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इतिहास, पुरालेख और पुरातत्व के विशेषज्ञ डॉ. आर. नागास्वामी

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इतिहास, पुरालेख और पुरातत्व के विशेषज्ञ डॉ. आर. नागास्वामी ने रविवार को बसंत नगर स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली. उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं.

डॉ. आर. नागास्वामी को कला, पुरातत्त्व, इतिहास और संस्कृति में उनके योगदान के लिए वर्ष 2018 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया था. बांग्लादेश के संस्कृति मंत्री के.एम. खालिद द्वारा ढाका में आयोजित ‘रजत जयंती अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ में सम्मानित किया गया था. ‘जर्नल ऑफ़ बंगाल आर्ट’ का ‘सिल्वर जुबली वॉल्यूम’ आर. नागास्वामी को समर्पित था.

‘अपनी नौकरी से रिटायर हो जाओ, लेकिन अपने दिमाग को कभी भी रिटायर मत करो’…यह कहावत प्रसिद्ध पुरातत्वविद् और पद्म भूषण पुरस्कार विजेता रामचंद्रन नागास्वामी के जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती है. 91 वर्ष की आयु में उनकी नवीनतम पुस्तक ‘सेंथमिज़ नादुम पांडबम’ वर्ष के प्रारंभ में प्रकाशित हुई थी.

आर. नागास्वामी ने ‘तमिलनाडु पुरातत्व विभाग’ के संस्थापक-निदेशक के रूप में कार्य किया. वह मंदिर के शिलालेखों और तमिलनाडु के कला इतिहास पर अपने काम के लिए प्रसिद्ध हैं. तमिलनाडु सरकार के पुरातत्व विभाग के गठन के बाद नागास्वामी 1966 में इसके पहले निदेशक बने. वह 1988 में सेवानिवृत्त हुए. उन्होंने पुरातत्व विभाग के निदेशक बनने से पहले पांच साल तक चैन्नई के सरकारी संग्रहालय में कला और पुरातत्व के लिए क्यूरेटर के रूप में कार्य किया था. 10 अगस्त, 1930 को जन्मे नागास्वामी ने मद्रास विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और पुणे से भारतीय कला में डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी की. विविध रुचियों वाले व्यक्ति, उनके कार्यों ने कला, पुरातत्व, पुरालेख, मंदिर के अनुष्ठानों और दर्शनशास्त्र को छुआ.

उन्हें राज्य सरकार द्वारा कलाईमनी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. मदुरै में थिरुमलाई नायक महल में प्रसिद्ध ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम नागास्वामी का विचार था. नागास्वामी प्रसिद्ध पाथुर नटराज मामले में लंदन की एक अदालत में एक विशेषज्ञ गवाह थे और उन्होंने चोल-युग के कांस्य नटराज को तमिलनाडु वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अदालत ने उन्हें अपने विषय में एक अद्वितीय विशेषज्ञ के रूप में वर्णित किया था.

सीखने और ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उनका उत्साह अद्वितीय रहा. उन्हें व्याख्यान देने और शोध के लिए बड़े पैमाने पर यात्रा करने से उम्र भी कभी नहीं रोक सकी. महामारी के दौरान भी, उन्होंने ऑनलाइन व्याख्यान में भाग लेने और किताबें प्रकाशित करने में खुद को व्यस्त रखा.

आर. नागास्वामी ने 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं – जिनमें से कुछ हैं, ‘दक्षिण भारतीय कांस्य के मास्टर पीस’, ‘तमिलनाडु में तांत्रिक पंथ’, ‘दक्षिण भारतीय कला और वास्तुकला के पहलू’.

आने वाली पीढ़ियां तमिलनाडु की जीवंत संस्कृति को लोकप्रिय बनाने में थिरु आर. नागास्वामी के योगदान को कभी नहीं भूलेंगी. इतिहास, पुरालेख और पुरातत्व के प्रति उनका जुनून उल्लेखनीय था.

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