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बलूचिस्तान में चीन-पाक का अमानवीय चरित्र उजागर हुआ

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सूर्यप्रकाश सेमवाल

वर्ष 2015 में चीन क राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पाकिस्तान यात्रा के दौरान शुरू हुआ महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चीन -पाकिस्तान आर्थिक गलियारा-सीपैक आतंक, असुरक्षा, प्रबल जनविरोध के चलते पूर्ण होना तो दूर  अनहोनी की आशंका से जूझ रहा है.

62 अरब डॉलर के सीपैक प्रॉजेक्ट के अंतर्गत दोनों मुल्कों में हुई सहमति के अनुसार चीन पीओके, बलूचिस्तान, पाकिस्तान से होकर चीन के शिनजिआंग प्रांत तक सड़क बनाएगा और इसकी सहायता से अरब सागर के ग्वादर बंदरगाह तक चीन कनेक्टिविटी को बढ़ाने की कोशिश करेगा. साम्राज्यवादी चीन ने इस प्रोजेक्ट के बदले पाकिस्तान में बंदरगाह, सड़कों, पाइपलाइन्स, दर्जनों फैक्ट्रियों और सबसे बड़े हवाई अड्डे के निर्माण का सपना दिखाया था.

कायदे से ग्वादर में यह नया एयरपोर्ट आज से तीन वर्ष पूर्व अर्थात् 2018 में ही तैयार हो जाना चाहिए था. लेकिन अभी तो चहल पहल के बजाय यहां सन्नाटा पसरा हुआ है. सीपैक प्रॉजेक्ट्स का एक-तिहाई से भी कम काम पूरा हुआ है और पाकिस्तान सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि अभी तक लगभग 19 अरब डॉलर ही खर्च हुए हैं.

6 साल पहले जिनपिंग द्वारा दिए इस गिफ्ट में पाकिस्तान के दो -दो प्रधानमंत्रियों के साथ, उनके प्रिय मंत्रियों और सेना अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के खूब आरोप लगे. आरोपों की जद में वर्तमान पीएम इमरान खान आए, वहीं पूर्व पीएम नवाज शरीफ तो जेल की सजा भी काट चुके हैं.

बलूचिस्तान के बलूच नागरिक वर्षों से पाकिस्तानी सरकार और यहाँ की सेना पर बलूचों के उत्पीड़न, अत्याचार और अमानवीय भेदभाव का गंभीर आरोप लगाते रहे हैं. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान से मुक्ति का बलूचों का मुखर विरोध और तीव्र आन्दोलन पूरी दुनिया के सामने है.

पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता करीमा बलोच को 2016 में कनाडा जाना पड़ा और वहाँ वो रिफ्यूजी की तरह रह रही थीं. वह बलूचों की सबसे मजबूत और लोकप्रिय आवाज मानी जाने लगीं.

करीमा बलोच कनाडा में मृत पाई गईं. करीमा का शव टोरंटो के पास हर्बर फ्रंट में मिला, उनकी हत्या का आरोप सीधे तौर पर पाकिस्तानी सरक़ार, सेना और पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी ISI पर लगा. पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक फतह ने भी इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ होने का दावा किया.

2016 में रक्षाबंधन पर करीमा बलोच ने सोशल मीडिया में एक वीडियो पोस्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना भाई बताया और उनसे बलोच लोगों की आवाज बनने की अपील की थी. इस पोस्ट के बाद पाकिस्तान ने करीमा समेत तीन बलोच नेताओं पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश के आरोप में केस दर्ज किया था.

मई 2019 में पाकिस्तान को बलूच विद्रोहियों की ताकत को तब स्वीकार करना पड़ा जब ग्वादर में पाकिस्तानी सेना की मनमानी और निर्माण कार्य से जुड़े चीनी नागरिकों के हस्तक्षेप से तंग आकर बलूच विद्रोहियों ने शहर के एकमात्र पंचतारा होटल में कब्जा करके पांच लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

ग्वादर क्षेत्र बलूचिस्तान प्रांत में ही आता है, जहाँ लगातार चीन के इस प्रोजेक्ट का स्थानीय बलूच नागरिकों द्वारा प्रचंड विरोध किया जा रहा है. स्थानीय बलूचों ने कई बार चीन के इंजीनियरों और प्रोजेक्ट से जुड़े कामगारों पर हमला किया और इनकी सुरक्षा में लगे पाकिस्तानी सैनिकों को भी निशाना बनाया है.

करीमा की हत्या के बाद नियाजी खान की सरकार बलूचिस्तान में बढ़ रहे जनाक्रोश से इतनी भयभीत हुई कि करीमा बलोच का शव भी उनके परिजनों के हवाले नहीं किया. अब पाकिस्तान के अन्दर बलूच विद्रोह को कुचलने के लिए चीन की भूमिका का किसी और ने नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के एक जनरल ने ही चौंकाने वाला खुलासा किया है.

पाकिस्तान सेना के एक जनरल अयमान बिलाल ने कहा कि पाकिस्तान में बलूच आजादी आंदोलन को कुचलने के लिए चीन ने उन्हें छह महीने का काम दिया है. बांग्लादेशी अखबार द डेली सन को दिए बयान में बिलाल ने कहा कि चीन ने मुझे वेतन और बड़ी राशि का भुगतान किया है और मुझे आधिकारिक तौर पर अपने क्षेत्रीय हितों के लिए और सीपैक के खिलाफ ईरान की साजिशों को विफल करने के लिए यहां तैनात किया है, क्योंकि यह क्षेत्रीय हितों में एक तरह का निवेश है. बेशक चीन का सीपैक प्रोजेक्ट बढ़े या न बढ़े, इससे दोनों देशों का अमानवीय चरित्र भी उजागर हुआ है, मानवाधिकार के दुश्मनों का चेहरा बेनकाब हो रहा है.

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