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    वे पंद्रह दिन… / 06 अगस्त, 1947

    बुधवार... छः अगस्त. हमेशा की तरह गांधी जी तड़के ही उठ गए थे. बाहर अभी अंधेरा था. ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर के निकट ही गांधीजी का पड़ाव भी था. वैसे तो ‘वाह’ कोई बड़ा शहर नहीं था, एक छोटा सा गांव ही था. परन्तु अंग्रेजों ने वहां पर अपना सैनिक ठिकाना तैयार किया हुआ था. इसीलिए ‘वाह’ का अपना महत्व था. प्रशासनिक भाषा में कहें तो यह ‘वाह कैंट’ था. इस ‘कैंट’ में, अर्थात् वाह के उस ‘शरणार्थी कैम्प’ के एक बंगले में, गांधी ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 5

    नरेंद्र सहगल भारत में चल रहे सभी प्रकार के स्वतंत्रता-आंदोलनों, शस्त्रक्रांति के प्रयत्नों, समाज सुधार के लिए कार्यरत विभिन्न संस्थाओं तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जागरण में जुटी सभी धार्मिक संस्थाओं का निकट से अध्ययन करने के लिए डॉक्टर साहब इनके सभी कार्यकलापों में यथासम्भव भागीदारी करते थे. उनका यह निश्चित मत था कि देश के शत्रुओं को जिस किसी भी मार्ग से भारत भूमि से निकाला जा सके, वही उचित तथा योग्य है. इ ...

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    वे पंद्रह दिन… / 05 अगस्त, 1947

    आज अगस्त महीने की पांच तारीख... आकाश में बादल छाये हुये थे, लेकिन फिर भी थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी. जम्मू से लाहौर जाते समय रावलपिन्डी का रास्ता अच्छा था, इसीलिए गांधी जी का काफिला पिण्डी मार्ग से लाहौर की तरफ जा रहा था. रास्ते में ‘वाह’ नामक एक शरणार्थी शिविर लगता था. गांधी जी के मन में इच्छा थी कि इस शिविर में जाकर देखा जाए. लेकिन उनके साथ जो कार्यकर्ता थे, वे चाहते थे कि गांधी जी वहां न जा सकें. क्योंकि ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 4

    नरेंद्र सहगल नेशनल मेडिकल कॉलेज कलकत्ता से डॉक्टरी की डिग्री और क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति में सक्रिय रहकर क्रांति का विधिवत प्रशिक्षण लेकर डॉक्टर हेडगेवार नागपुर लौट आए. स्थान-स्थान से नौकरी की पेशकश और विवाह के लिए आने वाले प्रस्तावों का तांता लग गया. डॉक्टर साहब ने बेबाक अपने परिवार वालों एवं मित्रों से कह दिया ‘मैंने अविवाहित रहकर जन्मभर राष्ट्रकार्य करने का फैसला कर लिया है’. इसके बाद विवाह और नौक ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 04 अगस्त, 1947

    आज चार अगस्त... सोमवार. दिल्ली में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की दिनचर्या, रोज के मुकाबले जरा जल्दी प्रारम्भ हुई. दिल्ली का वातावरण उमस भरा था, बादल घिरे हुए थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी. कुल मिलाकर पूरा वातावरण निराशाजनक और एक बेचैनी से भरा था. वास्तव में देखा जाए तो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए माउंटबेटन के सामने अभी ग्यारह रातें और बाकी थीं. हालांकि उसके बाद भी वे भारत में ही रहने वाले थे, भारत ...

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    भारतीय ज्ञान का खजाना – 6

    भारतीय संस्कृति के वैश्विक पदचिन्ह – 1 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के बाण-स्तंभ पर एक श्लोक उकेरा हुआ (लिखा हुआ) है – "आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग...!" [‘इस मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधे रास्ते में एक भी बाधा (जमीन) नहीं है. यहां से ज्योति (अर्थात प्रकाश) का मार्ग सीधा वहां तक पहुँच सकता है] अर्थात् डेढ़-दो हजार वर्ष पहले भी अपने भारतीयों को दक्षिण ध्रुव के बारे में सटीक जानकारी थी. इसका अ ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 3

    नरेंद्र सहगल भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर पंजे से मुक्त करवाने के लिए समस्त भारत में एक संगठित सशस्त्र क्रांति का आधार तैयार करने हेतु केशवराव हेडगेवार को तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं विशेषतया लोकमान्य तिलक ने कलकत्ता भेजा था. तिलक की सांस्कृतिक राष्ट्रीय विचारधारा से प्रभावित केशवराव नागपुर में सक्रिय रहते हुए बंगाल के क्रांतिकारी दल ‘अनुशीलन समिति’ से भी जुड़ गए थे. 1910 में केशवराव ने कलकत्ता के लिए ...

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    वे पंद्रह दिन… / 03 अगस्त, 1947

    आज के दिन गांधीजी की महाराजा हरिसिंह से भेंट होना तय थी. इस सन्दर्भ का एक औपचारिक पत्र कश्मीर रियासत के दीवान, रामचंद्र काक ने गांधीजी के श्रीनगर में आगमन वाले दिन ही दे दिया था. आज 03 अगस्त की सुबह भी गांधीजी के लिए हमेशा की तरह ही थी. अगस्त का महीना होने के बावजूद किशोरीलाल सेठी के घर अच्छी खासी ठण्ड थी. अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार गांधी जी मुंह अंधेरे ही उठ गए थे. उनकी नातिन ‘मनु’ तो मानो उनकी परछाईं ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 2

    नरेंद्र सहगल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जन्मजात स्वतंत्रता सेनानी थे. ‘हिन्दवी स्वराज’ के संस्थापक छत्रपति शिवाजी, खालसा पंथ का सृजन करने वाले दशमेशपिता श्रीगुरु गोविंदसिंह और आर्य समाज के संगठक स्वामी दयानन्द की भांति डॉ. हेडगेवार ने बालपन में ही संघ जैसे किसी शक्तिशाली संगठन की कल्पना कर ली थी. भारत की सनातन राष्ट्रीय पहचान हिन्दुत्व, भगवा ध्वज, अखंड भारतवर्ष की सर्वां ...

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    वे पन्द्रह दिन…/ 02 अगस्त 1947

    17, यॉर्क रोड.... इस पते पर स्थित मकान, अब केवल दिल्ली के निवासियों के लिए ही नहीं, पूरे भारत देश के लिए महत्त्वपूर्ण बन चुका था. असल में यह बंगला पिछले कुछ वर्षों से पंडित जवाहरलाल नेहरू का निवास स्थान था. भारत के ‘मनोनीत’ प्रधानमंत्री का निवास स्थान. और इस उपनाम या पद में से ‘मनोनीत’ शब्द मात्र तेरह दिनों में समाप्त होने वाला था. क्योंकि 15 अगस्त से जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रू ...

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