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द्रौपद्री मुर्मू – एक तीर कई निशाने

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मतांतरण के विस्तार पर लगेगा अंकुश

प्रमोद भार्गव

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के बहाने एक बड़ा दांव खोला है. रामनाथ कोविंद जी को राष्ट्रपति बनाने के बाद जनजाति समाज से नेता द्रौपदी मुर्मू को प्रत्याशी घोषित किया है. देश में करीब 13 करोड़ जनजाति समाज है. स्वाधीनता के 75वें वर्ष में पहली बार इस वर्ग के व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाने की सार्थक पहल हुई है.

महिला राष्ट्रपति के रूप में कांग्रेस प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना चुकी है. सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब दलित, मुस्लिम और महिला को राष्ट्रपति बना देने से इन समाजों को समग्र भला नहीं हुआ, तो फिर मुर्मू के राष्ट्रपति बन जाने से जनजाति समाज का कौन-सा भला हो जाएगा. बौद्धिक समुदाय के यह प्रश्न नितांत बौने एवं अप्रासंगिक हैं.

दरअसल, किसी भी समुदाय का व्यक्ति राष्ट्र के गौरव का प्रतीक बनता है तो उस समुदाय की अस्मिता का आत्मबल बढ़ता है. यही नहीं द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से जनजाति समाज के सुनियोजित मतांतरण पर अंकुश लगेगा. हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए इनकी अलग गिनती कराने का जो षड्यंत्र रचा जा रहा है, उसके विरुद्ध समुदाय की आवाज बुलंद होगी और हिन्दुत्व खंडित होने से बचेगा. देश की संप्रभुता से समाज को जोड़े रखने की यह एक बड़ी राजनीतिक पहल है.

परतंत्र भारतीय व्यवस्था में अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भारतीय जनजातियों के प्रति दोहरी और दोगली दृष्टि अपनाई थी. उनकी जीवन और संस्कृति को बदलने के उपाय उनकी जीवन-शैली के अध्ययन के बहाने से शुरू किए गए थे. यह अध्ययन उन्हें मानव मानकर चलने से कहीं ज्यादा, उन्हें वस्तु और वस्तु से भी इतर पुरातत्वीय वस्तु मानकर किए गए. नतीजतन आदिवासी अध्ययन और संरक्षण की सरकारी स्तर पर नई शाखाएं खुल गईं. इन क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों को काम के लिए उत्साहित किया गया. मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में काम तो किए, लेकिन सुनियोजित ढंग से धर्म परिवर्तन के अभियान भी चलाए. इन अभियानों में कोई बाधा न बने, इसलिए कई जनजाति बहुल क्षेत्रों को ‘वर्जित क्षेत्र‘ घोषित करने की कोशिशें हुईं. बहाना बनाया गया कि इनकी पारंपरिक संस्कृति और ज्ञान परंपरा को सुरक्षित बनाए रखने का उपक्रम है.

मिशनरियों को स्थापित करने के परिप्रेक्ष्य में तर्क दिया कि इन्हें सभ्य और शिक्षित बनाना है. किंतु ये दलीलें तब झूठी सिद्ध हो गईं, जब संस्कृति और धर्म बदलने के ये कथित उपाय अंग्रेजी सत्ता को चुनौती बनने लगे. स्वतंत्रता आंदोलन की पहली चिंगारियां इसी दमन के विरुद्ध जनजाति क्षेत्रों में फूटीं. भील और संथाल के विद्रोह इसी दमन की उपज थे. जिस 1857 को देश का सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसमें जनजाति समाज के अनेक वीरों ने आहुति दी. बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, ठक्कर बापा और गुंडाधुर जैसे आदिवासी क्रांति के नायकों की एक पूरी श्रृंखला है.

द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के मयूरभंज जिले के ऐसे ही क्रांतिकारी संथाल जनजाति समुदाय से आती हैं. ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और झारखंड में मिशनरियों ने सबसे ज्यादा धर्मांतरण किया है.

लोकसभा के पिछले सत्र में भाजपा के दो सांसद झारखंड के निशिकांत दुबे और मध्यप्रदेश के ढालसिंह बिसेन ने धर्मांतरण के मुद्दे को उठाते हुए मांग की थी कि ‘दूसरा धर्म अपनाने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. क्योंकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन का चलन लगातार बढ़ रहा है.

समाज की मांग है कि यदि इस जाति का कोई व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम धर्म स्वीकारता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. किंतु यह विधेयक अब तक पारित नहीं हो पाया है. अनुच्छेद 341 के अनुसार अनुसूचित जातियों के वही लोग आरक्षण के दायरे में हैं, जो भारतीय धर्म हिन्दू, बौद्ध और सिक्ख अपनाने वाले हैं. अनुच्छेद-342 में 341 जैसे प्रावधान हो जाते हैं, तो अनुसूचित जनजातियों में धर्मांतरण की समस्या पर स्वाभाविक रूप से अंकुश लग जाएगा. द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसे झोलों को खत्म करने की संभावना बढ़ जाएगी.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक आभासी परिचर्चा में कहा था कि भारत के आदिवासी हिन्दू नहीं हैं. वे पहले न कभी हिन्दू थे और न कभी हिन्दू होंगे. झारखंड में 32 जनजातियां हैं, जो अपनी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों को अस्तित्व में बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं. उन्होंने यह बात अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक वेबीनार में कही थी. इस बयान को लेकर विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव मिलिंद परांडे ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सोरेन के बयान को ईसाई मिशनरियों की कुटिल चाल बताया था. दरअसल, सोरेन जबसे झारखंड के मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से 2021 के जनगणना पत्रक में नए कॉलम और कोड को लेकर विवादित बयान दे रहे हैं. भारत में ऐसे अनेक वामपंथी हैं, जो भारतीय जाति व्यवस्था को लेकर दुराग्रहों से भरे हैं. जबकि स्वयं उसी जातिवाद के अनुयायी हैं.

प्रकृति के उपासक देश के सभी 645 जनजाति समुदाय हिन्दू हैं, क्योंकि वे भगवान शिव की पूजा के साथ उन सभी देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, जिनकी बृहद हिन्दू समाज पूजा करता है. यही नहीं, इन्हीं देवों से वे अपनी उत्पत्ति बताते हैं. देशभर की जनजाति लोक-कथाएं इन तथ्यों की पुष्टि करती हैं. वाल्मीकि रामायण और महाभारत में जनजातियों को वनवासी कहा गया है. इन वनवासी पात्रों की मान्यता समूची सनातन संस्कृति में राम और कृष्ण के समतुल्य है.

आदिवासी ! कहने को तो चार अक्षरों की छोटी सी संज्ञा है, लेकिन यह शब्द देश भर में फैली अनेक आदिवासी या वनवासी नस्लों, उनके सामाजिक संस्कारों, संस्कृति और सरोकारों से जुड़ा है. इनके जितने सामुदायिक समूह हैं, उतनी ही विविधतापूर्ण जीवन शैली और संस्कृति है. चूंकि अभी भी इस संस्कृति के जीवनदायी मूल्यों और उल्लासमयी अठखेलियों से अपरिचित हैं, इसलिए इनका जीवन हमारे लिए विस्मयकारी बना हुआ है. इस संयोग के चलते ही उनके प्रति यह धारणा भी बना ली गई कि एक तो वे केवल प्रकृति प्रेमी हैं, दूसरे वे आधुनिक सभ्यता और संस्कृति से दूर हैं. इस कारण उनके उस पक्ष को तो ज्यादा उभारा गया, जो ‘घोटुल‘, ‘भगोरिया‘ और ‘रोरूंग‘ जैसे उन्मुक्त रीति-रिवाजों और दैहिक खुलेपन से जुड़े थे. लेकिन उन मूल्यों को नहीं उभारा गया, जो प्रकृति से जुड़ी ज्ञान-परंपरा, वन्य जीवों से सह- अस्तित्व, प्रेम और पुनर्विवाह जैसे आधुनिकतम सामाजिक मूल्यों व सरोकारों से जुड़े हुए हैं. इन संदर्भों में उनका जीवन व संस्कृति से जुड़ा संसार आदर्श रहा है. इन उन्मुक्त संबंधों, बहुरंगी पोषाकों, लकड़ी और वन्य जीवों के दांतों व हड्डियों से बने आभूषणों के साथ उमंग एवं उल्लास भरे लोक-गीत, संगीत तथा नृत्य से सराबोर रूमानी संसार व रीति-रीवाजों को कौतहुल तो माना, किंतु कथित सभ्यता के मापदण्ड पर खरा नहीं माना. उनके सदियों से चले आ रहे पारंपरिक जीवन को आधुनिक सभ्यता की दृष्टि से पिछड़ा माना. उन्हें असभ्य माना. परिणामतः समाजशास्त्रियों तथा मानवतावादियों को उन पर तरस आया और उन्हें ‘सभ्य‘ व आधुनिक बनाने के अभियानों की होड़ लग गई.

उन्हें सनातन हिन्दू धर्म से अलग करने की कोशिशें इसी अभियान का हिस्सा हैं. इस मुहिम में मिशनरियां भारत की परतंत्रता के समय से ही लगी हुई हैं. द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति बनती हैं तो जो लोग इस समुदाय को, हिन्दू और हिन्दुत्व को तोड़ने में लगे हैं, उन्हें झटका लगेगा और जो लोग भ्रमित हो गए हैं, वे अपनी सांस्कृतिक परंपाराओं से जुड़ने में सम्मान और गौरव का अनुभव करेंगे.

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