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भारत में संविधान होने के बावजूद भी बहु-विधान हैं

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संविधान में एक भी ऐसा आर्टिकल नहीं जिसका जिक्र रामायण और गीता में ना हो

भोपाल (विसंकें). कुशाभाऊ ठाकरे फाउंडेशन द्वारा “भारत के संसदीय महापाप” विषय पर आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि भारत में संविधान होने के बावजूद भी बहु-विधान हैं. हर किसी के अपने पर्सनल लॉ हैं, जिन पर देश का संविधान लागू नहीं होता. पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं जो सेकुलर हो और वहां पर्सनल लॉ लागू होते हों. लेकिन भारत सेकुलर होते हुए भी यहां पर्सनल लॉ लागू होते हैं. यह देश के साथ धोखा है और इस धोखे का ईलाज केवल एक है – यूनिफॉर्म सिविल कोड.

परिचर्चा की अध्यक्षता एनएलआईयू की प्रोफेसर डॉ. राका आर्या ने की. परिचर्चा का संचालन अधिवक्ता आदित्य विजय सिंह ने किया. शनिवार को भोपाल के समन्वय भवन में आयोजित परिचर्चा में शहर के विभिन्न महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों व अध्ययन में रुचि रखने वाले शहर के युवा व प्रबुद्धजन उपस्थित रहे.

अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि देश में कई ऐसे कानून बनाए गए जो सुनने में जनहितकारी लगते हैं, लेकिन होते ठीक विपरीत हैं. ‘पूजा स्थल कानून-1991’ के नाम से लगता है कि यह हमें पूजन का अधिकार देता होगा, लेकिन इसके विपरीत यह कानून हमें हमारे आराध्य के स्थलों पर पूजन करने से रोकता है. इसके अलावा अल्पसंख्यक कानून ने देश की एकता और अखंडता को तोड़ने का काम किया है. यह कानून हिन्दुओं से सिक्ख, बौद्ध और जैनों को अलग करता है, जबकि ये हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग हैं. यदि वक्फ़ एक्ट और विदेशी चंदा अधिनियम को बारीकी से समझा जाए तो ज्ञात होगा कि देश में कानून लूटने और बांटने के लिए ही बनाए गए थे.

देश में शिक्षा का अधिकार, लेकिन समान शिक्षा नहीं

उन्होंने कहा कि पूरे देश में हिस्ट्री, पॉलिटी, लॉ, अर्थशास्त्र आदि का एक समान पाठ्यक्रम और पुस्तकें क्यों नहीं हैं. देश ने नागरिकों के लिए शिक्षा का अधिकार तो दिया, लेकिन समान शिक्षा नहीं दी. देश में मंत्री, सन्तरी के बेटे और आम छात्र की किताब अलग-अलग नहीं होनी चाहिए. उनके बोर्ड अलग होने पर भी पाठ्यक्रम तो समान ही होना चाहिए. इसलिए अब आवश्यकता है कि देश में शिक्षा के अधिकार के स्थान पर ‘समान शिक्षा का अधिकार’ कानून बनाया जाना चाहिए.

उपाध्याय ने कहा कि हमारी प्राचीन संस्कृति में धर्म की जय और अधर्म के नाश की कामना की जाती है. लेकिन ये अधर्म का नाश तभी हो पाएगा, जब देश की संसद और न्यायपालिका देशहित में निर्णय करें. यदि हमारे द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि हमारे हित में संसद में आवाज न उठा सकें तो उन्हें हमारे टैक्स से मिलने वाली सुविधाओं को भोगने का कोई अधिकार नहीं. यह हमारी गलती है कि हमने अपने घर में तो हिसाब मांगने का काम किया, लेकिन शासन से कभी हिसाब नहीं मांगा. जिन्हें हम टैक्स देते हैं. यदि हमने हिसाब मांगा होता तो हम पर वक्फ एक्ट जैसे कानून नहीं थोपे जाते, जिनका सहारा लेकर विधर्मी हमारी जमीनों पर कब्जा कर लेते हैं. यदि हम अधर्म का नाश नहीं करेंगे तो हमारी जमीनों पर कब्जा होना तय है.

उन्होंने कहा कि हमारे देश में सदियों से समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए नियम एवं कानून व्यवस्था थी. मैंने संविधान में एक भी ऐसा आर्टिकल नहीं देखा, जिसका जिक्र रामायण और गीता में ना हो. हमारे धर्म ग्रंथ आदर्श समाज व्यवस्था के संचालन के लिए पर्याप्त हैं.

कुशाभाऊ ठाकरे फाउंडेशन एक ऐसा मंच है, जिसने देश में पहली बार खुले तौर पर भारत के संसदीय महापापों पर चर्चा आयोजित कर समाज में विमर्श का एक नया विषय छेड़ा है. उनका यह प्रयास साधुवाद योग्य हैं.

कुशाभाऊ ठाकरे फाउंडेशन के संस्थापक अंशुल तिवारी ने कहा कि हमारा सदैव प्रयास रहता है कि हम समाज में एक सकारात्मक विमर्श स्थापित करें. आज जब कुछ कानूनों की आड़ में समाज को विभाजित करने के नरेटिव चलाए जा रहे हों, तब संसद की उन गलतियों पर चर्चा करना आवश्यक है. जिनके कारण आमजन का जीवन प्रभावित होता है. भारत के संसदीय महापापों पर चर्चा आयोजित करने का उद्देश्य भी यही है. यदि फाउंडेशन के प्रयासों से समाज में सकारात्मक विमर्श स्थापित होकर, युवा वैचारिक रूप से समृद्ध होता है और देशहित में कोई बदलाव लाता है तो यही फाउंडेशन की सफलता होगी.

फाउंडेशन प्रतिमाह 2 ‘Table Talk’ के माध्यम से विभिन्न विषयों पर गोष्ठी का आयोजन कराता है. पिछली परिचर्चाओं में नेताजी सुभाष चन्द्र जी के गुम होने के तथ्यों के साथ ही ‘मेडल से अधिक खेलों की महत्वता’, ‘नवाबों से पहले भोपाल का समृद्ध इतिहास’, ‘मुफ्त की रेवड़ियां बनाम अंत्योदय’ व ‘महिला केन्द्रित युवा नीति’ आदि विषयों पर परिचर्चा का आयोजन किया. इसी श्रृंखला में भारत के संसदीय महापापों पर विस्तृत चर्चा के लिए फाउंडेशन द्वारा परिचर्चा का आयोजन किया गया.

परिचर्चा में भोपाल के विभिन्न महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों के विधि, इतिहास, पत्रकारिता सहित अन्य विषयों के अध्ययनशील छात्र-छात्राओं सहित प्रबुद्धजन शामिल हुए.

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