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    कांग्रेस, कम्युनिस्ट, आपातकाल और वर्तमान स्थिति

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    – रवि प्रकाश

    भारत में राजनैतिक आपातकाल पर चर्चा करनी हो तो एक सुविधा यह रहती है कि इसे सीधे आपातकाल से ही आरम्भ किया जा सकता है. 25 जून होने के कारण रस्मी तौर पर ही नहीं, बल्कि जब पूरे देश में “फासीवाद” और “अघोषित आपातकाल” का डर दिखाकर अपनी सांसों को जीवंत रखना राजनीति के एक धड़े का मुख्य आधार बन गया है, तो उसके सत्य और तथ्य को समझने के ख्याल से भी आपातकाल पर चर्चा करना ज़रूरी लगता है. सीधी बात करें तो इंदिरा गाँधी 1971 के लोकसभा निर्वाचन में अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर दोबारा आसीन हुई थीं. लेकिन चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार राज नारायण ने उन पर चुनाव में धन, बल, छल और सत्ता के उपयोग का आरोप लगाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया. 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी को सरकारी तंत्र के दुरुपयोग की जिम्मेवार और मंच बनाने के लिए राज्य पुलिस का इस्तेमाल करने, चुनाव के दौरान खुद के लिए सरकारी अधिकारी यशपाल कपूर की सेवा लेने और सरकारी बिजली विभाग की बिजली का प्रयोग करने का दोषी पाया. न्यायाधीश ने इस अपराध के लिए भारत की निवर्तमान प्रधानमन्त्री, इंदिरा गाँधी के लोकसभा सदस्य के रूप में निर्वाचन को रद्द कर दिया और अगले छह वर्षों के लिए उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. न्यायालय का फैसला अपने पक्ष में करने के लिए इंदिरा गाँधी ने तमाम हथकंडे अपनाए. भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रकारों और राजनयिकों में से एक, कुलदीप नैयर की मानें तो अदालत का फैसला आने के पहले 12 जून, 1975 के दिन इंदिरा गाँधी के वरिष्ठतम निजी सचिव, नेवुल्ने कृष्णा अय्यर सेशन खबरों के लिए बेचैन एक मशीन से दूसरी मशीन तक भागमभाग कर रहे थे तो दूसरी और उत्तर प्रदेश से एक संसद सदस्य इलाहाबाद जाकर न्यायाधीश सिन्हा से पूछ रहे थे कि वे 5,00,000 रुपये में बात बन सकती है या नहीं. न्यायाधीश सिन्हा ने कोई उत्तर नहीं दिया था. बाद में उनके एक सहकर्मी न्यायाधीश ने उन्हें बताया था कि ‘फैसला’ आने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की बात थी. खैर, फैसला जो आना था, वह इतिहास का हिस्सा है.
    ऐसे में इंदिरा गाँधी ने लोकतंत्र और न्यायिक व्यवस्था का सम्मान करते हुए अपने पद का त्याग करने के बदले अपने बड़े पुत्र संजय गाँधी व अन्य सिपहसालारों के साथ षड्यंत्रकारी मंत्रणाओं में लगी रहीं और 25 जून, 1975 की रात घड़ी की सूई के ठीक 12 पर पहुँचने के चंद मिनट पहले देश में आंतरिक खतरे के नाम पर आपातकाल की घोषणा कर दी गयी. आपातकाल की घोषणा होते ही इंदिरा गाँधी का खूंखार तानाशारी चेहरा नेहरु की विरासत और लोकतांत्रिक परम्पराओं के सारे लबादे और मुखौटे उतार कर प्रकट हो गए. उसके बाद के 19 महीनों में इस देश में जो हुआ, वह अडोल्फ़ हिटलर की तानाशाही से थोड़ा ही कम था. सारी संवैधानिक व्यवस्थाएं निष्प्रभावी और निस्तेज हो गयीं थीं, पूरा देश कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) के संयुक्त आतंक से भयाक्रांत हो गया था. पूरी सत्ता इंदिरा गाँधी के हाथों में केंद्रीभूत हो गयी थी. अखबारों के सम्पादकीय पन्ने सफ़ेद-सपाट हो गए थे, जिसको जहां जैसे मन करे गिरफ्तार कर लेना प्रशासन का मनोरंजन हो गया था. 25 जून 1975 के बाद के 19 महीनों का भारत का इतिहास आतंक, ह्त्या, उत्पीड़न, दमन और अनंत यातनाओं का इतिहास बन गया.

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    अब आज की स्थिति की ओर नजर घुमाएं. जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उस समय आपातकाल के समर्थन में कांग्रेसी आतंक की सहभागी रही थी, वही आज पूरी आज़ादी के साथ पूरे देश में घूम-घूम कर लोगों को फासीवाद और अघोषित आपातकाल के नाम पर बरगलाती है और वापस अपने दिल्ली मुख्यालय में आकर कॉफ़ी का आनंद उठाती है. उसके भाषणवीर न लाठी खाते हैं, न गिरफ्तार होते हैं, न जेल जाते हैं, बस मजे-मजे में देश में आपातकाल होने की बात करते हैं और मजे-मजे में राजनीति करते रहते हैं. कुछ मजेदार उदाहरणों पर गौर करें. इंदिरा गाँधी की आपातकाल को भूल जाएँ. डॉ. मनमोहन सिंह के आवरण में सोनिया गाँधी के 10 साल के शासनकाल को याद करें. सरकार की नाकामियों पर आवाज उठाने पर अन्ना हजारे को उठाकर जेल में डाल दिया गया. डेढ़ बजे रात में दिल्ली के रामलीला मैदान में नींद में सोए बूढ़े, स्त्री, नौजवान, बच्चे आन्दोलनकारियों पर पुलिस की लाठियों से प्रहार किये गए. सड़क पर घसीट-घसीट कर लोगों को पीटा गया, गिरफ्तार किया गया. फासीवाद के विरुद्ध गला फाड़ कर चिल्लाने वाले और शाहीन बाग़ धरना में जाकर खुद को हिन्दू घोषित करने वाले सीताराम येचुरी की पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पश्चिम बंगाल की सरकार अपना हक़ माँगते किसानों पर बन्दूक की गोलियां बरसा देती है और 13 अप्रैल के दिन जालियांवाला बाग़ हत्याकांड पर सिर झुका कर खड़ी भी हो जाती है. भारत बंद के नाम पर जोर जबरदस्ती करते हुए इन वामपंथी पार्टियों के गुंडे कार्यकर्ता सड़कों पर अनिवार्य कार्य से निकले बूढ़ों, महिलाओं, गरीबों, मजदूरों पर हमले करते हैं, और फासीवाद तथा अघोषित आपातकाल पर भाषण भी दे लेते हैं.

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    वस्तुस्थिति क्या है ? जब से वर्तमान सरकार आयी है, आपातकाल लगाने वालों और उनके पिछलग्गू “क्रांतिकारियों” के समूह द्वारा अपनी राजनैतिक नाकामियों को छिपाने के लिए देश में अनर्गल बातों के सहारे भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की जा रही है. 14 दिसम्बर 2019 से लेकर 24 मार्च 2020 तक पूरे 101 दिन दिल्ली के शाहीन बाग़ में मुट्ठी भर लोगों ने सड़कों पर अपना कब्जा रखा. सरकार के लिए आम नागरिकों के सड़क पर चलने के अधिकार का हनन करने वाले, पूरे देश में अव्यवस्था पैदा करने वाले इस तथाकथित आन्दोलन को कुचल देना चुटकी बजाने का काम था. लेकिन केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने ऐसा नहीं किया. संविधान लागू होने के बाद से केंद्र और राज्यों में कांग्रेसी सरकारों द्वारा 1959 में केरल की बहुमत से निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने से लेकर गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में विधायकों को होटलों में बंधक बनाने तक संविधान को तार-तार करने और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ के बेशुमार उदाहरण भरे पड़े हैं. लेकिन वर्तमान सरकार के माथे ऐसा कोई कलंक अभी तक नहीं लगा है. आतंरिक और बाहरी खतरों के आधार पर आपातकाल के लिए आज की स्थितियां सच में परिपक्व हैं, जबकि 1975 में ऐसा कुछ नहीं था, बस इंदिरा गाँधी के अपराध के लिए अदालत ने उन्हें सजा दी थी. लेकिन जिस व्यक्ति ने खुद आपातकाल का आतंक झेला हो, उससे अधिक लोकतन्त्र का मोल और कौन समझ सकता है. इसलिए तो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सारे आघातों को सहते हुए लोकतंत्र की राह पर देश को मजबूत करने की दिशा में अग्रसर हैं. आज के सन्दर्भ में आपातकाल और फासीवाद को इस रूप में समझने और चीन एवं पाकिस्तान परस्त कांग्रेसी तथा वामपंथी विपक्ष की साजिशों से पर्दा उठाने की ज़रुरत है.

    (लेखक भारत विकास परिषद से संबद्ध हैं.)

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