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“भय बिनु होय न प्रीति”

बलबीर पुंज

गत दिनों एक चौंकाने वाली खबर आई. पिछले नौ माह से जिस प्रकार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) अर्थात् – चीनी सेना बख़्तरबंद वाहनों के साथ पूर्वी लद्दाख में अस्त्र-शस्त्रों से लैस भारतीय सेना से टकराने को तैयार थी, वह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 10 फरवरी, 2021 को एकाएक पीछे हट गई. चीनी सेना इतनी जल्दी में थी कि उसने पैंगोंग त्सो के दक्षिण तट से अपने 200 से अधिक युद्धक तोपें/टैंक एक ही दिन में पीछे कर लिए और फिंगर-8 के उत्तरी छोर से अपने सैनिकों को वापस ले जाने के लिए 100 भारी वाहन तैनात कर दिए. जिस रफ्तार से साम्यवादी चीन ने अपनी सेना और तोपों को हटाया, उसने कुछ प्रश्नों को जन्म दे दिया. आखिर साम्यवादी चीन ने ऐसा क्यों किया? क्या सच में चीन का हृदय परिवर्तन हो गया है या फिर यह उसकी एक रणनीतिक चाल है?

संक्षेप में कहें, तो क्या भारत साम्राज्यवादी चीन पर विश्वास कर सकता है? यह किसी से छिपा नहीं है कि वर्ष 1949 से साम्राज्यवादी चीन, भारतीय क्षेत्रों पर गिद्ध दृष्टि रख रहा है. वह 1950 में तिब्बत को निगल गया, हम चुप रहे. चीन की नीयत को लेकर असंख्य चेतावनियों की प्रारंभिक भारतीय नेतृत्व ने अवहेलना की. फिर 1962 में युद्ध हुआ, जिसमें हमें न केवल शर्मनाक पराजय मिली, साथ ही देश की हजारों वर्ग कि.मी. भूमि पर चीन का कब्जा हो गया और इसके अगले पांच दशकों तक वह हमारी अति-रक्षात्मक नीति का लाभ उठाकर भारतीय भूखंडों पर अतिक्रमण करने का प्रयास करता रहा. 2013 में लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के बाद 2017 का डोकलाम प्रकरण और 2020 का गलवान घाटी घटनाक्रम – इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. सच तो यह है कि पैंगोंग-त्सो झील तट पर चीन का पीछे हटना केवल उसकी एक तात्कालिक रणनीति का हिस्सा है. चीन स्वयं को विश्व की सबसे महान सभ्यता मानता है और इसी सनक के कारण उसका अपने 17 पड़ोसी देशों (भारत सहित) के साथ क्षेत्रीय विवाद है. चीन 1959 से भूटान, तो 1979 से ताइवान को अपना हिस्सा बता रहा है. यही नहीं, वर्ष 1974 में दक्षिण चीन सागर स्थित पार्सल द्वीप, 1988 में जॉनसन चट्टान, 1995 में मिसचीफ चट्टान और 2012 में रेत की टीले स्कारबोरो पर कब्जा चुका है. जहां चीन के ऋण मकड़जाल में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार आदि देश फंस चुके है, वहीं पाकिस्तान – जिसके वैचारिक अधिष्ठान का एकमात्र उद्देश्य “काफिर” भारत को “हजार घाव देकर मौत के घाट” उतारना है – वह वर्षों पहले चीन का “सेटेलाइट स्टेट” अर्थात् – दुमछल्ला बन चुका है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि चालबाज चीन को गलवान घाटी में नौ महीने बाद अपनी रणनीति बदलनी पड़ी? निसंदेह, यह सब दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के साथ हुए चरणबद्ध संवाद के अतिरिक्त विदेश मंत्री एस.जयशंकर, शीर्ष मंत्रियों, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल द्वारा अपने चीनी समकक्षों के साथ बैक-चैनल कूटनीतिक वार्ता का परिणाम है. किंतु क्या इसे पर्याप्त कहा जा सकता है, क्योंकि वर्षों से सीमा-विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच वार्ता हो रही है? वास्तव में, भारतीय पक्ष इस बार “भय बिनु होय न प्रीति” परंपरा के माध्यम से चीन को समझाने में सफल रहा कि वर्तमान भारत 1962 की पराजित मानसिकता से मीलों आगे निकल चुका है और वह अपनी सीमा, एकता और अखंडता की रक्षा हेतु पहले से कहीं अधिक तत्पर, स्वतंत्र और स्वाभिमानी है. इसका आभास चीनी सत्ता-अधिष्ठान को संभवत: दो घटनाओं से हो गया होगा. पहला – गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के साहसिक प्रतिरोध के बाद उन्होंने 29-30 अगस्त 2020 की रात कैलाश पर्वत श्रृंखला पर उस क्षेत्र फिर से अपने अधिकार में ले लिया, जो भारत ने 1962 के युद्ध में गंवा दिया था. उसी रात को भारतीय सैनिकों ने फिंगर-4 क्षेत्र पर भी ठीक चीनी सैनिकों के सामने अपना मोर्चा जमा लिया. दूसरा – मोदी सरकार द्वारा चीन पर आर्थिक कार्रवाई (कंपनियों के ठेके रद्द करना सहित) करना, तो टिकटॉक, वी-चैट सहित 267 चीनी मोबाइल एप पर प्रतिबंध लगाना. इससे चीन को आर्थिक तौर पर बहुत बड़ी क्षति पहुंची है. चीन की रणनीति में बदलाव का एक कारण जहां भारतीय कूटनीति, देश का सामरिक-आर्थिक उभार और अपनी सीमा-सुरक्षा के प्रति शून्य-सहनशीलता है, तो वहीं बाह्य कारकों ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र को व्यापार हेतु स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी बनाए रखने और चीनी साम्राज्यवाद को ध्वस्त करने की दिशा में चार देशों – भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के “क्वाड” गठजोड़ से चीन राजनीतिक और आर्थिक रुप से असहज है. चारों देशों के बीच 18 फरवरी को तीसरी मंत्रिस्तरीय बैठक भी हुई है. इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन अपने पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप की भांति “क्वाड” को सशक्त बनाने पर बल दे चुके है. अमेरिका में ट्रंप की विदाई के बाद चीन इस आशा में था कि अमेरिकी प्रशासन बिडेन के नेतृत्व में बीजिंग के प्रति नीतियों में तुरंत सुधार करेगा. प्रतिकूल इसके, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात करने के तीन दिन बाद 11 फरवरी को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात की, तो उन्होंने वही मुद्दे उठा दिए, जिनसे जिनपिंग ट्रंप कार्यकाल से झुंझला रहे है. इन मुद्दों में चीनी आर्थिक नीति, व्यापार-युद्ध, हॉन्गकॉन्ग, ताइवान और पड़ोसी देशों को धमकाना आदि शामिल है. इसके अतिरिक्त, कोविड-19 से विश्व में 25 लाख लोगों की मौत होने से चीन की छवि नकारात्मक हो गई है. ऐसे में चीन का सीमा पर भारत के साथ तनाव बढ़ाना – घाटे का सौदा होता. भारत-चीन संबंधों के विकृत होने का एक बड़ा कारण जहां चीन का साम्राज्यवादी उन्माद है, वहीं स्वतंत्र भारत में अधिकांश भारतीय नेतृत्व की चीन के प्रति हीन-भावना और अदूरदर्शी नीतियों को अपनाना भी है. इस मानसिकता की झलक कांग्रेस सहित अधिकांश विरोधी दलों नेताओं की हालिया प्रतिक्रियाओं में भी दिखती है. वास्तव में, अधिकांश विपक्ष चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 13 पूर्ववर्तियों की उन्हीं नीतियों का अनुसरण करते रहें, जिनके परिणामस्वरूप – आज भी 38 हजार वर्ग कि.मी. भारतीय भूखंड पर चीनी कब्जा बरकरार है. चीन से व्यापार में प्रतिवर्ष लाखों करोड़ रुपयों का घाटा होता रहे. “काफिर” भारत के खिलाफ जिहाद में पाकिस्तान को चीन का समर्थन मिलता रहे. क्या यह सत्य नहीं कि यदि भारत उन्हीं नीतियों पर चलता रहा, तो हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा? हाल के वर्षों में भारत से चीन की बौखलाहट का एक बड़ा कारण सीमा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किए जा रहा आधारभूत विकास है. यह दुर्भाग्य है कि जहां चीन वर्षों पहले सीमा पर सैन्य संरचनाओं का विकास कर चुका है, वहीं हमने 1962 में चीन के हाथों मिली पराजय के बाद भी कुछ नहीं सीखा और सीमा को मुख्य सड़कों से नहीं जोड़ा. सितंबर 2013 में तत्कालीन रक्षा मंत्री रहे ए.के. एंटनी ने इस कटु सत्य को संसद में स्वीकार किया था. यह विडंबना है कि आज वही एंटनी चीन के खिलाफ मोदी सरकार की नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे है. सच तो यह है कि वर्ष 2014 से पहले अधिकांश भारतीय नेतृत्व के दब्बूपन का लाभ उठाकर साम्यवादी चीन अपनी इच्छानुसार सीमा पर यथास्थिति को बदला है. अप्रैल 2013 में जब चीनी सैनिकों ने लद्दाख में घुसपैठ की थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा इसे अधिक तूल नहीं दिए जाने संबंधित वक्तव्य देना – इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. चीन ने 2017 में डोकलाम और अब गलवान घाटी में भी ऐसा करना चाहा था, किंतु वर्तमान भारतीय नेतृत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति ने ऐसा होने नहीं दिया. सच तो यह है कि भारत पर चीन की ओर से खतरा टला नहीं है. इस संबंध में भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का एक वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. वह कहते हैं – “नए खतरों के प्रति तैयार रहने हेतु भारत को अपने आक्रामक रुख को और मजबूत करने की जरूरत है. हमारी सीमाओं का सही निर्धारण नहीं होने के कारण हमारी अखंडता और संप्रभुता संरक्षण में चुनौतियां हैं.” ऐसे में क्या भारत को अपनी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है?

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