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उच्च न्यायालय ने स्वीकार की भोजशाला में नमाज रोकने को लेकर दायर याचिका

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धार. ऐतिहासिक भोजशाला का विवाद एक बार फिर न्यायालय में पहुंचा है. हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा भोजशाला में नमाज पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने स्वीकार कर लिया है. न्यायालय ने इस संबंध में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई), केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भोजशाला कमेटी को नोटिस जारी किया है.

हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस की अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री ने इंदौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि भोजशाला में मंगलवार को हनुमान चालीसा और शुक्रवार को नमाज होती है. परिसर में दूसरे समुदाय की एंट्री और नमाज को बंद कराया जाए. याचिका में मांग की गई है कि भोजशाला में मां सरस्वती का मंदिर था, जिसकी मूर्ति ब्रिटिश सरकार साथ ले गई थी. सरकार उसे सम्मान सहित वापस लाकर स्थापित करे. परिसर में जो खंडित मूर्तियां हैं, उनका रख-रखाव किया जाए. परिसर की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी हो, जिससे वे नष्ट ना हो सकें. परिसर में दूसरे समुदाय की एंट्री पर रोक लगाई जाए. शुक्रवार को होने वाली नमाज भी बंद हो.

याचिका पर बुधवार को पहली सुनवाई हुई. न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के तर्क सुनने के बाद केंद्र शासन, राज्य सरकार, पुरातत्व विभाग, मौलाना कमालूद्दीन ट्रस्ट सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अगली सुनवाई जून के अंतिम सप्ताह में होगी.

उल्लेखनीय है कि भोजशाला विवाद काफी पुराना है. यह मां सरस्वती का मंदिर है. सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहां मौलाना कमालूद्दीन की मजार बनाई थी. भोजशाला में आज भी देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक लिखे हुए हैं. अंग्रेज भोजशाला में लगी वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन ले गए थे.

याचिकाकर्ता हिन्दू फ्रंट जस्टिस के मध्यप्रदेश संयोजक आशीष जनक और राष्ट्रीय संयोजन डॉ. रंजना अग्निहोत्री ने बताया कि फिलहाल प्रशासन ने व्यवस्था दे रखी है कि हर मंगलवार हिन्दू भोजशाला में पूजा करेंगे और शुक्रवार को मुसलमान नमाज पढ़ेंगे. हमने याचिका में मांग की है कि मुसलमानों को भोजशाला में नमाज पढ़ने से तुरंत रोका जाए. भोजशाला हिन्दुओं के लिए उपासना स्थली है. हमने याचिका में भोजशाला परिसर की खोदाई और वीडियोग्राफी कराने की मांग भी की है. याचिका के साथ 33 फोटोग्राफ भी संलग्न किए हैं.

भोजशाला का इतिहास

परमार वंश के राजा भोज ने 1034 में धार में सरस्वती सदन की स्थापना की थी. दरअसल यह एक महाविद्यालय था जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ. राजा भोज के शासनकाल में ही यहां मां सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा स्थापित की गई थी. यह प्रतिमा भोजशाला के समीप ही खोदाई में मिली थी. 1880 में इस प्रतिमा को लंदन भेज दिया गया.

– 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालूद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया.

– भोजशाला को लेकर 1995 में विवाद हुआ था. इसके बाद मंगलवार को हिन्दुओं को पूजा और शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई.

– 12 मई, 1997 को प्रशासन ने भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. हिन्दुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार एक से तीन बजे तक नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई. प्रतिबंध 31 जुलाई, 1997 तक रहा.

– 6 फरवरी, 1998 को पुरातत्व विभाग ने भोजशाला में आगामी आदेश तक प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया.

– 2003 में मंगलवार को फिर से पूजा करने की अनुमति दी गई. पर्यटकों के लिए भी भोजशाला को खोल दिया गया.

– जब-जब बसंत पंचमी शुक्रवार को आती है, विवाद बढ़ जाता है.

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