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स्वर्ण जयंती वर्ष – भारत के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और प्रेरणा का प्रतीक विवेकानंद शिला स्मारक

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सूर्यप्रकाश सेमवाल

“भारत में किसी तरह के सुधार या उन्नति की चेष्टा करने से पहले धर्म का विस्तार आवश्यक है. सर्वप्रथम हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं, उन्हें मठों की चारदीवारियों को भेदकर, वनों की शून्यता से दूर लाकर सर्वत्र बिखेर देना होगा, ताकि वे सत्य सारे देश को चारों ओर से लपेट ले. उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सब जगह फैल जाए – हिमालय से कन्याकुमारी और सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक सर्वत्र.”

इसी श्रेष्ठ चिंतन और व्यापक भाव को जीवन में उतारते हुए भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानंद ने दक्षिण भारत के पावन स्थल कन्याकुमारी में सागर तट पर स्थित दिव्य श्रीपाद नामक शिला पर 25, 26, 27 दिसम्बर, 1892 को गहन साधना की थी. ध्येय और सन्देश स्पष्ट था, ज्ञान और समृद्धि के पर्याय रहे भारत को पुराना वैभव और गौरव प्राप्त करने के लिए पराशक्ति का आह्वान और आशीर्वाद प्राप्त करना.

स्वामी जी के महाप्रयाण के बाद उनके उस महासंकल्प को साकार करने के लिए 1963 में स्वामी विवेकानन्द जन्मशताब्दी कार्यक्रम आयोजन के साथ कन्याकुमारी (जिस शिला पर बैठकर स्वामी जी ने ध्यान किया था) में स्मारक बनाने का निर्णय हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह एकनाथ रानाडे जी को यह चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा गया. उस समय दक्षिण में ईसाई मिशनरी सक्रिय थे. साथ ही राज्य सरकार और केन्द्र सरकार भी राष्ट्रीय प्रतीक के निर्माण से बहुत खुश नहीं थे. किन्तु राष्ट्रभक्ति, संगठन शक्ति और सेवाव्रती गुणों से एकनाथ जी ने राष्ट्रीय गौरव के स्मारक के लिए सबको एक कर दिया था. स्मारक निर्माण के लिए पर्याप्त धन कुछ लोगों से मिल सकता था, लेकिन स्मारक को भारत के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और प्रेरणा का प्रतीक बनाना था, इसलिए स्मारक निर्माण में सम्पूर्ण देश और जनता की सहभागिता आवश्यक थी. इसी निमित्त एकनाथ जी ने प्रयास व परिश्रम किया और देशभर के विद्यालयों के छात्रों, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, उद्यमियों और उद्योगपतियों, आमजन, सभी ने इस राष्ट्रीय यज्ञ में समिधा डाली.

धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक स्वरूप वाले इस स्मारक की एकता का प्रमाण यह भी है कि यह भारत में निर्मित पहला स्मारक है, जिसमें उस काल के 323 सांसदों ने दलगत विचार और विरोध भाव को एक ओर रखकर राष्ट्र पुरुष स्वामी विवेकानंद जी की स्मृतियों को संजोए रखने के लिए इसके निर्माण में सहयोग का आग्रह किया. 1964 से लेकर 1970 की निर्माण अवधि में लगभग देश के सभी राज्यों की सरकारों ने, चाहे उसमें किसी भी दल का शासन हो, इसमें कम से कम एक लाख रुपये की धनराशि दान दी.

एकनाथ जी के नेतृत्व में देश की समूची जनता के सहयोग से तैयार हुए दिव्य व भव्य विवेकानंद शिला स्मारक का उद्घाटन कार्यक्रम 02 सितम्बर, 1970 से प्रारम्भ होकर दो महीने चलता रहा. भारत के राष्ट्रपति वीवी गिरी, प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी सहित अनेकानेक विभूतियां, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विशिष्ट व्यक्तित्व, समाज और अध्यात्म से जुड़े सभी प्रबुद्धजन उद्घाटन कार्यक्रमों के साक्षी बने. एकनाथ जी की कल्पना के अनुसार स्मारक में अजंता, एलोरा, पल्लव, चोला, बेलूर मठ और अनेक सुन्दर और अद्वितीय शिल्प कलाकृतियों का संगम व्यापक राष्ट्रभाव को अभिव्यक्त करता है. रानाडे जी की कल्पना देश में एक केंद्रीय सुरक्षा थिंक टैंक और हिन्दू सभ्यता का विश्व में प्रसार करने वाला केंद्र निर्माण करने की थी और उसी के अंतर्गत दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की स्थापना हुई, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और हिन्दू सभ्यता के गौरवशाली संदेशवाहक देश के शीर्ष पूर्व सैन्य अधिकारी, राजनयिक, लेखक, कलाधर्मी और दार्शनिक दिन रात अथक कार्य कर रहे हैं.

विवेकानंद शिला स्मारक की स्थापना के 50वें गौरवशाली वर्ष में यह सोचा गया कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ संकल्प के साथ राष्ट्रव्यापी सम्पर्क किया जाए. राष्ट्र-व्यापी महासम्पर्क का यह कार्य 02 सितम्बर, 2019 से प्रारम्भ हुआ.

विवेकानंद शिला स्मारक केंद्र, कन्याकुमारी की उपाध्यक्ष निवेदिता भिड़े व महासचिव भानुदास ने बताया कि सम्पर्क कार्य का शुभारम्भ 02 सितम्बर को विवेकानन्द केन्द्र के अखिल भारतीय अधिकारियों द्वारा राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलकर किया गया. उसके पश्चात उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री से मिले. प्रत्येक राज्य के राज्यपाल एवं मुख्यमन्त्री और राज्य के प्रत्येक क्षेत्र तथा समाज के लोगों तक पहुँचने का लक्ष्य तय किया गया. सितम्बर 2019 से प्रारभ हुए स्वर्ण जयंती वर्ष के अभियान में सघन जनसंपर्क के साथ केंद्र द्वारा संचालित सामाजिक, धार्मिक व अन्य अभियानों को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था. कोरोना संकट के कारण अपेक्षित जनसंपर्क और बड़े कार्यक्रम भले ही छोटे कर दिए गए, लेकिन विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से समूचे देश को स्वामी विवेकानंद की स्मृति को समर्पित राष्ट्रीय धरोहर और संघ के व्रती स्वयंसेवक एकनाथ रानाडे जी की कल्पना और उनके शौर्य के प्रतीक को देखने और उसके विषय में जानने का आग्रह किया गया.

विवेकानन्द केन्द्र देशभर में 1005 स्थानों पर सेवा कार्य चला रहा है. ये केन्द्र योग, शिक्षा, ग्रामीण विकास, युवा विकास, बच्चों का सर्वांगीण विकास, नैसर्गिक संसाधनों का विकास, ग्रामीण एवं जनजाति क्षेत्र में सांस्कृतिक शोधकार्य, प्रकाशन आदि का कार्य कर रहा है. भारत सरकार ने विवेकानंद केंद्र के कार्य को देखकर वर्ष 2015 का ‘गांधी शान्ति पुरस्कार’ प्रदान किया. सम्मान में प्राप्त राशि को स्मारक ने सैन्य कर्मियों के कल्याणार्थ रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को सौंप दिया था.

आइये, भारत के गौरव पुरुष स्वामी विवेकानंद जी की पावन स्मृति और अक्षय विचार दर्शन को समर्पित राष्ट्रीयता के प्रतीक विवेकानंद स्मारक केंद्र की स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने का गौरवमय उत्सव मनाएं.

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