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धर्मरक्षक वीरव्रति खालसा पंथ – भाग एक

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भक्ति आधारित शक्ति के प्रवर्तक गुरु नानकदेव जी

नरेंद्र सहगल

भारतीय इतिहास इस सच्चाई का साक्षी है कि जब भी विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा भारत पर आक्रमण करके हमारे सनातन जीवन मूल्यों को समाप्त करने का प्रयास किया गया, हमारे आध्यात्मिक महापुरुषों ने विधर्मी हमलावरों के अत्याचारों का सामना किया और समाज को जगाकर उसमें एकात्मता स्थापित करने के अपने राष्ट्रीय कर्तव्य की पूर्ति की. गुरु नानकदेव जी से दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी तक 10 गुरुओं की परंपरा भारत के इसी वीरव्रति इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है.

धर्मरक्षक खालसा पंथ की पृष्ठभूमि, विचारधारा और उद्देश्य को समझने के लिए भारतीय इतिहास का अवलोकन करें और देखें कि हमारे राष्ट्र जीवन का निर्माण करने और उसे अमरत्व प्रदान करके आज तक अनेक विदेशी आघातों से बचाकर रखने के पीछे भारत के संत-महात्माओं का कितना योगदान है. जिन देशों की संस्कृति, इतिहास एवं समस्त राष्ट्र जीवन विदेशी आक्रमणों के प्रथम अज्ञात में ही धाराशाही हो गए, उनके तथा हमारे जीवन मूल्यों में क्या अंतर है?

अत्यंत प्राचीन काल में रावण ने एक धूर्त आक्रांता के रूप में हमारे देश पर आक्रमण करने प्रारंभ कर दिए. संपूर्ण समाज यहां तक कि देवता भी रावण के पैरों तले कराह रहे थे. रावण की इस राक्षसी शक्ति को परास्त करने के लिए तथा समाज में प्रचंड नवचेतना भरने के लिए हमारी संत शक्ति आगे आई. महर्षि विश्वामित्र, वशिष्ठ एवं अगस्त्य इत्यादि ने संपूर्ण देश में क्षात्रधर्म की प्रतिष्ठापना करने के लिए एक प्रचंड भक्ति आंदोलन प्रारंभ करके समाज में जाग्रति लाने का कार्य किया.

इन संतों ने अपने प्रवचनों, विभिन्न धार्मिक गतिविधियों एवं वार्तालापों द्वारा समाज को राष्ट्रीय चेतना से उद्दीप्त कर दिया. परिणाम स्वरूप राष्ट्र ने अपने को श्रीराम के वीरव्रती व्यक्तित्व में उठाया. क्षात्रधर्म ने अंगड़ाई ली. अंत में श्रीराम को वह भीषण शक्ति भी महर्षि अगस्त्य से ही प्राप्त हुई, जिससे राक्षस राज रावण का वध हो सका. परिणाम स्वरूप अधर्म की आक्रामक आंधी थम गई.

बौद्ध युग में भी इसी इतिहास की पुनरावृत्ति हुई. महात्मा बुद्ध के पश्चात उनके अनेक अनुयायियों ने सनातन परंपराओं को तिलांजलि देकर हमारे समाज द्वारा पोषित सांस्कृतिक सद्गुणों का विनाश करना शुरू कर दिया. यहां तक कि विदेशी आक्रमणकारियों की सहायता करने जैसे देश घातक पग भी उठाए गए. इन दुर्भाग्यशाली क्षणों में समाज को संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए आदि शंकराचार्य प्रकट हुए. इस युगपुरुष ने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक अखंड प्रवास करके देश के ओज को पुनः जाग्रत कर दिया. राष्ट्रद्रोहियों का अंत होकर चाणक्य जैसे धुरंधर राष्ट्र नायकों द्वारा चंद्रगुप्त जैसे वीरव्रती सम्राट तैयार हुए. परिणाम स्वरूप विदेशी आक्रांता परास्त हुए.

अनेक शताब्दियों के बाद समाज में पुनः सुप्तावस्था आई. देशद्रोहियों ने फिर सर उठाना शुरू किया. सदैव की भांति इस बार भी संतों ने मोर्चा संभाला. एक बार पुनः क्षात्रधर्म की पुनर्स्थापना के प्रयास हुए. स्वामी विद्यारण्य तथा उनके सन्यासी शिष्यों ने देश के प्रत्येक कोने में राष्ट्रभक्ति का शंख बजा दिया. भक्ति आंदोलन की एक प्रचंड ज्वाला सारे समाज में फैल गई. इन संतों द्वारा आरंभ किए गए आध्यात्मिक तथा राष्ट्रीय जागरण के फलस्वरूप विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हुई. महाराज कृष्णदेव राय के नेतृत्व में क्षात्रधर्म का उदय हुआ.

मुसलमानों की राजसत्ता के कालखंड में भी महान संत एवं सन्यासी उत्पन्न हुए. चैतन्य, तुलसीदास, सूरदास, ज्ञानेश्वर, रामानंद, तुका राम, रामानुज, नानक तथा इसी प्रकार के अनेक संत हुए, जिन्होंने देश को धार्मिक परंपराओं के साथ संगठित किया. लोगों में अपने देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा एवं आस्था का जागरण हुआ. फलस्वरुप समाज ने अपने को छत्रपति शिवाजी के रूप में प्रकट किया. इस सांस्कृतिक जागरण का ही परिणाम था नवीन क्षात्रधर्म.

इसी तरह जब उत्तर भारत में विदेशी शासकों के जुल्मों के नीचे समाज रौंदा जा रहा था. पंजाब आक्रान्ताओं से बार-बार पद्दलित हो रहा था. इतिहासकारों का अनुमान है कि इस काल में पंजाब में से होकर दिल्ली पर प्रत्येक 5 वर्ष की औसत से एक आक्रमण हुआ था. प्रत्येक आक्रमण के समय पंजाब बुरी तरह से झुलस जाता था. इस समय लोगों में एक कहावत चल पड़ी. “खादा पीता लाहे दा ते रहंदा अहमदशाहे दा.” इन पांच सौ वर्षों में पंजाब एवं इसके आसपास के क्षेत्र में आतंक, विध्वंस और लूटपाट का खूनी नाटक ही चलता रहा.

परंतु पंजाब में फिर एक बार संत शक्ति ने अपने आपको श्री गुरु नानक देव के रूप में प्रकट किया. भाई गुरदास भल्ला के अनुसार “सतगुरू नानक प्रगटया – मिटी धुंध जग चानण होया.” हमारे भारत की परंपरा रही है कि पहले संत महात्माओं अर्थात राजनीति से अक्षिप्त सामाजिक शक्ति द्वारा सामाजिक संगठन का कार्य और फिर इस संगठित शक्ति द्वारा क्षात्रधर्म का जागरण.

आधुनिक इतिहासकार भाई धर्मवीर अपनी पुस्तक ‘पंजाब का इतिहास’ में लिखते हैं – “पंजाब में हिन्दू चिरकालिक मुस्लिम शासन के कारण ऐसे दब गए थे कि प्रतिरोध शक्ति उनसे निकल गई थी. विदेशी अत्याचार एवं जबर के कारण पंजाब में मेहनत मजदूरी करने वाले गरीब लोग मुसलमान बन चुके थे. हिन्दुओं के मंदिर तोड़ दिए गए थे. पाठशालाओं और विद्यापीठों के स्थान में मस्जिद और मकबरे बना दिए गए थे. हिन्दू जनसाधारण में धर्म का प्रायः लोप हो चुका था. धर्म का स्थान मिश्याचार ने ले लिया था.”

इन दिनों पंजाब में अज्ञानता और अंधकार का बोलबाला था. इस माहौल का परिणाम यह हुआ कि हिन्दू समाज में जाति-बिरादरी ने और भी ज्यादा खतरनाक रूप ले लिया. इस वातावरण में श्री गुरु नानक देव जी ने हिन्दुओं को आडंबर एवं मिथ्याचार से निकालकर परमेश्वर की भक्ति और शक्ति की आराधना की ओर ले जाने का अभियान छेड़ दिया. श्री गुरु नानक देव जी ने इस बात की आवश्यकता अनुभव की कि राजनीतिक अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई जाए.

अतः इसी उद्देश्य के लिए श्री गुरु नानकदेव जी ने भक्ति आंदोलन को प्रारंभ किया. इस महापुरुष तथा इनके द्वारा प्रस्थापित मार्ग के अनुयायियों के बलिदानों के परिणाम स्वरुप हमारे समाज के क्षात्रधर्म ने अपने को श्रीगुरु गोविंद सिंह जी के रूप में प्रकट किया. खालसा पंथ की सिरजना क्षात्रधर्म का एक सशक्त विधिवत स्वरूप थी. इस प्रकार एक बार पुनः धर्म को केंद्र मानकर राष्ट्रीय एकीकरण का महान कार्य संपन्न हुआ.

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक हमारे राष्ट्र का इतिहास इस सत्य को स्पष्ट करता है कि भक्ति आंदोलन के माध्यम से क्षात्र शक्ति का उद्य, यह भारत एवं भारतीयता को जिंदा रखने की परंपरा सदैव रही है.

……….क्रमश:

(वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक)

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