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1857 की क्रांति में बंजारों ने भी दिया था बलिदान

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सन् 1857 की क्रांति के दौरान गूजर और रांघड़ों की तरह सहारनपुर जिले के बंजारों ने भी युद्ध लड़ा था. सहारनपुर जिले के बंजारों की वीरता का उल्लेख स्वयं उन अंग्रेज अधिकारियों के पत्रों और रिपोर्टों में मिलता है, जिन्होंने इनका सामना किया. उस समय देहरादून, हरिद्वार तथा रुड़की सहारनपुर जिले के निकट के कस्बे कहलाते थे. बाद में, सहारनपुर जिले में वर्षों तक शामिल रहे.

ये बंजारे रुड़की तहसील के सुलतानपुर कुमारी व आसफगढ़ के बीच स्थित फुटुवा गाँव में एकत्रित होकर अंग्रेजों पर हमले की योजना बनाते थे. 1857 के संग्राम में महीरुप बंजारे गाँव में एकत्रित हो गए थे तथा अंग्रेजी फौज व उनके हथियारों का मुकाबला करने के लिए इन्होंने रेत और मिट्टी के बड़े अवरोध खड़े कर दिए थे. बंजारों द्वारा छेड़े गए युद्ध की जानकारी मिलने पर जुलाई में रॉबर्ट्सन व कैप्टन मैलगन बंजारों का दमन करने के लिए ज्वालापुर पहुँच गए थे. लेकिन, इसी दौरान भारी बारिश के कारण अंग्रेजी फौज को गंगा पार करना संभव नहीं हो पा रहा था. इसलिए अंग्रेजी फौज को रानी माजरा के पास डेरा डाल गंगा के उतरने का इंतजार करना पड़ा.

अंग्रेजी फौज पर हमला

17 जुलाई, 1857 की सुबह बंजारों की एक टुकड़ी ने गंगा पार कर रॉबर्ट्सन व उसके साथियों पर हमला कर दिया. जमकर संघर्ष हुआ तथा अंग्रेजी फौज को खासा नुकसान उठाना पड़ा. इसके बाद रॉबर्ट्सन ने फौज सहित गंगा पार की तथा बंजारों पर हमला कर दिया. पहले हमले में ही 6 बंजारे वीरगति को प्राप्त हुए तथा 19 घायल हुए. घायल होने वालों में बंजारों के सरदार गहरा के चाचा व भतीजा भी शामिल थे. बंजारों की वीरता से अंग्रेज इतने भयभीत थे कि वे गंगा किनारे डेरा डाले पड़े तो रहे, लेकिन बंजारों पर पुनः हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. इसी बीच अंग्रेजों की शक्ति व हथियारों का अंदाजा लगाकर बंजारे अंग्रेजी सेना के पहुँचने से पूर्व फुटुवा से किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर चले गए थे.

अंग्रेजों ने जला दिए कईं गाँव

रॉबर्ट्सन व उसकी सेना ने बंजारों को ढूँढने का काफी प्रयास किया, लेकिन वे असफल रहे. बंजारों से चिढ़कर रॉबर्ट्सन फुटुवा तथा कईं अन्य गाँवों को जलाकर राख कर डाला. साथ ही वहाँ से 400 पशुओं को हांक ले गया, जिन्हें बाद में अंग्रेजी फौज के भेदियों में बाँट दिया गया था.

बंजारों के विद्रोह से आहत रॉबर्ट्सन ने इनकी तलाश में भेदियों को लगाया. इसके बावजूद बंजारों के हमले जारी रहे. भेदियों की सूचनाओं पर काफी संख्या में बंजारे पकड़े गए, जिन्हें रूड़की लाकर रॉबर्ट्सन के सामने पेश किया गया. इन बंजारों को इतनी सख्त सजा दी गई कि लोगों की रूह काँप उठी थी.

11 बंजारों को दी गई सरेआम फाँसी

फुटुवा गाँव के संग्राम के बाद पकड़े गए बंजारों में से शेष को तो साधारण दण्ड देकर मुक्त कर दिया गया, लेकिन 11 बंजारों को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया. ये बंजारे, जिन्होंने अंग्रेजों से लड़कर या फिर उनके हाथों फाँसी चढ़कर देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, इनके नामों के बारे में इतिहास मौन है. लेकिन इन गुमनाम बहादुरों व देशभक्तों की कुर्बानी को भुलाया नहीं जा सकता है.

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