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भारत संपन्न होगा तो विश्व भी संपन्न होगा – धर्मेन्द्र प्रधान

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नई दिल्ली. तीन दिवसीय ज्ञानोत्सव में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान जी ने कहा कि  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है. आने वाले 25 साल देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. हम दुनिया की ज़िम्मेदारी लेने वाले लोग हैं. भारत संपन्न होगा तो विश्व भी संपन्न होगा. विश्व का कल्याण करने वाला मानव बल भारत के पास है. NEP के कुशल और सफल क्रियान्वयन से हम अपनी वैश्विक जिम्मेदारी पूरा करेंगे. ज्ञानोत्सव का जो स्वरूप आज देखने को मिला है, उससे हम सब का आत्मविश्वास बढ़ा है. न्यास के ज्ञानोत्सव मॉडल और एकल प्रयोगों को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने और इंस्टिट्यूशनल फ़्रेमवर्क में लाने के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ. शिक्षा के सबसे प्रारंभिक चरण बाल वाटिका के पाठ्यक्रम की रूप रेखा का शुभारंभ हमने कर लिया है. ऐसे समय में हम सब की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

कहा कि प्रधानमंत्री जी ने कहा है भारत की हर भाषा राष्ट्रीय भाषा है. एनईपी में स्कूली शिक्षा के अंतर्गत प्रारम्भिक 3-8 वर्ष के बच्चों के लिए मातृभाषा में पढ़ने का प्रावधान किया गया है. स्थानीय भाषा में पढ़ाई भारतीय शिक्षा पद्धति का अप्लाइड आसपेक्ट है. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अगर हमें जन-जन तक पहुँचाना है तो हमें ग्लोसरी बनाना पड़ेगा. इससे एनईपी के सभी आयाम सहज रूप में लोगों तक पहुँच सकेंगे. न्यास जैसे सामाजिक संगठन और समाज ग्लोसरी बनाने का दायित्व लेगा, ऐसी मेरी अपेक्षा है.

ज्ञानोत्सव के दूसरे दिन भारत सरकार के शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार ने कहा कि “राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा का लक्ष्य आनंद प्राप्ति और विश्व का संरक्षण है. यह मानव मूल्य आधारित शिक्षा है. इस शिक्षा नीति की आत्मा में मानव की संपूर्ण शिक्षा है. यह क्लास रूम शिक्षा से ऊपर की शिक्षा है. इसमें प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण को समाहित किया गया है. इस नीति के क्रियान्वयन में समाज को स्वयं आगे आकर भूमिका निभानी चाहिए. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा शिक्षा नीति के क्रियान्वयन तथा आत्मनिर्भर भारत के लिए यह ज्ञानोत्सव आयोजित किया गया है. इसके प्रतिभागी भारतीय शिक्षा के नक्षत्र हैं. मैं न्यास का अभिनंदन करता हूं.”

शिक्षाविद डॉ. भूषण पटवर्धन ने कहा कि शिक्षण संस्थान वर्तमान समय में सभी “तुम से बड़ा मैं” की होड़ में लगे हुए हैं. शिक्षा की इस दौड़ से गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है. शिक्षा में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है. शिक्षक को प्रतिबद्धता के साथ चरित्रवान और मूल्य का संरक्षण होना जरूरी है. शिक्षा में मातृभाषा का प्रभाव उसकी संपूर्ण शिक्षा पर पड़ता है. देवभाषा संस्कृति ज्ञान और नवीनता की भाषा है.

दूसरे सत्र में उच्च शिक्षा संस्थानों द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नवाचारों को ज्ञानोत्सव में प्रस्तुत किया गया. चौधरी बंसी लाल वि. वि. के कुलपति डॉ. आरके मित्तल ने बताया कि हमने न्यास के साथ मिलकर भारतीय मूल्य दर्शन पर पंचकोश के सिद्धांत का पाठ्यक्रम निर्माण कर उसे विश्वविद्यालय में लागू किया है.

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