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स्वाधीनता का अमृत महोत्सव : भ्रान्तियों के निवारण का महापर्व – 2

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अवनीश भटनागर

एक और अटपटा किन्तु विचारणीय प्रश्न

जब हम यह चर्चा कर रहे हों कि भारत पराधीन कब हुआ, तो यह विचार करना भी समीचीन होगा कि भारत पराधीन कैसे हुआ? खानवा, हल्दीघाटी, पानीपत, दक्कन से लेकर प्लासी और बक्सर के युद्धों में वे आक्रान्ता जीत गए और भारतीय शौर्य पराजित हुआ, इसलिए हम पराधीन हो गए थे क्या? कुटनीतिक संधियां इसका कारण थीं क्या? इतिहास पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि देश तब-तब और वहाँ वहाँ पराधीन हुआ, जब-जब और जहाँ-जहाँ इस भारत माता का ही कोई कुपुत्र अपने व्यक्तिगत स्वार्थ लाभ-लोभ के वश अपने ही किसी भाई के विरुद्ध खड़ा हुआ और किसी विदेशी आक्रान्ता का सहयोगी बना – चाहे वह राजा मानसिंह हो, मिर्जा राजा जयसिंह हो, जयचंद हो या अन्य कोई, जिसने देश की एकता और अखण्डता से अधिक अपने व्यक्तिगत स्वार्थ या अहंकार को महत्व दिया.

इतिहास का अध्ययन केवल कुछ शासकों के नाम तथा घटनाओं के वर्ष रट लेने से नहीं होता. इतिहास के अध्ययन का उद्देश्य होता है कि किसी भी कारण हमारे पूर्वजों से पूर्वकाल में जो गलतियां हो गई हैं, उनको ध्यान में रखकर हम अपने जीवन में उन्हें न दोहराएं. स्वतंत्रता के अमृतोत्सव का उत्सव मनाते हुए हमें दोनों तथ्यों का स्मरण करना अपेक्षित है – (1) वे ‘अनिर्दिष्टावीरा :’ (Unsung Heroes) जिन्होंने मातृभूमि की रक्षार्थ जीवन न्यौछावर कर दिया, उनके नाम भी जानने वाले आज नहीं हैं, जबकि देश के प्रत्येक ग्राम नगर में उनके स्मृति चिह्न बिखरे हैं, उन्हें स्मरण करना; और (2) पिछली पीढ़ियों से, इस देश को प्रथम न रखते हुए, निर्णय करने में जो भूल-चूक हुई, उन्हें हम और अगली पीढ़ी न दोहराए.

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को तो इतिहासकारों ने स्वतंत्रता संग्राम ही नहीं माना. ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे Sepoy Mutiny अर्थात् सैनिक विद्रोह नाम दिया. जनसामान्य में भी इसे ‘गदर’ यानि विद्रोह ही स्थापित करा दिया गया, यह बता कर, कि ब्रिटिश सेना के कुछ सिरफिरे सिपाहियों को ‘गाय-सुअर की चर्बी लगे कारतूस’ का दुष्प्रचार कर भ्रमित कर दिया गया था; कि इस देश के कुछ राजा अपनी-अपनी रियासतें बचाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने को प्रवृत्त हो गए थे; कि देश की आम जनता का इससे कुछ लेना देना नहीं था; कि भारत के दक्षिण या पूर्वोत्तर क्षेत्रों में तो इस प्रकार की कोई विद्रोह की स्थिति नहीं थी; कि इन कुछ विद्रोही-नासमझ तत्वों को छोड़कर पूरे देश में अमन-चैन था, अंग्रेज शासन के प्रति भक्ति का ज्वार उमड़ रहा था.

दुर्योग से, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इतिहासकारों की दृष्टि इसी प्रकार की रही. यह विद्रोह था, जिसे ब्रिटिश सत्ता ने कठोरतापूर्वक दबा दिया, विद्रोहियों को दंडित कर विप्लव को समाप्त कर दिया गया और फिर 1857 से 1947 के 90 वर्ष बड़ी ही शान्ति से, अंग्रेज शासन के प्रति श्रद्धापूर्वक इस देश ने बिताए – यही प्रचारित किया जाता रहा. यहाँ तक कि लंदन के इंडिया हाउस में संरक्षित अभिलेखों के आधार पर जिन विनायक दामोदर सावरकर ने 1857 की इस सशस्त्र क्रान्ति को ‘भारत की स्वाधीनता का संग्राम’ प्रमाणित किया, उनको ही भ्रमित और भ्रम निर्माता निरूपित करने में इस देश के पश्चात्वर्ती इतिहासकारों और सत्ताधीशों ने कोई संकोच नहीं किया.

1857 की क्रान्ति का सत्य अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है. वह सत्य देश की अगली पीढ़ी के सामने आए, यह भी इस 75वें वर्ष की प्राथमिकता सूची में रहना चाहिए.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय समाज की तीन पीढ़ियाँ प्रायः बीत गई हैं. पीढ़ी-दर-पीढ़ी भ्रान्तियों को पढ़ते-सुनते, वे अब भ्रान्तियाँ ही प्रतीत नहीं होतीं. बल्कि, जब कोई उन स्थापित भ्रान्तियों से हट कर कोई तथ्य प्रस्तुत करने की चेष्टा करता है तो सामान्य समाज या तो आश्चर्य व्यक्त करता है या उसे अविश्वसनीय मान लेता है. सामान्य समाज जब ‘कोउ नृप होय हमें का हानि’ वाली भावना से चलता है. प्रतिक्रिया आती है समाज में विचारवन्त माने जाने वाले बुद्धिजीवी वर्ग से, जो अपनी मान्यताओं से राई-स्ती भी दाएं-बाएं होने को तैयार नहीं होते. यदि उनकी स्वीकृत मान्यताओं से इतर कोई भी विचार आता है तो उस पर दक्षिणपंथी, प्रतिक्रियावादी, पुरातनपंथी और दिग्भ्रमित आदि का ठप्पा तुरन्त लगा दिया जाता है. इसका ही परिणाम है स्वाधीनता के यज्ञ में जिन्होंने प्राणों की आहुति दी, उन क्रान्तिकारियों, मृत्युदण्ड पाने वालों, कालापानी की सजा काटने वालों, आजीवन कारावास या निर्वासन झेलने वालों का आज कोई स्मरण नहीं करता. व्यक्ति पूजा और जिसको ‘नेता’ मान लिया उसके महिमा मण्डन की इसी आदत के कारण स्वतंत्र भारत में प्रत्येक नगर में सड़क-चौराहों से लेकर चिकित्सालय, स्टेडियम, हवाई अड्डों तक के नाम कुछ व्यक्तियों या परिवारों में ही आवंटित कर दिए गए. उस समय की परिस्थितियों में उन्होंने क्या किया, इसकी जानकारी होना तो ठीक है किन्तु जो गुमनामी के अँधेरों में सिमट कर रह गए, उन्हें जानना और कृतज्ञता का भाव रखना भी नई पीढ़ी से अपेक्षित ही है. किन्तु, नई पीढ़ी को अनाम हुतात्माओं के बारे में बताने का कार्य तो वर्तमान पीढ़ी को ही करना होगा.

एक और बात, जिसके बिना स्वतंत्रता प्राप्ति की चर्चा पूरी नहीं होती, वह है इस स्वाधीनता के साथ जुड़ी हुई विभाजन की त्रासदी. अपनी जड़ों से कट कर, हजारों लोगों को अपनी जन्मभूमि से बिछुड़ कर, विस्थापित हो कर, अपने ही देश में शरणार्थी बनकर दशकों तक जीवन बिताना पड़ा. उस विस्थापन के दौर में कितनों की हत्या हुई, कितनों ने तड़प कर जान दे दी, कितनी महिलाओं के साथ दुराचार हुआ और कितनों ने अपने शील की रक्षा के लिए आत्मघात कर लिया, उसकी कोई गिनती है क्या? जो विस्थापित होकर वर्तमान पाकिस्तान या बंगलादेश से भारत में आ बसे, उनकी भी वह पीढ़ी अब समाप्ति की ओर है. किन्तु विभाजन की वह पीड़ा उनकी आँखों में आज भी जीवंत है. भारत माता की दोनों बाँहें कट कर अलग हो गई और उसके हजारों पुत्र-पुत्रियों ने समन्तिक कष्ट झेला, उसके बारे में भी नई पीढ़ी को जानना और स्मरण रहना आवश्यक है ताकि फिर कभी ऐसा होने की आशंका दिखे तो अगली पीढ़ी समय रहते सतर्क हो जाए. भारत माता का यह विखण्डित स्वरूप देश के प्रत्येक युवा के ह्रदय में कसक उत्पन्न करने वाला होना चाहिए.

क्या हो हमारी भूमिका?

अगली पीढ़ी को यह बताना होगा कि 75 वर्ष पहले मिली यह स्वतंत्रता सहज ही नहीं मिल गई, जो हमें आज तक बताया जाता रहा है – ‘दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल’. हुतात्माओं के त्याग और बलिदान को नई पीढ़ी और याद रखे, इसके लिए अपने परिवार के नौनिहालों को और यदि सौभाग्य से हम शिक्षा के क्षेत्र में हैं तो अपने विद्यार्थियों को इस स्वाधीनता की बलिवेदी पर प्राण अर्पित करने वाले अपने शहीदों की वीरगाथाएं बताएं-सुनाएं-पढ़ने को दें, उनके प्रति सम्मान और गौरव का भाव जगाएं.

जिनके नाम पुस्तकों में लिखे हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारे आसपास, हमारे नगर, कस्बे, ग्राम, जिले में भी कोई न कोई ऐसी विभूति खोजने से अवश्य मिल जाएगी. जिन्होंने स्वतंत्रता के उस संघर्ष में प्राणाहुति दी होगी. उनकी समाधि नहीं होगी, स्मारक नहीं बने होंगे. किन्तु उनके बारे में विभिन्न माध्यमों से जानकारी एकत्र करना और अगली पीढ़ी को बताना, इस अमृत महोत्सव वर्ष की प्राथमिकताओं में होना चाहिए. इतिहास अध्ययन और मीडिया से जुड़े बन्धु-बहनें इस कार्य को सरलता से कर सकते हैं.

जैसा कि इस आलेख का शीर्षक एवं विषयवस्तु है, स्वाधीनता के अमृत महोत्सव को प्रचलित भ्रान्तियों के निवारण का वर्ष मानकर मनाना चाहिए. निष्पक्ष, तथ्यपूर्ण तथा संदर्भयुक्त साहित्य का अनुशीलन कर यह कार्य नई पीढ़ी को वास्तविकता को पहचानने-समझने का अवसर प्रदान करेगा.

स्वतंत्रता अर्थात् अंग्रेज़ों से सत्ता का हस्तान्तरण भारतीयों को हो गया मात्र है या ‘स्व’ का ‘तंत्र’ भी चल रहा है, यह बताना भी आवश्यक है. ‘स्व’ भाषा, ‘स्व’ भूषा, ‘स्व’ तंत्र, ‘स्व’ जीवन पद्धति, ‘स्व’ संस्कृति के प्रति ‘स्व’ अभियान आदि, किस ‘स्व’ की पालना में हम स्वाधीन हैं, यह समझना-समझाना और समीक्षा करने की क्षमता उत्पन्न करना भी अपेक्षित है.

स्वतंत्रता मिली, किन्तु उसकी सुरक्षा कैसे हो? विश्व की महाशक्तियां सदैव अपने आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक उपनिवेश बनाने को आतुरतापूर्वक अवसर की ताक में हैं. 1600 ई० में एक ईस्ट इंण्डिया कम्पनी आई थी. जिसने लगभग 350 वर्षों तक इस देश का शोषण-उत्पीड़न किया. आज हजारों की संख्या में विदेशी कम्पनियाँ हमारी अर्थव्यवस्था के बहुलांश पर कब्जा किए हैं. स्वदेशी के प्रति गौरव का भाव जागरण, देश को पुनः परतंत्रता की ओर जाने से रोकने का बड़ा प्रयास है.

स्वतंत्रता का हरण करने के कुत्सित षड्‌यंत्र पड़ोसी देशों द्वारा चल ही रहे हैं. स्वतंत्रता के बाद से 1948, 1962, 1965, 1971 तथा 2009 में भारत पर प्रत्यक्ष युद्ध थोपे गए. उनमें बलिदान हुए हमारे वीर सैनिक इस देश की सीमाओं की रक्षा ही तो कर रहे थे. उनके विषय में जानना और राष्ट्र के लिए उनके उस सर्वोच्च बलिदान को स्मरण रखना, उनसे प्रेरणा प्राप्त करना, यह भी नई पीढ़ी के लिए आवश्यक है.

प्रत्येक युवक सीमा पर सैनिक बन कर नहीं जा सकता. किन्तु वह जहाँ भी रहे, अपने कार्य के माध्यम से भी देश की सेवा-सुरक्षा कर सकता है, यह भाव युवा होती पीढ़ी के मन में जाग्रत होना चाहिए. सीमा की रक्षा करते मर जाना सरल है, शत्रु की एक गोली से भी प्राण जा सकते हैं; किन्तु देश के लिए मरने से अधिक आवश्यक है, देश के लिए जीना सीखना.

विगत 75 वर्षों में भारत ने सभी क्षेत्रों में प्रगति की है. अपने अतीत तथा पूर्वजों के प्रति अहोभाव रखने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि देश ने विकास के कौन से प्रतिमान गढे हैं, युवा पीढ़ी को मालूम हो. कृषि से उद्योग तक, परमाणु शक्ति से चिकित्सा विज्ञान तक और समुद्र के रहस्यों की खोज से अन्तरिक्ष अनुसंधान तक भारत के कदम तेजी से आगे बढ़े है. जहाँ एक ओर इसकी जानकारी रखने से युवा पीढ़ी में देश की उपलब्धियों के प्रति गौरव भाव जाग्रत होगा, वहीं वे इस विकास यात्रा में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित कर पाएंगे.

वास्तविकताओं का दर्शन एवं भ्रांतियों का निवारण, इस आलेख का विवेच्य है. पुरानी कहावत है, “जब तक सत्य घर से बाहर निकलने के लिए जूते के फीते बाँध रहा होता है, झूठ आधी दुनिया की परिक्रमा कर चुका होता है”. बार-बार एक जैसी बातों को सुनते-पढ़ते जो भ्रान्तियाँ स्थापित हुई हैं, उनको तथ्य और तर्क के आधार पर मूलोच्छेद करना समय की आवश्यकता है.

कहते हैं, “If we shoot bullet’s on our past, our failure will fire on us with canons”. इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने में हम अपनी भावी पीढ़ी को सक्षम बनने में सहयोग दे सकें, स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष में यही हमारी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री एवं संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र के सचिव है.)

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