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पुस्तक समीक्षा : संघ को जानने – समझने का प्रमाणिक अभिलेख

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जैसे-जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक प्रभाव देश भर में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित संगठन के बारे में जानने समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है. ‘आर एस एस’ या ‘संघ’ के नाम से अधिक पहचाने जाने वाले इस ‘परिवार’ के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं.

संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुनील आंबेकर की पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : स्वर्णिम भारत के दिशा सूत्र’, इन्हीं जिज्ञासाओं को शांत करने का सफल प्रयास है. एक सामाजिक – सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रवाद की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है. साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, पर्यावरण, शिक्षा आदि समाज का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र और समाज के लिए कार्य न कर रहे हों. इसके अनुसार संघ व्यक्ति निर्माण के अतिरिक्त कुछ नहीं करता. जो भी करता है, स्वयंसेवक करता है. अपनी शाखाओं के माध्यम से चरित्र निर्माण करना संघ का मुख्य कार्य है. इसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में गए स्वयंसेवक संघ के कार्य को मूर्त रूप देते हैं.

लेखक का पूरा जीवन संघ के साथ ही बीता है. अतः पुस्तक का बड़ा भाग उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित है. उन्होंने बहुत ही व्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से संघ के इतिहास, वर्तमान और भविष्य को पाठकों के समक्ष रखा है. इसलिए यह कहना उचित ही है कि यह पुस्तक उनके लिए है जो व्यवहार रूप में संघ को समझना चाहते हैं, उसके माध्यम से जिसने संघ को जिया है. पुस्तक संघ के बारे में फैलाई गई कई भ्रामक धारणाओं को स्पष्ट रूप से दूर करती है. साथ ही अनेक विवादित विषयों पर संघ के विचार सामने लाती है.

हिन्दू राष्ट्र को लेकर संघ का स्पष्ट मानना है कि यह संकल्पना किसी भी पंथ, संप्रदाय या रिलीजन’ की विरोधी नहीं है. हिन्दू राष्ट्र में सभी पूजा पद्धतियों का सम्मान और स्वतंत्रता स्वयं सम्मिलित है. इसी प्रकार संघ जाति व्यवस्था को सनातन परंपरा का अंग नहीं मानता. इसलिए जन्म के आधार पर कोई भी छोटा या बड़ा नहीं. हमारे वेद भी यही कहते हैं. संघ का मानना है कि हमारी वर्ण व्यवस्था गुण कर्म पर आधारित थी, ना कि जन्म के आधार पर. वहीं, आरक्षण पर भी संघ ने दो टूक कह दिया है कि जब तक समाज में भेदभाव विद्यमान है. संघ आरक्षण का समर्थन करता रहेगा. संघ मानता है कि भारत की सामाजिक, राजनीतिक अवधारणा का बीज हिंदू राष्ट्र में है और इस कारण भारत में इस्लाम, ईसाई तथा अन्य संप्रदायों के अनुयायियों को अपनी पूजा पद्धतियों के अनुपालन की पूरी स्वतंत्रता है. लेकिन हिंदुत्व भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा कवच है. जब जब हिंदुत्व सशक्त होता है, देश की एकता और अखंडता अभेद्य और अपराजेय बन जाती है. संघ का दृढ़ विश्वास है कि आने वाले समय में भारत से विदेशों को किया जाने वाला सबसे बड़ा सांस्कृतिक निर्यात हिंदुत्व होगा. संघ मानता है कि भारत उन सभी का है, जिनका यहां जन्म हुआ और यहां रहते हैं, फिर चाहे वे किसी भी मत पंथ या संप्रदाय के हों. भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे, किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं श्रद्धालुओं का सम्मान करेंगे. आधारभूत मूल्य तथा हिन्दू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे, मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे. वहीं, आर एस एस के भविष्य के बारे में पुस्तक कहती है कि जब भारतीय समाज समग्र रूप में संघ के गुणों से युक्त हो जाएगा, तब संघ तथा समाज की दूरी समाप्त हो जाएगी. उस समय संघ संपूर्ण भारतीय समाज के साथ एकाकार हो जाएगा और एक स्वतंत्र संगठन के रूप में इसके अस्तित्व की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी. संघ देश के समक्ष चुनौतियों को लेकर भी अत्यंत गंभीर है. इनमें इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद, अवैध घुसपैठ, हिंदुओं की घटती जनसंख्या, हिंदुओं का धर्मांतरण जैसे विषय शामिल हैं. निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ को और अच्छा बनाएगी. जो अपरिचित हैं, उन्हें संघ से परिचित कराएगी. इसके अतिरिक्त संघ के विरोधियों को भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए. जिससे वह पूर्वाग्रह और मिथ्या धारणाओं से युक्त चश्मे से मुक्त होकर इस राष्ट्रवादी संगठन को समझ सकेंगे. फिर भी इतने विशाल और बहुआयामी संगठन को मात्र किसी पुस्तक के आधार पर नहीं समझा जा सकता. संघ को समझना है तो संघ में आना पड़ेगा. इसलिए संघ का आह्वान है कि संघ से जुड़कर प्रत्येक व्यक्ति अपने स्थान पर रहते हुए तथा अपना कार्य करते हुए भी अपनी रुचि के अनुसार समाज हित का कार्य कर सकता है.

कृति – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा सूत्र

लेखक – सुनील आंबेकर

प्रकाशक – प्रभात पेपरबैक्स, 4/19 आसफ अली रोड , नई दिल्ली, पिन कोड – 110 002.

मूल्य – 250 रुपये

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