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गौरव शर्मा ने माउरी और संस्कृत में शपथ लेकर दोनों देशों की पंरपराओं को दिया सम्मान

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न्यूज़ीलैंड में हेमिल्टन वेस्ट से नवनिर्वाचित सांसद डॉ. गौरव शर्मा ने संस्कृत में शपथ लेकर हर भारतीय के साथ-साथ हिमाचल को गौरवान्वित किया है. गौरव शर्मा हिमाचल के हमीरपुर जिले के गलोड़ हड़ेटा के रहने वाले हैं. गौरव शर्मा लेबर पार्टी से सांसद चुने गए हैं. उन्होंने न्यूजीलैंड की परम्परा को सम्मान देते हुए पहले माउरी भाषा में शपथ ली, साथ ही भारतीय संस्कार, संस्कृति और भाषा का सम्मान करना नहीं भूले.

एक ट्वीटर यूजर ने उनसे पूछा कि उन्होंने हिन्दी में शपथ क्यों नहीं ली? इसका उतर देते हुए गौरव ने कहा कि यह सवाल मेरे मन में भी आया कि हिन्दी में शपथ ग्रहण करूं या अपनी पहाड़ी मातृभाषा में. लेकिन अंततः सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत को शपथ लेने की भाषा के रूप में चुना. इस कारण उन्होंने देश की मूल भाषा संस्कृत में शपथ ली. ऐसे करने वाले एकमात्र व्यक्ति सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद थे, जिन्होंने इस वर्ष की शुरूआत में संस्कृत भाषा में शपथ ली थी. डॉ गौरव ने न्यूजीलैंड के हेमिल्टन सीट पर लेबर पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी. शर्मा को 15873 मत मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 11487 मत मिले थे.

हमीरपुर से सम्बन्ध रखते हैं गौरव शर्मा

गौरव शर्मा 12 साल की उम्र में अपने पिता गिरधर शर्मा के साथ न्यूजीलैंड चले गए थे. इनके पिता प्रदेश बिजली बोर्ड में इंजीनियर रहे हैं और उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी. सेवानिवृति के बाद पूरा परिवार न्यूजीलैंड चला गया था. वे 1996 में न्यूजीलैंड चले गए थे. उनका सांसद बनने का सफर संघर्षों से भरा रहा है. उनके पिता को छह साल तक यहां नौकरी नहीं मिली. सामाजिक सुरक्षा के रूप में भी उनके परिवार को सरकारी सहायता नहीं मिली. परिवार ने मुश्किल से वक्त गुजारा. लेकिन विषम परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी और सफलता अर्जित कर प्रेरणा पुंज बनने का काम किया है. गौरव सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहते थे. अपनी आजीविका के लिए टैक्सी चलाकर गुजारा करते थे.

गौरव शर्मा ने हमीरपुर, धर्मशाला, शिमला और न्यूजीलैंड से शिक्षा ग्रहण की है. डॉ. गौरव सर्मा ने ऑकलैंड से एमबीबीएस किया है. इसके बाद वाशिंगटन से उन्होंने एमबीए किया है. वे इस वक्त न्यूजीलैंड के हैमिल्टन में प्रैक्टिस करते हैं. इन्होंने जलवायु परिवर्तन का न्यूजीलैंड पर प्रभाव विषय पर विशेष प्रस्तुति दी, जिसके बाद उनको यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड में पहला पुरस्कार मिला. इसके साथ ही बाद इनको वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गेनाईजेशन जनेवा के साथ काम करने का भी मौका मिला. इस दौरान इन्होंने पब्लिक हैल्थ से जुड़े कई प्रोजैक्ट्स में काम किया. उन्होंने न्यूजीलैंड, स्पेन, अमेरिका, नेपाल, वियतनाम, मंगोलिया, स्विट्जरलैंड और भारत में लोक स्वास्थ्य एवं नीति निर्धारण के क्षेत्र में काम किया है.

 

 

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