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भक्त कवि नरसिंह मेहता

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‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ महात्मा गांधी जी का बहुत प्रिय भजन था. गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि नरसिंह मेहता ने ऐसे हजारों गीतों (भजनों) की रचना की थी. भक्त कवि नरसिंह मेहता ने गुजरात में भक्ति की नई चेतना को मुखर किया. 17वीं शताब्दी के लगभग प्रारंभ में ही इनकी प्रसिद्धि भक्ति कवि के रूप में पूरे भारत में फैल चुकी थी. उनके जीवन तथा कृतियों ने जनभावनाओं को प्रभावित किया और वे शीघ्र ही भक्ति की अभिनव रहस्य गाथाओं के केंद्र बिन्दु बन गए. नरसिंह मेहता को गुजराती साहित्य के इतिहास में गुजराती भाषा के आदिकवि के नाम से जाना जाता है. वह 15वीं सदी के विशिष्ट प्रतिभासंपन्न उच्चकोटि के भक्ति कवि की तरह ही गुजराती में पद्य-साहित्य को समृद्ध करने वाले साहित्यकारों में अग्रणी कवि के रूप में सुविख्यात हैं. उनका जन्म कहां, कब हुआ इसकी निश्चित जानकारी नहीं मिलती. किन्तु ‘ग्राम तलाजा मां जन्म मारो थयो’, ऐसा नरसिंह मेहता अपने चरित्रात्मक काव्य ‘मामेरुं’ में लिखते हैं. तो इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका जन्म गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के भावनगर जिले के तलाजा गांव में हुआ था, जो पहाड़ी पर बनी बुद्धकालीन गुफाओं के लिए जाना जाता है.

उनके पिता का नाम कृष्णदास और माता का नाम देवाकुंवर था. उनके माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था. इसलिए वे अपने चचेरे भाई के साथ रहते थे. वे अधिकतर संतों की मंडलियों के साथ घूमा करते थे और 15-16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया. कोई काम न करने पर उनकी भाभी उन पर बहुत कटाक्ष करती थी. एक दिन उनकी फटकार से व्यथित नरसिंह गोपेश्वर के शिव मंदिर में जाकर तपस्या करने लगे. मान्यता है कि सात दिन के बाद उन्हें शिव के दर्शन हुए और उन्होंने कृष्ण भक्ति व रासलीला के दर्शनों का वरदान मांगा. द्वारिका जाकर उन्होंने रासलीला के दर्शन किए. अब नरसिंह का जीवन पूरी तरह से बदल गया. भाई का घर छोड़कर वे जूनागढ़ में अलग रहने लगे. उनका निवास स्थान आज भी ‘नरसिंह मेहता का चौरा’ के नाम से प्रसिद्ध है. वे हर समय कृष्णभक्ति में तल्लीन रहते थे. उनके लिए सब बराबर थे. वे छुआछूत नहीं मानते थे और हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन किया करते थे. इससे बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, पर अपने पथ से डिगे नहीं.

आज काननून छुआछूत को अपराध माना जाता है. इसके उपरांत भी पिछड़े वर्ग पर घटनाएं होती रहती हैं. विचार कीजिए, कि पांच सौ वर्ष पहले जब पिछड़े वर्ग की छायामात्र शरीर पर पड़ जाने से समाज के एक वर्ग को स्नान करता था, तब पिछड़े वर्ग की क्या दुर्दशा रही होगी. उस युग में भक्त नरसिंह मेहता ने पिछड़ों की बस्ती में भजन गाने जाकर कट्टरपंथियों रा क्रोध मोल लिया था. वह बड़े साहसी समाज सुधारक थे.

विजेंद्र सोनवणे

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