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    कर्म करने की प्रेरणा देती है भगवद्गीता

    (21 दिसंबर, गीता जयन्ती पर विशेष) “जब शंकाएं मुझ पर हावी होती हैं, और निराशाएं मुझे घूरती हैं, जब दिगंत में कोई आशा की किरण मुझे नजर नहीं आती, तब मैं गीता की ओर देखता हूं.” - महात्मा गांधी. संसार का सबसे पुराना दर्शन ग्रन्थ है भगवद्गीता. साथ ही साथ विवेक, ज्ञान एवं प्रबोधन के क्षेत्र में गीता का स्थान सबसे आगे है. यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, अपितु एक महानतम प्रयोग शास्त्र भी है. केवल पूजा घर में रखकर ...

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    स्त्रियों का जीवन प्रकाशित करना, यही सच्ची दीपावली

    जैसे ही आकाश में नीले काले मेघ गरजने लगते हैं, सम्पूर्ण सृष्टि रोमांचित हो उठती  है. धरती गाने लगती है. और फिर निर्मिती का वह आनंद चारों दिशाओं में फैलने लगता है. शस्य श्यामला धरती हरयाली साड़ी पहनकर वनस्पति, पशु-पक्षी सहित मानव जीवन को पुलकित, उल्लासित कर देती है. सृष्टि का यह आनंद उत्सव हर सजीव को समृद्ध बना देता है. सृजन के इस गान में निसर्गप्रिय भारतीय समाज अपना स्वर मिला लेता है. धरती मैया की प्रत्येक ...

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    समस्याओं का हल साधनों में नहीं साधना में निहित है

    विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है. यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की, भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है. भारतीय संस्कृति में त्यौहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है. प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है. लोग त्यौहार तो हर्षोल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं, किंतु उसमें निहित संदेश के प् ...

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    भारत में ही सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं अल्पसंख्यक

    क्या हिन्दुत्ववादी उग्रता का प्रचार अतिरेक अल्पसंख्यकों में उन्मादी अभिव्यक्ति का कारण बन रहा है. यह प्रश्न इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि कतिपय चोरी या किसी आस्था के भवन पर पत्थरबाजी की घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस ढंग से उछाला जा रहा है, उससे यह आभास होता है कि विश्वभर में सबसे अधिक अल्पसंख्यक कहीं असुरक्षित हैं तो वह भारत है. क्या यह सही आंकलन है ? और क्या इसाई और इस्लाम मतावलम्बियों को भारत में आ ...

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    शिक्षा सुधार की हर कोशिश ‘भगवाकरण’ नहीं होती

    भारत सरकार में 2009 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दूसरा मंत्रिमंडल गठित हुआ, शिक्षा में गुणात्मक विकास और व्यापक विस्तार के लिए शिक्षा संस्था और विद्यार्थी का एक मानक निर्धारित किया। इस मानक के अनुसार जिन शिक्षा संस्थाओं में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई नहीं होगी, उन ''विद्यालयों'' और न पढ़ने वाले ''छात्रों'' को विद्यार्थी की श्रेणी में शामिल नहीं माना जायेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि ...

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    उठो भारत ! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो

    'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है, उतनी ही समाज पर भी लागू होती है. विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन को बल देते हैं. जब समूचा राष्ट्र ही अपनी शक्तियों को भूलने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है, तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे इस मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है. आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है. ऐसे में स्व ...

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    राष्ट्रीयता की रक्षा, समरसता के बंधन से !

    अपने हिंदू समाज के व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन में रीति, प्रथा तथा परंपरा से चलती आयी पद्धतियों का एक विशेष महत्व है. अपने देश की भौगोलिक विशालता तथा भाषाई विविधता होते हुए भी समूचे देश में विविध पर्व, त्यौहार, उत्सव आदि सभी सामूहिक रीति से मनाये जाने वाले उपक्रमों में समान सांस्कृतिक भाव अनुभव किया जाता है. इसी समान अनुभव को 'हिंदुत्व' नाम दिया जा सकता है. कारण 'हिंदुत्व' यह किसी उपासना पद्धति का नाम नहीं ...

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    युवा हिन्दुस्थान का नेतृत्व कैसा हो ?

    युवकों के नेतृत्व का विचार करने के पूर्व ‘युवा’ माने कौन, इसका प्रथम विचार होना चाहिए. जिनके नेतृत्व के संबंध में विचार करने का समय आया है, उन युवकों की संकल्पना सही मायने में समझे बिना ही उनके नेतृत्व का विचार किया गया, तो सारा मंथन ही व्यर्थ सिद्ध होगा. भारत युवकों का देश है और विश्‍व की महासत्ता बनने की ओर वह बढ़ रहा है, ऐसा आज कहा जाता है. वैसे भी हिन्दुस्थान ने दुनिया को कई बार और कई क्षेत्रों में नेतृत ...

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    राष्ट्रीय उत्सवों का पुनरुद्धार – संस्कृति के व्यावसायीकरण का प्रतिकार

    वैदिक काल से लेकर समकालीन इतिहास तक, हमें ऐसे महान संत और विद्वान मिलते हैं, जो हमें यह तथ्य विस्तारपूर्वक बताते हैं कि कैसे और क्यों यह एक राष्ट्र है. लेकिन वर्ष 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर अपने पहले भाषण में, पं. नेहरू ने कहा कि इंडिया दैट इज भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है. इससे उनका आशय यह था कि हम अतीत में एक राष्ट्र नहीं रहे थे. तब से अब तक नीति यही रही है. श्री अरबिंदो और श्री राधा कुमुद मुखर्जी जैसे नेहर ...

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    हिन्दुत्व – नए संदर्भ, नई परिभाषा

    हिन्दुत्व के संदर्भ बदल रहे हैं. हिन्दुत्व की ओर देखने का दृष्टिकोण भी बदल रहा है. और यह घटनाक्रम अत्यंत तेज गति से घटित हो रहा है. राजनीतिक परिदृश्य में हिन्दुत्व पर गर्व (अभिमान) करने वाली पार्टी के शासन में आते ही, अनेकों का हिन्दुत्व और हिन्दूवादी संगठनों की और देखने का नजरिया बदल रहा है, बदल गया है. हिन्दुत्व क्या है? हिन्दू की पहचान, हिन्दू की अस्मिता याने हिन्दुत्व. वीर सावरकर जी ने अपने हिन्दुत्व ग् ...

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