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    बब्बर शेर आज भी जिंदा है

    महाराजा रणजीत सिंह जी की पुण्यतिथि पर विशेष    - इकबाल सिंह लालपुरा महाराजा रणजीत सिंह 40 साल राज करके जून 27, 1839 को इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए. 2020 ईस्वी में उनकी मौत के 181 वर्ष बाद बीबीसी द्वारा किए गए एक सर्वे में उन्हें संसार का महानतम शासक चुना गया. उनके बाद दूसरे नंबर पर अफ्रीकी शासक एमिलकारकैब्रिएल, तीसरे नंबर पर विन्स्टर चर्चिल ब्रिटानिया और चौथे नंबर पर अब्राहम लिंकन का नाम आता है. यह चुनाव ...

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    भारत की सीमा को अक्षुण्ण किये बिना नहीं रुकेगा यह अभियान

    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर विशेष  -  आशुतोष भटनागर 23 जून को डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस है. किसी ने सोचा भी नहीं था कि स्वतंत्र भारत में भी देश की एकता और अखण्डता के लिये बलिदान देना होगा. लेकिन ऐसा हुआ. डॉ. मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर की एकात्मता के लिये सर्वोच्च बलिदान दिया. कोई भी बलिदान तभी सार्थक होता है, जब वह उस उद्देश्य को पूरा करने में समर्थ होता है. जिसके लिये वह बलिदान द ...

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    युगपुरुष डॉक्टर हेडगेवार – 21 जून पुण्यतिथि

    नरेंद्र सहगल एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने जन्मकाल से आज तक नाम, पद, यश, गरिमा, आत्मप्रशंसा  और प्रचार से कोसों दूर रहकर राष्ट्र हित में समाजसेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्रभक्ति के प्रत्येक कार्य में अग्रणी भूमिका निभाई है. भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम में भी संघ ने आजादी के लिए संघर्षरत तत्क ...

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    11 जून / जन्मदिवस – काकोरी कांड के नायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को नमन

    नई दिल्ली. पंडित रामप्रसाद का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था. इनके पिता मुरलीधर जी शाहजहांपुर नगरपालिका में कर्मचारी थे. पर, आगे चलकर उन्होंने नौकरी छोड़कर निजी व्यापार शुरू कर दिया. रामप्रसाद जी बचपन से महर्षि दयानन्द तथा आर्य समाज से बहुत प्रभावित थे. शिक्षा के साथ साथ वे यज्ञ, संध्या वन्दन, प्रार्थना आदि भी नियमित रूप से करते थे. स्वामी दयानन्द द्वारा विरचित ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्र ...

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    कारगिल युद्ध का अमर योद्धा – कैप्टन सौरभ कालिया

    09 जून, 1999, कारगिल युद्ध की आहट का साक्षी अमर योद्धा कैप्टन सौरभ कालिया के अदम्य साहस की दास्तान अगला जन्म मैं जब भी पाऊँ , इसी धरा का मैं हो जाऊं दिल में भारत माता हो, गीत उसी के सदा मैं गाऊँ देश की सीमाओं को शत्रु के नापाक हाथों से बचाने के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले अमर बलिदानी सैनिकों की गौरवमयी परंपरा है. भारतमाता के ऐसे अनगिनत लाडले बलिदानी बेटों में एक 22 वर्षीय दुलारे कैप्टन सौरभ कालिया थे, ज ...

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    कारगिल युद्ध के नायक – कैप्टन अमोल कालिया

    08 जून, 1999, कारगिल के वीर बलिदानी कैप्टन अमोल कालिया की वीरगाधा, जब अमोल कालिया पैराशूट से 18 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर उतरे और दुश्मनों को ढेर कर विजय हासिल की 08 जून 1999! कैप्टन अमोल कालिया और उनकी टुकड़ी के सैनिकों को बटालिक सेक्टर की 18 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर पैराशूट की मदद से उतारा गया. मिशन था - सामने की पहाड़ी पर चौकी नंबर 5302 को पाकिस्तानी घुसपैठियों के कब्जे से आजाद करवाना. ऐसे मुकाबलों के लिए ह ...

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    विनायक सावरकर : स्वर्णिम अध्याय का नाम

    डॉ. पवन सिंह मलिक "मैं तुम्हारे दर्शन करने आया हूँ मदन, मुझे तुम पर गर्व है. सावरकर तुम्हें मेरी आँखों में डर की परछाई तो नहीं दिखाई दे रही, बिल्कुल नहीं मुझे तुम्हारे चेहरे पर योगेश्वर कृष्ण का तेज दिखाई दे रहा है, तुमने गीता के स्थितप्रज्ञ को साकार कर दिया है मदन". न जाने ऐसे कितने ही जीवन हैं जो सावरकर से प्रेरणा प्राप्त कर मातृभूमि के लिए हंसते हंसते बलिदान हो गए. महापुरुषों का स्मरण व सदैव उनके गुणों क ...

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    भविष्यद्रष्टा सावरकर

    -  प्रशांत पोळ निर्भयता, निडरता, निर्भीकता. इन सब का पर्यायवाची शब्द हैं – वीर सावरकर. इस सामान्य कद – काठी के व्यक्ति में असामान्य और अद्भुत धैर्य था. अपने 83 वर्ष के जीवन में वे किसी से नहीं डरे. २२ जून, १८९७ को, जब चाफेकर बंधुओं ने अत्याचारी अंग्रेज़ अफसर रॅंड को गोली से उड़ाया, तब विनायक दामोदर सावरकर की आयु थी मात्र १४ वर्ष. किन्तु इस घटना ने उनको इतना ज्यादा प्रेरित किया, कि उन्होने माँ भवानी के सामने द ...

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    क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस

    25 मई / जन्मदिवस बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रत्येक देशवासी के मन में भारत माता की दासता की बेड़ियाँ काटने की उत्कृष्ट अभिलाषा जोर मार रही थी. कुछ लोग शान्ति के मार्ग से इन्हें तोड़ना चाहते थे, तो कुछ जैसे को तैसा वाले मार्ग को अपना कर बम-गोली से अंग्रेजों को सदा के लिये सात समुन्दर पार भगाना चाहते थे. ऐसे समय में बंगभूमि ने अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिनकी एक ही चाह और एक ही राह थी - भारत माता की पराधीन ...

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    22 मई / बलिदान दिवस – अमर बलिदानी मुरारबाजी

    नई दिल्ली. पांच जनवरी, 1665 को सूर्यग्रहण के अवसर पर शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई के साथ महाबलेश्वर मन्दिर में पूजा की. फिर वे दक्षिण के विजय अभियान पर निकल गये. तभी उन्हें सूचना मिली कि मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ पूना में पुरन्दर किले की ओर बढ़ रहे हैं. शिवाजी दक्षिण अभियान को स्थगित करना नहीं चाहते थे, पर इन्हें रोकना भी आवश्यक था. कुछ ही समय में मुगल सेना ने पुरन्दर किले को घेर लिया. वह निकटवर्ती ग ...

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