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तिरस्कार, भय और अपनत्व की जंग है कोरोना

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पंकज भारतीय

वैश्विक महामारी कोरोना हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व की कड़ी परीक्षा ले रही है. जिस पल से आप कोरोना पीड़ित हो जाते हैं, तभी से तिरस्कार, भय और अपनत्व का संघर्ष भी शुरू हो जाता है.

जब स्वास्थ्य विभाग के कर्मी यह पुष्टी कर देते हैं कि आप भी महामारी की चपेट में आ गए हैं, तो आप के आस-पास खड़े अन्य बंधुओं की नजर में स्वत: ही तिरस्कार के भाव जागृत हो जाते हैं. रिपोर्ट सार्वजनिक हो जाती है तो आस पड़ोस की नजरें भी बदल जाती हैं. कल तक जो आपको राम-राम करते थे, वे अब नजरें चुराकर जाते हैं. दोष उनका नहीं, हर किसी को ज़िंदगी प्यारी है.

इसके बाद शुरू होता है – भय का चक्कर. एक अकेले कमरे में अगले 17 दिन आप को अकेले काटने हैं, डर इतना कि आपके खांसने से भी परिवारजनों को दूर रखना है. डर, इस बात का भी बीमारी नई है, दवाई है नहीं और परिणाम पता नहीं क्या होगा?

क्या, ये 17 दिन कट जाएंगे, या फिर………. ? भय इस बात का भी कि अकेले में करेंगे क्या? इस दौर में जो मानसिक रूप से कमजोर होंगे, वे बेचारे अवसाद के शिकार हो निकल जाते हैं हरि के धाम.

इन नकारात्मक पक्षों से बढ़कर होती है अपनत्व की भावना. आपके परिजन, मित्रजन किस प्रकार का भाव आपके प्रति रखते हैं? यहीं से आपका बीमारी के प्रति संघर्ष का रुख बदल जाता है. जब आपकी बेटी जो आपके बिना कभी रही ना हो, दूर से आपको निहारती है और कहती है कि पापा जल्दी ठीक होकर आ जाओ तो मन द्रवित तो होता है, परंतु एक आशा भी जगती है. जब प्रतिदिन आपके चुनिंदा मित्रों का सुबह या शाम हालचाल पूछने को फोन आता है तो हिम्मत बढ़ती है. आधुनिक संसार की बोलचाल की भाषा सोशल मीडिया (व्हाट्सएप, फेसबुक) पर आपके मित्र, शुभचिंतक आपके लिए सुखद अनुभूति के संदेश प्रेषित करते हैं तो होंसला दुगना होता है.

करना क्या है इस दौर में

सबसे पहले तो हिम्मत रखनी है, क्योंकि ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है. अपने और अपनों पर आपका विश्वास ही संघर्ष के दौर में सफलता दिला सकता है.

डॉक्टर शॉपिंग यानि हर डॉक्टर के पास जाकर दवाई के लिए संघर्ष नहीं करना है. जो दवाई इस बीमारी के लिए दी है, उसका सेवन करें. काढ़ा पियें और एक संतुलित प्रोटीन युक्त आहार लें. संभव हो तो दिन में एक बार फल का भी सेवन करें. हल्दी युक्त दूध सर्वथा उत्तम है. ऐसा नहीं कि मैं भी डॉक्टर बन गया, पर व्यकिगत अनुभव रख रहा हूँ. हमारे देश में हर व्यक्ति कोई वैद्य या डॉक्टर बन जाता है, (होते तो वे आपके शुभचिंतक ही हैं) पर ये घातक भी होता है. क्योंकि इस बीमारी की ना कोई दवा है, ना अन्य कोई उपचार.

अपने इष्ट देव का सिमरन करने का अवसर आपको मिला है. सुबह शाम भगवत जाप करें. मन शांत रहेगा. यह एकमात्र मार्ग है जो आपको अवसाद मुक्त कर सकता है. तरीका अलग-अलग हो सकता है, परंतु शक्ति यहीं से मिलेगी.

व्यायाम अवश्य करें – (हालांकि, इस पर थोड़ा मतभेद हो सकता है) पर कोशिश करें कि शरीर में हरकत रहे. सुबह 5 से 7 सूर्य नमस्कार आपको स्फूर्ति देंगे. यह करके अपने परिसर में घूमने का क्रम अवश्य बनाए रखें. बीमारी का कोई इलाज नहीं है, जल्दी आ जाएगा, इस पर भी प्रश्नचिन्ह है. केवल आपकी मानसिक व शारीरिक क्षमता ही बीमारी को मात दे सकती है. कमजोर बिलकुल नहीं पड़ना है, सकारात्मक रुख ही आपको स्वस्थ कर देगा. इस बात को हमेशा याद रखें कि आपके इंतज़ार में वे बैठे हैं, जिनके लिए आप ही सारी दुनिया हैं.

याद रखें, तिरस्कार और भय तो मिलेगा पर जीत अपनत्व की ही होगी, कोरोना की जंग में.

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