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हर घर तिरंगा अभियान – तिरंगा विरोधी वामपंथी, अभियान को किया नजरअंदाज

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नई दिल्ली. भारत की स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर देश भर में स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. महोत्सव के निमित्त ‘हर घर तिरंगा’ अभियान चल रहा है. इसे जन अभियान बनाने के लिए सरकार के साथ ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लगभग राजनीतिक-गैर राजनीतिक सभी लोग कर रहे हैं.

धार्मिक संस्थानों (बड़े मंदिरों के शिखर पर), सामाजिक संस्थाओं के कार्यालय पर तिरंगा फहराया जा रहा है. प्रधानमंत्री के आह्वान के पश्चात प्रमुख व्यक्तित्वों ने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर डीपी में राष्ट्र ध्वज लगाया है. विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आधिकारिक सोशल मीडिया प्रोफइल के साथ-साथ विभिन्न पदाधिकारियों ने भी तिरंगा अपनी प्रोफाइल में लगाया है. लेकिन, हर बार की तरह इस बार भी वामपंथी ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह’ को दरकिनार करने से बाज नहीं आए.

‘संघ और तिरंगे’ के सन्दर्भ में मिथ्याप्रचार के मूल में भी वामपंथी ही हैं. जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद सात दशक बाद तक अपने पार्टी कार्यालयों पर राष्ट्रध्वज नहीं फहराया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 2021 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाने और पार्टी कार्यालय में तिरंगा फहराने का निर्णय लिया. कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वतंत्रता को अस्वीकार करते हुए नारा दिया था – ‘ये आजादी झूठी है’.

वर्तमान में भी यह दस्तूर बरकरार है. पूरा देश हर घर तिरंगा अभियान चला रहा है, तो वामपंथी विचार से जुड़े दलों एवं उसके नेताओं ने तिरंगे को सोशल मीडिया से पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है. सीपीआई हो या सीपीएम, एसएफआई हो या, डीवाईएफआई, या इन दलों से जुड़े विभिन्न राज्यों के आधिकारिक सोशल मीडिया एकाउंट, सभी से तिरंगा गायब है. बड़े नेताओं जैसे सीताराम येचुरी, डी राजा, मोहम्मद सलीम, एमए बेबी, सुभाषिनी अली, शैलजा टीचर, थॉमस आईसेक जैसे तमाम नेताओं ने भी अभियान को नजरअंदाज किया.

दरसअल, जब देश स्वाधीनता की अपनी निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था, उस समय भी वामपंथियों ने स्वाधीनता संग्राम से स्वयं को अलग कर ब्रिटिश ईसाइयों का साथ दिया था. 1940 के दशक में भारतीय कम्युनिस्ट तत्कालीन सोवियत कम्युनिस्ट के निर्देशों का पालन कर रहे थे. सोवियत कम्युनिस्ट उस दौरान द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का सहयोगी था, इस कारण भारतीय कम्युनिस्टों ने सोवियत में बैठे अपने आकाओं को खुश करने का काम किया.

इतना ही नहीं, जब आजाद हिंद फौज के नेतृत्वकर्ता सुभाषचंद्र बोस भारत की स्वतंत्रता के लिए जापान और जर्मनी के नेताओं से मुलाकात कर रहे थे तो कम्युनिस्टों ने ना सिर्फ उपहास उड़ाया, बल्कि उन्हें ‘तोजो का कुत्ता’ जैसे अपशब्द भी कहे.

वर्ष 1948 में स्वाधीनता के एक वर्ष बाद कम्युनिस्टों ने कहना शुरू कर दिया कि यह आजादी झूठी है.

लेकिन बदलते समय के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद अस्तित्व में आई मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2021 में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर अलीमुद्दीन स्ट्रीट राज्य मुख्यालय पर तिरंगा फहराया, जो 1948 के ‘ये आजादी झूठी है’ दिनों से लेकर 2021 के बीते सात दशकों के दौर में पहली बार हुआ.

 

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