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सांची मेला में समाज विरोधी शक्तियों की घुसपैठ

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दीपक विश्वकर्मा

26 नवंबर को पुनः सांची के विश्व प्रसिद्ध महाबोधि महोत्सव में जाना हुआ. वैसे तो अब मेला अपना मूल स्वरूप खो चुका है, बौद्धों की जगह अब बुद्धुओं ने ले ली है. गौतम बुद्ध के गेरुआ वस्त्रों की जगह नीले, पीले, हरे, काले कपड़ों ने ले ली है. बस पहाड़ी के मंदिर को छोड़ दिया जाए तो गौतम बुद्ध से कहीं ज्यादा झंडे, डंडे, बैनर, पोस्टर, तस्वीर अब मार्केट में लॉन्च हो रहे नए-नए स्वयंभू भगवानों की मिलती हैं.

चहुंओर मतांतरण के लिए अपने-अपने स्टॉल लगाए बैठे एजेंट हर आगंतुक/पर्यटक में शिकार तलाशते हैं कि कब किसे उसके मूल धर्म से काटा जाए. बौद्ध गौण हो गए हैं, चहुंओर ओर बस हिन्दू घृणा का प्रसार करने बैठे तथाकथित नवबौद्ध ही मिलेंगे, वियतनाम, चीन, सिंगापुर, जापान, श्रीलंका से आए बौद्ध श्रद्धालुओं को यह नौटंकी समझ नहीं आती कि यह क्या चल रहा है, और वह अपना सारा दिन उस पहाड़ी पर ही गुजारते हैं, शाम को उतरकर सीधे अपने होटल.

कभी दोनों के सामने बैठकर बुद्धिज्म समझिए तो आप कंफ्यूज हो जाएंगे कि कौन से बौद्ध असल हैं और कौन नकली. एक वो बौद्ध जो सत्य, करुणा, अहिंसा को धर्म कहते हैं. दूसरे भारत के ही अन्य राज्यों से आए जो केवल कुंठा, घृणा, विघ्न संतोषी होकर हिन्दू धर्म निंदा का कार्य प्रसार करते हैं. यहां देश के कुछ हिस्सों से आने वाले नए-नए बौद्ध बने लोग कुछ और ही बुद्धिज्म बताएंगे, उन्हें बस तथाकथित ब्राम्हणवाद से मुक्ति चाहिए. ब्राम्हणवाद, मनुवाद.

एक किसी तथाकथित मूल निवासी संगठन के मुखिया से बात हुई, उन्हें भी मनुवादी धर्म से मुक्ति चाहिए थी. चर्चा में बताते हैं कि शम्बूक सत्य है और राम मिथ्या हैं. कहते हैं कि देश, उसका संविधान, उसका सम्मान खतरे में है. इसलिए मूर्ति पूजा छोड़िए, राम, कृष्ण को त्यागिए, धर्म त्यागिए और ऐसा करने से देश बच जाएगा.

कुछ बहनजियों का भी स्टॉल था. जहां महिलाओं को आज़ादी बांटी जा रही थी, मुक्ति के उपाय बताए जा रहे थे. मंगलसूत्र उतारिए, मांग का सिंदूर पोंछिए, कानों की बालियां छोड़िए, इत्यादि और मिल गई मुक्ति. यह बात अलग थी कि उन बहन जी ने स्वयं गले में माला, कान में बाला पहने हुए थे. और आखिर में हम वहां पहुंच ही गए, जहां इन सबको एक दिन पहुंचना है “इस्लाम दर्शन केंद्र”. आख़िरकार नवबौद्धों को एक रोज यहीं तो आना है. खान चिच्चा भोपाल से पहली बार यहां आए हैं अपना स्टॉल लगाने. अमन, भाईचारे की दर्जनों किताबें उनके स्टॉल पर थीं.

हर साल के साथ यहां विधर्मियों के स्टॉल बढ़ते जा रहे हैं. इस बार तो आश्चर्य था कि मुख्य स्तूप के पास भी 2-4 शांतिप्रिय लोग चाय/नाश्ते सहित अन्य सामानों का स्टॉल लगाए बैठे थे. हालांकि यह पता नहीं चल सका कि उन्हें शासन/प्रशासन ने अनुमति दी है या उनका अपनी कोई जुगाड़ है.

जहाँ कभी बुद्धम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि के उद्घोष होते थे. आज वहां चहुँओर बस जय भीम, जय भीम, जय भीम सुनाई पड़ता है. शनैः शनैः यहां भी भीम के साथ मीम को जोड़ने की शुरुआत हो गई है.

विदिशा, रायसेन में दर्जनों हिन्दू संगठन हैं, लेकिन किसी की सामान्य बुद्धि यह नहीं सोच पाती कि वह भी एकाध स्टॉल यहां लगा सकें. भोजन न सही पानी की छबील लगा लें, कम से कम यह जहरीले जीव कुछ तो नियंत्रित होंगे.

एक दिक्कत यह भी है कि इनमें से अधिकांशतः लोगों ने बाबा साहब के विषय में बहुत पढ़ा है, लेकिन कभी बाबासाहेब को नहीं पढ़ा है. वो आपको बाबा साहब रचित 2-4 पुस्तकों के भी नाम नहीं बता पाते. बमुश्किल दर्जनों किताब स्टॉलों में से एक पर बाबा साहब की “पाकिस्तान अथवा भारत विभाजन देखने को मिली.” यहां केवल बाबा साहब के कथित शोषण पर आधारित या हिन्दू विरोध पर आधारित साहित्य ही आपको देखने, खरीदने, पढ़ने को मिलेगा.

इनकी बुद्धि को जड़ कर दिया जाता है, जिन्हें यह जय भीम का उद्घोष करते हुए गरियाते हैं, उन्हें नहीं पता कि बाबासाहब की शिक्षा के खर्च से लेकर उनको सरनेम तक उन्हीं वर्गों, जातियों ने दिया, जिन्हें यह पानी पी-पी कर कोसते हैं. बाबा साहब तब भी छले गए थे, और आज भी लगातार छले ही जा रहे हैं.

बाबा साहब के नाम पर देश, समाज तोड़ने का षड्यंत्र यहां जोरों पर चलता है.

आपके आंखों के सामने पर्दा डालकर आए हुए बाहरी लोग यहां घूमने आने वाले लोगों के कान में जहर घोलते हैं. एक भंते बताते हैं कि अयोध्या का असल नाम साकेत है, साथ ही सरयू का नाम सरयू इसलिए हुआ कि वहां पुष्यमित्र ने निर्दोष बौद्ध भिक्षुओं के सर से उसे पाट दिया था. इस तरह उस नदी का नाम सरयू होता है.

जबकि आप वहां ऊपर पहाड़ी पर पुरातत्व विभाग के लेखों में पाएंगे कि अशोक के इन अपूर्ण निर्माणों को शुंग वंशियों ने ही पूर्ण कराया. ऊपर मुख्य स्तूप के बाएं ओर सीढ़ीयां चढ़ने पर आपको एक बुद्ध प्रतिमा मिलती है जो जनेऊ धारण किए हुए है.

यह मात्र एक प्रतिमा नहीं जीता जागता सत्य है. क्योंकि कहा जाता है कि बुद्ध ने न कभी जनेऊ त्यागा ओर न ही तिलक. और जहां सच है, वहां झूठ ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकेगा. इसलिए संभव है कि यह झूठे लोग शायद ही इस मूर्ति को ज्यादा दिनों तक सांची में सुरक्षित रहने दें.

आगामी 5-6 फरवरी को पुनः कुछ बौद्ध संगठन यहां कोई सम्मेलन करने वाले हैं. बताया गया कि 5 फरवरी, 1950 को बाबासाहब सांची आए थे. इसी निमित्त हम यह कार्यक्रम कर रहे हैं.

यह है हमारी इस बार की मेला यात्रा.

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