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    धर्मांतरण पर चिंता

    संगठित धर्मांतरण पर हिंदू संगठनों को कठघरे में खड़ा करना कथित हिंदू-आतंकवाद पर शोर-शराबा करने के समान है. यानी वास्तविक दोषियों और मूल गड़बड़ी पर चुप्पी साधने जैसी बात. वस्तुत: आतंकवाद और संगठित धर्मांतरण, इन दोनों ही समस्याओं के संदर्भ में हिंदू तो पीड़ित समुदाय है, उत्पीड़क नहीं. धर्मांतरण  संबंधी घटनाओं के सदियों के अनुभव, आंकड़े तथा उन पर भारतीय महापुरुषों के सुचिंतित वचन और शिक्षायें, सभी निरपवाद रूप से यही ...

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    घरवापसी से उठा निष्कारण विवाद : मा. गो. वैद्य

    उत्तर प्रदेश के आगरा महानगर में 57 मुस्लिम परिवारों ने फिर से अपने मूल हिन्दू धर्म में प्रवेश किया. इस घटना को लेकर संसद में तथा प्रसार माध्यमों में अकारण विवाद खड़ा किया जा रहा है. अनेक लोगों ने इस विधि को धर्मान्तरण, धर्म परिवर्तन, अंग्रेजी में ‘कन्व्हर्शन’ कहा है. किन्तु यह धर्मपरिवर्तन नहीं है. यह अपने ही घर में यानी समाज में परावर्तन यानी पुनरागमन है. यह ‘घरवापसी’ है. उनका धर्म परिवर्तन तो पहले ही हो चु ...

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    राष्ट्र की विजिगीषा जगाने की अनिवार्यता

    श्री कृष्ण के गीता उपदेश से पूर्व का अर्जुन और संवाद के बाद का अर्जुन-दोनों ही एकदम विभिन्न व्यक्ति हैं. कौरव सेना में अपने अग्रजों और संबंधियों को देखकर अर्जुन हतोत्साहित होकर युद्ध न लड़ सकने की बात भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं. परन्तु कृष्ण ने उसका चित्त, मन और मस्तिष्क इस प्रकार बदला कि उसके बाद अर्जुन को विजय ही विजय दिखाई दी. अर्जुन की यह यात्रा जिजीविषा से विजिगीषा तक की है अर्थात केवल मात्र जीने का ...

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    गीता पर औचित्यहीन पंथनिरपेक्षी विलाप

    कथित पंथनिरपेक्षी व्यथित हैं. पंथनिरपेक्षता को खतरा है. नरेंद्र मोदी की सरकार ने संस्कृति और संस्कृत को बढ़ावा दिया है. उनकी मानें तो सांस्कृतिक मूल्य पंथनिरपेक्ष नहीं हैं. ताजा खतरा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के दर्शन ग्रंथ गीता से है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की आवश्यकता बताई है. कथित पंथनिरपेक्षी विलापरत हैं. उनके अनुसार गीता की महत्ता से संविधान के 'धर्मनिरपेक्ष चरित्र' ...

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    गीता पर संकीर्ण राजनीति

    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि महान पवित्र ग्रंथ भगवद् गीता भी संकीर्ण राजनीति से बच नहीं पा रही है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की हिमायत करने के बाद विरोधी दलों ने उन पर हमले तेज कर दिये हैं. कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में सुषमा स्वराज ने भगवदद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बात कहते हुए दलील दी थी कि गीता में हर वर्ग और हर तरह की समस्याओं का समाधान है, लिहाजा इसे र ...

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    यूरोपीय इतिहास के विरोध में विश्व संगठित हो

    इक्कीसवीं सदी तक विज्ञान का विकास सूचना तकनीक, जैव विज्ञान और नैनोविज्ञान तक आ चुका है, लेकिन आज भी विश्व का इतिहास 'वंशवाद' नामक दकियानूसी सिद्धांत पर ही निर्भर है. विश्व का विभाजन आज भी 'वंश सिद्घांत’ पर ही आधारित है. यह सिद्धांत कहता है कि आज के विश्व का विस्तार नोहा की कहानी के आधार पर तुर्किस्तान के अरावत पर्वत से हुआ है़, यह कहानी जेनेसिस में है. उसी को आधार मानकर आज विश्व के 80 प्रतिशत देशों की पाठशा ...

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    गीता से बन सकती है सबको अपना मानने की प्रकृति : प.पू. सरसंघचालक

    5 हजार 1 सौ 51 वर्ष भगवद्गीता के पूरे हुये और हमारे विदेशी दिनदर्शिका में प्रतिवर्ष गीता जयंती है. आज भी अपने देश में सर्वत्र ऐसे लोग हैं जिनको गीता के 18 अध्याय कंठस्थ हैं. पढ़ने वाले लोग हैं, देखने वाले लोग हैं, उस पर बोलने वाले लोग हैं, इतनी सुदीर्घ परम्परा में समय के अनेक फेरों में श्रीमदभगवद् गीता को लेकर अनेक टीकायें और अनेक भाष्य बने और आगे भी बनते रहेंगे. जब-जब कभी किसी समाज को संकट से उबारने की, सम ...

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    सौहार्द से भरे विश्व की खोज

    मैं हमेशा कहता रहा हूं कि दुनिया भर के सात अरब लोग हैसियत और ताकत में जैसे भी हों, मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से एक ही तरह के हैं. चाहे राजा हो या रानी, भिखारी या धर्मगुरु- सब एक ही तरह से जन्म लेते हैं. फर्क हम ही करते हैं. बड़े होकर भूलने लगते हैं कि हम सबका जन्म एक समान ही हुआ है. फर्ज कीजिये कि एक बड़ी प्राकृतिक आपदा आये और हम उसमें से बच निकलें तो उस वक्त तमाम अंतरों को भूल जायेंगे. यह बात बच्चों ...

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    ईसाइयत की आंधी और पश्चिमी देशों की थानेदारी

    पिछले कुछ समय से किसी भी महासत्ता की कसौटी इस बात पर निर्भर होती आ रही है कि विश्व के अन्य देशों पर उसका किस सीमा तक नियंत्रण है. व्यापार,औद्योगिक कारोबार, विज्ञान-तकनीक, खेती जैसे हर क्षेत्र में नियंत्रण का पैमाना मापा जाता है. उसी से उन महासत्ताओं की अन्य देशों पर थानेदारी की सीमा और क्षमता स्पष्ट हो जाती है. पिछले 100 वर्ष में ही जिन देशों के महासत्ता होने का आभास हो रहा था, वैसे तत्कालीन सोवियत संघ और आ ...

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    भारत-तोड़ो जमात के प्यादे

    बीसवीं और इक्कीसवीं सदी विकसित विज्ञान की सदी मानी जाती है. सूचना तकनीक, जैविक तकनीक और नैनो तकनीक का इतना विस्तार हुआ है कि आज तक के विज्ञान के पूरे विकास को पीछे धकेलते हुए विकास के नये आयाम हमारे सामने आये हैं. माना जाता था कि विज्ञान का विकास अथवा नये आयाम औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि, औषधि उत्पादन जैसे क्षेत्रों तक सीमित होंगे. लेकिन ऐसा नहीं है,यह प्रयोग तो कुछ मनुष्यों के दिमाग के साथ भी चल रहा है. नई ...

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