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    शिक्षा सुधार की हर कोशिश ‘भगवाकरण’ नहीं होती

    भारत सरकार में 2009 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दूसरा मंत्रिमंडल गठित हुआ, शिक्षा में गुणात्मक विकास और व्यापक विस्तार के लिए शिक्षा संस्था और विद्यार्थी का एक मानक निर्धारित किया। इस मानक के अनुसार जिन शिक्षा संस्थाओं में विज्ञान, गणित, भाषा और सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई नहीं होगी, उन ''विद्यालयों'' और न पढ़ने वाले ''छात्रों'' को विद्यार्थी की श्रेणी में शामिल नहीं माना जायेगा। इसका यह तात्पर्य नहीं कि ...

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    उठो भारत ! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से संपूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो

    'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है, उतनी ही समाज पर भी लागू होती है. विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन को बल देते हैं. जब समूचा राष्ट्र ही अपनी शक्तियों को भूलने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है, तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे इस मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है. आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है. ऐसे में स्व ...

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    राष्ट्रीयता की रक्षा, समरसता के बंधन से !

    अपने हिंदू समाज के व्यक्तिगत तथा पारिवारिक जीवन में रीति, प्रथा तथा परंपरा से चलती आयी पद्धतियों का एक विशेष महत्व है. अपने देश की भौगोलिक विशालता तथा भाषाई विविधता होते हुए भी समूचे देश में विविध पर्व, त्यौहार, उत्सव आदि सभी सामूहिक रीति से मनाये जाने वाले उपक्रमों में समान सांस्कृतिक भाव अनुभव किया जाता है. इसी समान अनुभव को 'हिंदुत्व' नाम दिया जा सकता है. कारण 'हिंदुत्व' यह किसी उपासना पद्धति का नाम नहीं ...

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    युवा हिन्दुस्थान का नेतृत्व कैसा हो ?

    युवकों के नेतृत्व का विचार करने के पूर्व ‘युवा’ माने कौन, इसका प्रथम विचार होना चाहिए. जिनके नेतृत्व के संबंध में विचार करने का समय आया है, उन युवकों की संकल्पना सही मायने में समझे बिना ही उनके नेतृत्व का विचार किया गया, तो सारा मंथन ही व्यर्थ सिद्ध होगा. भारत युवकों का देश है और विश्‍व की महासत्ता बनने की ओर वह बढ़ रहा है, ऐसा आज कहा जाता है. वैसे भी हिन्दुस्थान ने दुनिया को कई बार और कई क्षेत्रों में नेतृत ...

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    राष्ट्रीय उत्सवों का पुनरुद्धार – संस्कृति के व्यावसायीकरण का प्रतिकार

    वैदिक काल से लेकर समकालीन इतिहास तक, हमें ऐसे महान संत और विद्वान मिलते हैं, जो हमें यह तथ्य विस्तारपूर्वक बताते हैं कि कैसे और क्यों यह एक राष्ट्र है. लेकिन वर्ष 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर अपने पहले भाषण में, पं. नेहरू ने कहा कि इंडिया दैट इज भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है. इससे उनका आशय यह था कि हम अतीत में एक राष्ट्र नहीं रहे थे. तब से अब तक नीति यही रही है. श्री अरबिंदो और श्री राधा कुमुद मुखर्जी जैसे नेहर ...

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    हिन्दुत्व – नए संदर्भ, नई परिभाषा

    हिन्दुत्व के संदर्भ बदल रहे हैं. हिन्दुत्व की ओर देखने का दृष्टिकोण भी बदल रहा है. और यह घटनाक्रम अत्यंत तेज गति से घटित हो रहा है. राजनीतिक परिदृश्य में हिन्दुत्व पर गर्व (अभिमान) करने वाली पार्टी के शासन में आते ही, अनेकों का हिन्दुत्व और हिन्दूवादी संगठनों की और देखने का नजरिया बदल रहा है, बदल गया है. हिन्दुत्व क्या है? हिन्दू की पहचान, हिन्दू की अस्मिता याने हिन्दुत्व. वीर सावरकर जी ने अपने हिन्दुत्व ग् ...

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    योग व्यायाम या चिकित्सा मात्र नहीं, एकात्मता पर आधारित जीवन का एक मार्ग है

    संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रधानमंत्री के सुझाव पर, 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में स्वीकार किया गया है. आम तौर पर लोगों के लिए योग का अर्थ आसन और प्राणायाम होता है, जो शरीर को फिट रखने के लिए किए जाते हैं. लेकिन योग मात्र कुछ व्यायाम या चिकित्सा नहीं है. यह एकात्मता - अस्तित्व की एकता पर आधारित जीवन का एक तरीका है. अस्तित्व परस्पर संबद्ध, परस्पर संबंधित और परस्परावलम्बित है, क्योंकि यह एक ही ...

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    स्वतंत्रता संग्राम और संघ

    संघ संस्‍थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्‍मजात देशभक्‍त और प्रथम श्रेणी के क्रांतिकारी थे. वे युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्‍लवी संगठनों में डॉ. पाण्‍डुरंग खानखोजे, अरविन्‍द जी, वारीन्‍द्र घोष, त्रैलौक्‍यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे. रासबिहारी बोस और शचीन्‍द्र सान्‍याल द्वारा प्रथम विश्‍वयुद्ध के समय 1915 में सम्‍पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्‍यभारत के प्रमुख थे ...

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    आज का मीडिया और हम

    ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को देवर्षि नारद जयंती मनाई जाती है. देवर्षि नारद को दुनिया के प्रथम पत्रकार के रूप में देखा जाता है. समूचे हिंदुस्थान में नारद जयंती का दिवस पत्रकार दिवस के रूप में  मनाया जाता है. लेकिन फिल्मों में दिखाये जाने वाले दृश्यों के कारण और कुछ कथाओं के कारण देवर्षि नारदजी के बारे में गलत अवधारणाएं समाज में प्रचलित हुई हैं. नारद जी की चुगलखोर के रूप में नकारात्मक छवि बनाई गयी है. वास्तव में ...

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    सीमा पर रहने वाले भारतीय किसान हिन्दुस्तान की पहचान भी हैं

    नई दिल्ली. दूर-दूर तक रेत के पहाड़ और उनके बीच निःशब्दता को भंग करती सिंधु और उसकी सहायक नदियां – श्योक और जंस्कार. श्योक और जंस्कार को भी समृद्ध करने वाली छोटी नदियां नुब्रा, सरू, डोडा और लुंगनक और छोटी-बड़ी जलधाराएं. भारत के सीमांत पर उत्तर-पश्चिम का लद्दाख क्षेत्र है यह. इन नदियों ने अपने साथ लायी मिट्टी से इस रेगिस्तान में जगह-जगह उपजाऊ मैदानों का निर्माण किया है. मीलों तक फैले हरे-भरे चरागाह इस क्षेत्र ...

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