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हिमाचल प्रदेश – कुल्लू जिले का शरण गांव देश के चुनिंदा 10 हैंडलूम गांवों में शामिल

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शिमला (विसंकें). हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला का शरण गांव अब देश के दस हैंडलूम गावों में शामिल हो गया है. नेशनल हैंडलूम डे के अवसर पर इसका शुभारंभ भारत सरकार में वस्त्र मंत्री स्मृति ईरानी ने दिल्ली से वर्चुअल कार्यक्रम के माध्यम से किया. कार्यक्रम में शिमला से प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी  वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े. धरोहर गांव नग्गर के साथ लगते शरण गांव की देश में एक अलग पहचान बनेगी.

भारत सरकार तथा हिमाचल सरकार की संयुक्त पहल पर क्राफ्ट हैंडलूम विलेज के रूप में शरण गांव को विकसित किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने देशभर के दस गांवों को क्राफ्ट हैंडलूम विलेज के रूप में चुना है, जिनमें  हिमाचल का यह शरण गांव भी शामिल है. शरण गांव को हैंडलूम विलेज बनाने का उद्देश्य गांव को हैंडलूम पर्यटन के रूप में विकसित करना है.

गांव को हैंडलूम विलेज का दर्जा मिलने के साथ ही यह पर्यटकों को आकर्षित करने में सहायक सिद्ध होगा. हिमाचल प्रदेश के शरण गांव के अलावा जम्मू कश्मीर, केरल, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के गांवों को शामिल किया गया है, जिन्हें हैंडलूम विलेज के रूप में विकसित किया जाएगा. हैंडलूम को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने योजना बनाई है.

कुल्लू के शरण गांव के हैंडलूम को मिलेगी पहचान

कुल्लू के इस गांव में प्राचीन धरोहर के रूप में कई वस्तुएं अभी भी अपनी प्राचीनता और ऐतिहासिकता के साथ वैसी ही विद्यमान हैं, जैसे प्राचीन काल में रही होंगी. धरोहर गांव नग्गर के साथ लगता शरण गांव पुरानी शैली के मकानों और परंपरागत वेषभूषा से परिपूर्ण है. यहां के लोग भेड़ पालन से जुड़े हैं. ऊन का उत्पादन होने के कारण यहां ऊनी धागा ज्यादा होता है, लोग खड्डियों पर पट्टू, चादर, दोहडू, शॉल व पट्टी के पारंपरिक उत्पादनों की बुनाई भी करते हैं, जिनकी काफी अधिक मांग रहती है. गांव के उत्पादकों को शॉल का जीआई मार्क भी मिला हुआ है, जिस कारण इसकी विश्व में पहचान बनी हुई है.

पारम्परिक कला और आधुनिकता के सम्मिश्रण से निखरेगी कला

गांव में प्राचीन कला का इतिहास तो बहुत पुराना है, लेकिन अब इसमें आधुनिकता का सम्मिश्रण कर कला का विकास किया जाएगा. यहां पर एक  सुविधा केंद्र की स्थापना की जा रही है. तीन मंजिला भवन में बुनाई विभाग, म्यूजियम, पुस्तकालय, ओपन कैफेटेरिया आदि बनाया जाएगा. केंद्र में पर्यटक स्वयं बुनाई करने का अनुभव एवं जानकारी भी ले सकेंगे. केंद्र सरकार से 1 करोड़ 30 लाख रुपए और राज्य सरकार की ओर से करीब 15 लाख रुपए का प्रावधान किया गया है. इससे गांव के बुनकरों को आधुनिक हथकरघे, सोलर लाईट व व्यक्तिगत वर्कशैड प्रदान किए जा रहे हैं.

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