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    प्रणव दा के संघ कार्यक्रम में जाने से समस्या किसे और क्यों ?

    पूर्व राष्ट्रपति प्रणव दा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे हैं। तो इसमें किसी को क्या दिक्कत हो सकती है और क्यों ? संघ ने 07 जून को निश्चित तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समारोप कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रणव दा को आमंत्रित किया है, और प्रणव दा ने संघ के निमंत्रण को स्वीकार किया है। उन्होंने यह निमंत्रण सोच विचार कर ही स्वीकार किया होगा तो फिर मामले को लेकर हायतौबा या राजन ...

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    प्रणव दा संघ मुख्यालय में ……

    आजकल भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी जी की मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा है. चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निमंत्रण पर 07 जून को संघ मुख्यालय नागपुर जा रहे हैं. वहां वे संघ के तृतीय वर्ष (संघ शिक्षा वर्ग) के समापन समारोह में मुख्य अतिथि होंगे और स्वयंसेवकों को संबोधित करेंगे. इस समारोह में संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी मुख्य वक्ता होंगे. नागपुर में हर वर्ष 25 दि ...

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    समरस समाज के बिना अन्त्योदय सम्भव नहीं

    भारतीय तत्वज्ञान समरसता और एकत्व का प्रथम उद्घोषक रहा है. आदि ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचा "संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते.. "(ऋग्वेद 10-191-2) समरसता की समाज की उद्घोषणा ही है. इसी प्रकार कठोपनिषद - कृष्ण यजुर्वेद के मन्त्र .. ॐ सह नाववतु. सह नौ भुनक्तु. सह वीर्यं करवावहै. तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै..19.. आगे बढ़ने की अनिवार्य शर्त ही कही गई है. अद्वैत वेदांत एका ...

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    शक्तिपूजा

    "सच पूछो तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की, संधि-वचन सम्पूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की. सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है, बल का दर्प चमकता उसके पीछे, जब जगमग है.."                       - दिनकर (कुरुक्षेत्र) राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने शक्ति की आवश्यकता को लेकर 1946 में अपने काव्य 'कुरुक्षेत्र' में जब ये पंक्तियाँ लिखीं थीं, तब उसके पीछे भारतभूमि की क्रोधपूर्ण वेदना का एक लम्बा इतिहास था ...

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    हिन्दू संस्कृति : व्यष्टि से परमेष्ठी की अविरल यात्रा

    अपने देश को छोड़कर शेष दुनिया में समाज जीवन को संचालित करने का आधार कानून है, जबकि हमारे यहां धर्म संचालित समाज जीवन है. सृष्टि संचालन के नियमों को समझने में असफल पश्चिम ने समाज व्यवस्था के लिए कानून का सहारा लिया, जो कृत्रिम व्यवस्था है. रवींद्र नाथ ठाकुर कहते थे कि अपने घर में प्रकाश करने के लिए यदि दीपक जलाना हो तो उसके लिए अनेक आयोजन करने होंगे. सरसों या अन्य तिलहन उगानी होगी, तेल निकालना होगा. तब उससे ज ...

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    समाज और स्वयंसेवक मिलकर कर रहे गाँवों का कायापलट

    ग्राम विकास के लिए नानाजी देशमुख ‘युगानुकूल ग्रामीण पुनर्रचना’ शब्द प्रयोग किया करते थे. प्रकृति संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण आदि गांव से जुड़ीं जो मूलभूत चीजें हैं, उनका संरक्षण ही गांव का विकास है. इसके अलावा कृषि यानी भूमि की उर्वरा शक्ति, जल यानि सिंचाई, वर्षाजल एवं पेजयल का संरक्षण, जैव संपदा का विकास, वनीकरण यानि वृक्षारोपण. इसी प्रकार ऊर्जा यानि सौर ऊर्जा, छोटे-छोटे बांधों से जल ऊर्जा, गोबर गैस आदि. जनसं ...

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    सिख धर्म को हिन्दुओं से कोई खतरा नहीं

    मैं अभी-अभी अमरीका से लौटा हूं. वहां मैं अंतर्राष्ट्रीय सिख सेमीनार में हिस्सा लेने गया था. वहां जाकर पता चला कि विदेशों में कई सिख, जो बहुत पढ़े-लिखे हैं, एक अभियान चला रहे हैं कि भारत में हिन्दूवाद का दौर चल रहा है और इसके कारण सिखों के अलग अस्तित्व पर खतरा खड़ा हो गया है. सोशल मीडिया पर इस संबंध में कई विचार व्यक्त हो रहे हैं. कई तो यहां तक चिंतित हो गए हैं कि गुरबाणी पर भी किन्तु-परन्तु किया जा रहा है. ...

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    बिन पानी सब सून या जलसंकट का समाधान जल संरक्षण

    3290 लाख हेक्टेयर कुल भू-क्षेत्र वाला भारत, विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश है। प्रकृति ने हमें विविध प्रकार की जलवायु और मृदा (मिट्टी) प्रदान की है। हमारे देश में भूमि के विविध रूप जो प्रत्येक प्रकार के जीव-जन्तुओं का पालन करने में सक्षम है। मौसम ऐसा, मानो फसलों की जरूरतों के हिसाब से गढ़ा गया हो। वनस्पतियों की भांति प्राणियों की आनुवांशिक विविधता भारत में भरी पड़ी है। क्या फिर भी वर्तमान बदलते वातावरण में ह ...

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    सहकारिता

    सहकारिता का अर्थ है मिल जुलकर काम करना. हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था सहकारिता का एक अच्छा उदाहरण है. जब हम सहकारिता की बात करते हैं, तब हमारा उद्देश्य आर्थिक क्षेत्र में सहयोग करना होता है. हमारी सभी आवश्यक वस्तुएं सहयोग द्वारा ही जुटाई जाती हैं. आज के युग में कोई भी काम सहयोग के बिना पूरा नहीं हो सकता है. हमारी प्रगति आपसी सहयोग पर निर्भर है. हम साथियों की मदद लेते भी हैं और उनकी मदद करते भी हैं. सहकारिता ...

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    समाज को सही दिशा में मोड़ने वाली नारी शक्ति..!

    भारत में नारी शक्ति का सम्मान प्राचीन काल से रहा है. भारत की संस्कृति और सभ्यता को बनाये रखने में यहाँ की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भारतीय समाज समय के साथ काफी बदला है. लेकिन इसके मूल्य आज भी वही हैं. समय के साथ भारतीय समाज में बदलाव लाने का काम यहाँ की महिलाओं ने किया है. प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के साथ समाज को एक नये मुकाम पर पहुँचाना आसान बात नहीं है. अक्सर देखा जाता है कि या तो परंपराओं ...

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