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15 अगस्त, 2022 – सर्व सामर्थ्य संपन्न, समरसता युक्त, शोषणमुक्त बनकर भारत सारे विश्व को सुख शांति का मार्ग दिखलाएगा

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(नागपुर स्थित महाल संघ कार्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन)

सभी नागरिक सज्जन, माता भगिनी.

स्वतंत्रता के 75 साल हम सबने, हमारे देश ने पूर्ण किए हैं. इस उपलक्ष्य पर आप सभी को शुभकामनाएं. हमारे लिए गौरव का क्षण है और हमारे लिए संकल्प का भी क्षण है. 15 अगस्त, 1947 को हमको स्वतंत्रता मिली. अंग्रेजों से हमने अपने देश को अपने हाथ में ले लिया. यकायक नहीं हुआ है और भारत का इतना बड़ा भूभाग एक राजनीतिक छत्र के नीचे, एक सत्ता के नीचे, अपने स्वयं की सत्ता के नीचे शताब्दियों के बाद आया. इस लंबे कालखंड में संपूर्ण देश को ऐसा बनाने की भरसक चेष्टा बहुत लोगों ने की. 1857 के बाद का ही कालखंड देखते हैं तो प्रत्यक्ष शस्त्रास्त्रों के साथ संघर्षरत, समाज में राजनीतिक जागृति करके आंदोलन, समाज के दोष हटा कर समाज को सुधारित रूप में, संगठित रूप में आगे लाना और समाज में स्वत्व देशभक्ति का भाव जागरण, इन चारों रास्तों पर अनेक लोगों ने अपना सर्वस्व देकर काम किया है. इतना जब किया तब 15 अगस्त को हमको स्वतंत्रता मिली. यानि क्या, तो हम अपने देश को, अपने मन के अनुसार बनाएँ. अपने समाज की उन्नति के लिए, अपने समाज की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हम अपने लिए अपने देश को बड़ा बनाएं. इसलिए हमको उस देश को चलाने का स्वातंत्र्य मिला. हमने लिया, मिलाया नहीं, किसी की कृपा से नहीं मिला. पूरा लंबा संघर्ष करने के बाद मिला. अब वो तंत्र तो हमको मिल गया, लेकिन उसको स्वतंत्र बनाना है. उसकी प्रक्रिया भी तब से शुरू हो गई. स्व-तंत्र बनाने में अनेक बातें रहती हैं. जिनको स्वतंत्र होना है, उनको सब मामलों में स्व-निर्भर होना पड़ता है. विश्व से संबंध तो रखने पड़ते है, लेकिन अपनी इच्छा के अनुसार हम रख सकें. इतना सामर्थ्य कमाना पड़ता है. जिनको स्वतंत्र रहना है, अपने स्व का तंत्र खड़ा करना है. उनको अपनी सुरक्षा के बारे में एकदम पक्का चाकचौबंद होना पड़ता है. और अपने स्व के आधार पर युगानुकूल पुनर्रचना तंत्र की करनी पड़ती है. अपनी संविधान सभा से इस प्रक्रिया का प्रारंभ हुआ. यह प्रक्रिया भी लंबी चलेगी, क्योंकि हमने अपनी प्रकृति के अनुसार, अपनी इच्छा के अनुसार, अपनी आकांक्षा के अनुसार अपने देश को चलाने का प्रारंभ 15 अगस्त, 1947 को शताब्दियों के बाद किया. तब तक तो कभी सिकंदर, कभी कोई, कभी कोई वही अपने उद्देश्यों के लिए हमारे देश को चलातेथे. और इसलिए यह लंबी प्रक्रिया चलेगी. उसमें वही परिश्रम, वही त्याग आवश्यक है.

हमारा राष्ट्रध्वज बताता है हमको कैसा देश गढ़ना है. वो देश दुनिया में बड़ा होगा तो क्या होगा, वो अन्य लोगों पर राज नहीं करेगा, डंडा नहीं चलाएगा. वो तो अपने त्याग से दुनिया को गढ़ेगा, दुनिया के हित के लिए त्याग करेगा. इसलिए राष्ट्र ध्वज के शीर्षस्थ रंग को हम भगवा रंग कहते हैं. केसरिया जो त्याग का, कर्म का, प्रकाश का, ज्ञान का रंग है. और ऐसा हम तप कर सकेंगे, तब हम अंतर-बाह्य शुचिता युक्त बनेंगे, पवित्र बनेंगे. अपना स्वयं का मन विकारों से ग्रस्त नहीं होगा, शांत होगा. इसीलिए दूसरा रंग सफेद है और यह हम तब कर सकेंगे जब हम अपने देश को पहले खड़ा करेंगे. तो सब प्रकार की समृद्धि का, लक्ष्मी जी का प्रतीक हरा रंग उसके बाद में है. और यह सब हम करेंगे – By Hook or Crook, जैसे अंग्रेजी में कहते हैं ऐसा नहीं. यह हम सब समाज की, मानवता की, पर्यावरण की, सृष्टि की धारणा का धर्म पालन करके करेंगे. इसलिए अपने ध्वज के केन्द्र में धर्म चक्र है. अपना धर्म प्राण देश है.

इन बातों को समझकर हमको अपना परिश्रम करना चाहिए. आने वाले दिनों में ऐसा देश खड़ा होने तक हमको कभी ये नहीं पूछना चाहिए कि मुझे क्या मिलेगा, मेरा देश मुझे क्या देता है, मेरा समाज मुझे क्या देता है? ये प्रश्न छोड़ दीजिए. मैं अपने देश को क्या दे रहा हूँ, मैं अपने समाज को क्या दे रहा हूँ? मेरी उन्नति में मेरे समाज की देश की उन्नति हो रही कि नहीं? इसका विचार करके ही मैं अपना जीवन जिऊं, इसकी आवश्यकता है. जिस दिन इस संकल्प के साथ हम सब लोग चलना प्रारंभ कर देंगे, दुनिया को आश्चर्य लगेगा, दांतों तले उंगली दबा कर दुनिया देखेगी. इतने गति से हमारा देश सर्व सामर्थ्य संपन्न समरसता युक्त, शोषणमुक्त, ऐसा देश बनकर सारे विश्व को सुख शांति का नया मार्ग दिखलाएगा, इसमें कोई शंका रखने की आवश्यकता नहीं. हमारे देश के सब पुरोधाओं ने इस आशावादिता को, इस भविष्यवाणी को प्रकट किया है. उनकी इस आशा को साकार करने के लिए हमारी भी आकांक्षा है. उस आकांक्षा के संकल्पों पर पक्का होकर हम लोगों को आज इस झंडा वंदन के कार्यक्रम से इस संकल्प के साथ विदा होना पड़ेगा. इतना एक स्मरण इस प्रसंग पर मैं आपको देना चाहता हूँ.

 

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