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    वे पन्द्रह दिन… / 08 अगस्त, 1947

    शुक्रवार आठ अगस्त.... इस बार सावन का महीना ‘पुरषोत्तम (मल) मास’है. इसकी आज छठी तिथि है, षष्ठी. गांधीजी की ट्रेन पटना के पास पहुंच रही है. सुबह के पौने छः बजने वाले हैं. सूर्योदय बस अभी हुआ ही है. गांधी जी खिड़की के पास बैठे हैं. उस खिड़की से हलके बादलों से आच्छादित आसमान में पसरी हुई गुलाबी छटा बेहद रमणीय दिखाई दे रही है. ट्रेन की खिड़की से प्रसन्न करने वाली ठण्डी हवा आ रही है. हालांकि उस हवा के साथ ही इंजन से ...

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    अज्ञात स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 7

    नरेंद्र सहगल हिन्दू धर्म के सिद्धांतों और अधिकांश रीतिरिवाजों में डॉ. हेडगेवार पूर्ण निष्ठा रखते हुए जेल में अपनी दिनचर्या का निर्वाह करते थे. वे यज्ञोपवीत पहनते थे. जेल के नियमों के अनुसार जब उन्हें इसे उतारने के लिए कहा गया तो उन्होंने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया ‘मैं इसे नहीं उतार सकता, यह मेरा धार्मिक हक है, इसमें दखलअंदाजी करने का आपका कोई अधिकार नहीं बनता’. उस समय जेल के पर्यवेक्षक एक आयरिश सज्जन थ ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 07 अगस्त, 1947

    गुरुवार, 07 अगस्त. देश भर के अनेक समाचार पत्रों में कल गांधी जी द्वारा भारत के राष्ट्रध्वज के बारे में लाहौर में दिए गए वक्तव्य को अच्छी खासी प्रसिद्धि मिली है. मुम्बई के ‘टाईम्स’ में इस बारे में विशेष समाचार है, जबकि दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान’ में भी इसे पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. कलकत्ता के ‘स्टेट्समैन’ अखबार में भी यह खबर है, साथ ही मद्रास के ‘द हिन्दू’ ने भी इसs प्रकाशित किया है. “भारत के राष्ट्रध ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 6

    नरेंद्र सहगल प्रखर राष्ट्रभक्ति की सुदृढ़ मानसिकता के साथ डॉक्टर हेडगेवार ने ‘कांग्रेसी’ कहलाना भी स्वीकार कर लिया. नागपुर अधिवेशन में अपना रुतबा जमाने के बाद वे महात्मा गांधी द्वारा मार्गदर्शित असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिए जी जान से जुट गए. गांधी जी के आह्वान पर सारा देश अहसयोग आंदोलन में हर प्रकार से शिरकत करने को तैयार हो गया. पूर्व में अनुशीलन समिति द्वारा संचालित सशस्त्र क्रांति और बाद में 1857 जै ...

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    वे पंद्रह दिन… / 06 अगस्त, 1947

    बुधवार... छः अगस्त. हमेशा की तरह गांधी जी तड़के ही उठ गए थे. बाहर अभी अंधेरा था. ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर के निकट ही गांधीजी का पड़ाव भी था. वैसे तो ‘वाह’ कोई बड़ा शहर नहीं था, एक छोटा सा गांव ही था. परन्तु अंग्रेजों ने वहां पर अपना सैनिक ठिकाना तैयार किया हुआ था. इसीलिए ‘वाह’ का अपना महत्व था. प्रशासनिक भाषा में कहें तो यह ‘वाह कैंट’ था. इस ‘कैंट’ में, अर्थात् वाह के उस ‘शरणार्थी कैम्प’ के एक बंगले में, गांधी ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 5

    नरेंद्र सहगल भारत में चल रहे सभी प्रकार के स्वतंत्रता-आंदोलनों, शस्त्रक्रांति के प्रयत्नों, समाज सुधार के लिए कार्यरत विभिन्न संस्थाओं तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जागरण में जुटी सभी धार्मिक संस्थाओं का निकट से अध्ययन करने के लिए डॉक्टर साहब इनके सभी कार्यकलापों में यथासम्भव भागीदारी करते थे. उनका यह निश्चित मत था कि देश के शत्रुओं को जिस किसी भी मार्ग से भारत भूमि से निकाला जा सके, वही उचित तथा योग्य है. इ ...

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    वे पंद्रह दिन… / 05 अगस्त, 1947

    आज अगस्त महीने की पांच तारीख... आकाश में बादल छाये हुये थे, लेकिन फिर भी थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी. जम्मू से लाहौर जाते समय रावलपिन्डी का रास्ता अच्छा था, इसीलिए गांधी जी का काफिला पिण्डी मार्ग से लाहौर की तरफ जा रहा था. रास्ते में ‘वाह’ नामक एक शरणार्थी शिविर लगता था. गांधी जी के मन में इच्छा थी कि इस शिविर में जाकर देखा जाए. लेकिन उनके साथ जो कार्यकर्ता थे, वे चाहते थे कि गांधी जी वहां न जा सकें. क्योंकि ...

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    अज्ञात  स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 4

    नरेंद्र सहगल नेशनल मेडिकल कॉलेज कलकत्ता से डॉक्टरी की डिग्री और क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति में सक्रिय रहकर क्रांति का विधिवत प्रशिक्षण लेकर डॉक्टर हेडगेवार नागपुर लौट आए. स्थान-स्थान से नौकरी की पेशकश और विवाह के लिए आने वाले प्रस्तावों का तांता लग गया. डॉक्टर साहब ने बेबाक अपने परिवार वालों एवं मित्रों से कह दिया ‘मैंने अविवाहित रहकर जन्मभर राष्ट्रकार्य करने का फैसला कर लिया है’. इसके बाद विवाह और नौक ...

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    वे पन्द्रह दिन… / 04 अगस्त, 1947

    आज चार अगस्त... सोमवार. दिल्ली में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की दिनचर्या, रोज के मुकाबले जरा जल्दी प्रारम्भ हुई. दिल्ली का वातावरण उमस भरा था, बादल घिरे हुए थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी. कुल मिलाकर पूरा वातावरण निराशाजनक और एक बेचैनी से भरा था. वास्तव में देखा जाए तो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए माउंटबेटन के सामने अभी ग्यारह रातें और बाकी थीं. हालांकि उसके बाद भी वे भारत में ही रहने वाले थे, भारत ...

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    भारतीय ज्ञान का खजाना – 6

    भारतीय संस्कृति के वैश्विक पदचिन्ह – 1 गुजरात के सोमनाथ मंदिर के बाण-स्तंभ पर एक श्लोक उकेरा हुआ (लिखा हुआ) है – "आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग...!" [‘इस मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधे रास्ते में एक भी बाधा (जमीन) नहीं है. यहां से ज्योति (अर्थात प्रकाश) का मार्ग सीधा वहां तक पहुँच सकता है] अर्थात् डेढ़-दो हजार वर्ष पहले भी अपने भारतीयों को दक्षिण ध्रुव के बारे में सटीक जानकारी थी. इसका अ ...

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