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भारतीय पुरातत्व के पुरोधा डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर

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राजेन्द्र कुमार चड्ढा

नीमच में 4 मई सन् 1919 को जन्मे डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर उन विद्वानों, आचार्यों की श्रेणी के थे, जिन्होंने कभी भौतिक साधनों को अर्जित नहीं किया और समाज में महान होने का मुकुट धरण नहीं किया. 4000 से अधिक शैल चित्रों की खोज करने वाले भारती कला भवन, ललित कला भवन, पुरातत्व उत्खनन शैली, चित्र शोध संस्थान के संपादक वाकणकर जीवन भर एक सन्यासी के समान रहे.

वाकणकर जी कहते थे – जब मैं छोटा था तो प्राध्यापक प्रभाकर राव गोरे इतिहास पढ़ाते थे. विद्यालय में इतिहास के उन पृष्ठों को जिनको ब्रिटिश शासकों द्वारा रचा गया था, उसे वे झूठ मानते थे. श्री गोरे पढ़ाने के बाद कहा करते थे कि यह पाठ परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिये है, न कि याद रखने के लिए. इतिहास की वास्तविकता का पूर्ण पाठ पढ़ो. डॉ. वाकणकर जी ने अपने शिक्षक के आदेशों का पालन जीवन भर किया. उन्होंने अर्थाभाव में रहकर भी पूरा जीवन सुखोपभोग के लिए नहीं, अपितु देश की सभ्यता व संस्कृति के विलुप्त ज्ञान को सबके समक्ष लाने का कार्य बिना किसी सरकारी सहायता के से किया. उन्होंने विदेशी इतिहासकारों, अन्वेषकों के पूर्वाग्रहों तथा भ्रांत-धारणाओं तथा षडयन्त्रों के जाल से भारतीय इतिहास को निकाल अपनी मेधा के बल पर विश्व में प्रतिष्ठा दिलवाई.

सन् 1957 में व्हीलर जब उज्जैन में ए.एस.आई. के प्रो. बनर्जी द्वारा किये उत्खनन कार्य को देखने को आये तो उस कार्य को दिखाने का दायित्व प्रो. वाकणकर जी को दिया गया. व्हीलर के साथ उनकी वार्ता के अंशों को देखने से यह लगता है कि व्हीलर को वाकणकर जी ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान से तो परिचित कराया ही, साथ में यह भी प्रमाणित करने और बताने का प्रयास किया कि विद्वान मैकस मूलर ने जो वेदों के रचना काल को आँका है, वह ठीक नहीं है. इतिहास के छात्रों के लिये यह शोध का विषय हो सकता है कि वेद के उद्भव का काल क्या  है? वेदों में वर्णित ज्योतिषीय प्रमाणों को खंगालने से यह सिद्ध कर दिया कि वेदों का काल खण्ड 6 हजार ईसवी पूर्व का है. प्रो. जैकोली व तिलक जी ने भी वेद के रचना काल को 6 हजार पूर्व का माना है.

प्रो. वाकणकर जी ने वेदों में वर्णित सम्प्रति लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी की खोज करने के लिए 4000 कि.मी. की लम्बी यात्रा भी की. सरस्वती नदी शोध का नेतृत्व भी किया.

दिसम्बर 1985 में उन्होंने आधुनिक हथियार से इतिहास को खोज निकाला था. इस यात्रा में वाकणकर जी के नेतृत्व में लगभग-एक दर्जन से अधिक विद्वानों ने भाग लिया, ऐसे प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. स्वराज्य प्रकाश, प्रो. सतीश मित्तल (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय), प्रो. के. पी. धुरन्धर भूगोलवेत्ता (जे. एन. यू. दिल्ली), प्रो. वेदज्ञ आर्य संस्कृत विद्वान गुजरात, मोरोपंत पिंगले प्रमुख थे.

इस दल ने आदिबद्री (हरियाणा राज्य) शिवालिक पहाड़ियों के बीच स्थान से सोमनाथ तक पूरे एक माह में 4000 कि.मी. लम्बी यात्रा की थी (हरियाणा, राजस्थान, गुजरात). इस दल ने डॉ. वाकणकर जी के नेतृत्व में सरस्वती नदी के बहने के प्रमाण तो एकत्र किये ही, साथ ही यह भी बताया कि नदी का तट कैसा था. नदी के तट पर किन-किन ऋषियों का निवास हुआ करता था. साथ ही लोक जागरण की इस यात्रा के माध्यम से बताया कि यदि यह नदी पुनः प्रवाहित होने लगी तो किस प्रकार पश्चिम भारत की जल की समस्या का हल हो जाएगा.

आज ‘भीम बेटका’ जो प्रसिद्ध शैल चित्रों के लिये जाना जाता है, उसकी खोज भी वाकणकर जी ने की थी. इस खोज पर वाकणकर जी को भारत सरकार की ओर से पद्मश्री भी प्रदान किया गया था. प्रो. वाकणकर जी की एक विशेषता थी कि वे अपने किसी छात्र पर अपनी विचार-धारा थोपते नहीं थे, अपितु उसके मौलिक चिन्तन को ही प्रोत्साहित करते थे.

सिंगापुर के अंतिम व्याख्यानमाला में उन्होने कहा कि हमारे पूर्वजों ने हिमालय को पार कर नये प्रदेश की खोज, शोषण या दोहन के लिये नहीं की, अपितु आर्य बनाने के लिये की थी. हमारी एक ही कामना है कि विश्व भर के लोग एक साथ रहें, एक साथ ही परमध्येय मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयास करें.

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