साथ दुष्कर्म किया. मामला चर्चा आने के बाद भी, इस मामले में राहुल गांधी ने चुप्पी साध ली. तब वह कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे.

    23 फरवरी, 2017 – बिहार कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष ब्रजेश पांडे पर एक नाबालिग ने यौन शोषण का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. काली स्क्रीन दिखाने वाले तथाकथित सेकुलर पत्रकार रवीश कुमार पांडे अपने भाई की काली करतूत पर मौन रहे!

    महिलाओं के नाम पर नौटंकी करने वाली कांग्रेस जब अपने ही नेताओं के बयानों/ कारनामों से “एक्सपोज” होती है, तब वह विभिन्न प्रकार के सवालों से खुद ही घिर जाती है. अपने बयानबहादुरों के अल्फाजों पर एक शब्द नहीं बोलती है.
    आपको याद होगा जब सदन में तीन तलाक बिल के विरोध में बोलने के लिए खड़े हुए आजम खान ने लोकसभा में पीठासीन अधिकारी की कुर्सी पर बैठी रमा देवी पर ही विवादित टिप्पणी की थी. आजम के इस बयान पर रमा देवी ने आपत्ति जताई, सदन में हंगामा होता रहा, अखिलेश यादव इसे जस्टिफाई करते रहे, कांग्रेस तब भी मौन थी. अंत में लोकसभा की कार्यवाही से इस अशोभनीय टिप्पणी को हटाया गया. चुनावी मंच से आजमा खां द्वारा एक प्रत्याशी के खिलाफ टिप्पणी को कौन भूल सकता है? खैर, पर मकसद इतना ही है कि महिला हितों की बात करने वाले नेताओं, व दलों की सच्चाई सबके समक्ष आए, और जनता उनकी कलुषित सोच को जान सके.

    (लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं)

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