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भारत को तोड़ने वाली ताकतों व साजिशों को सामने लाना आवश्यक

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इंदौर. नर्मदा साहित्य मंथन – भोजपर्व के दूसरे दिन का प्रारम्भ माँ वाग्देवी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ. प्रथम सत्र में “भोजशाला एक स्थापित विश्वविद्यालय” विषय पर सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता एवं भारतीय पुरातत्व संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. धर्मवीर जी शर्मा ने सत्र को संबोधित किया.

उन्होंने कहा कि हमारी समृद्धि का प्रमाण यह है कि सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भारतीय लोग मेसोपोटामिया की सभ्यता में व्यापार करते थे. वहां मेहलुआ से लोग मेसोपोटामिया आते थे, उनका मानना है कि ये मेहलुआ ही आज के समय का मालवा है.

महाराजा विक्रमादित्य साहित्य संकलन के लिए अपने राज्य में गोष्ठी आयोजित करते थे, ये साहित्य मंथन भी इसी प्रकार का आयोजन है. भोजशाला ही नहीं पूरे भारत में मुग़लों ने पुरातत्व महत्व के अनेक स्मारक तोड़े और उनसे मस्जिद का निर्माण किया. कुबुम मीनार 25° दक्षिण में झुकी हुई है. इसके नीचे 64 फ़ीट का अधिष्ठान है. मीनार में 27 झरोखे हैं, जिससे 27 नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता था. कुतुब मीनार महाराजा विक्रमादित्य द्वारा बनाई गई वेधशाला है.

मुग़ल शासकों द्वारा विध्वंस करके ही मस्जिदें बनाई हैं. व्यापक शोध और खुदाई से तथ्य संकलित करें तो ये प्राप्त होगा कि ये हिन्दू मंदिर और पाठशाला, गुरुकुल, विश्वविद्यालय ही होंगे. उन्होंने साहित्यकारों एवं विद्यार्थियों को पुरातत्व शोध के लिए आगे आने का आह्वान किया ताकि भारत का स्वाभिमान स्थापित किया जा सके.

द्वितीय सत्र में वरिष्ठ लेखक एवं विचारक प्रशांत पोल ने “सांस्कृतिक धरातल पर भारत को बांटने के प्रयास” विषय पर संवाद स्थापित किया. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ अंग्रेजों ने यह विमर्श स्थापित करने का प्रयास किया कि भारत कभी एक था ही नहीं और इस अंग्रेज़ी मानसिकता को स्थापित करने में वो सफल भी रहे. भिन्न भाषाओं के लोग एक साथ नहीं रह सकते, इस आधार पर आगे चलकर हमारे राज्यों को बांटा गया.

समाज को तोड़ने के प्रयास लगातार जारी हैं. वर्तमान समय में भारत के विरोध में एक नैरेटिव चल रहा है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं. यह देश को बांटने वाले कारक हैं. भारत को तोड़ने की साजिशें हैं. इन्हें सामने लाना जरूरी है. वर्तमान समय में संस्कृति की रक्षा बहुत आवश्यक है. युवा इसके लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं. उन्होंने कहा कि हम अंग्रेजी सभ्यता के मानसिक गुलाम हो रहे हैं. इसे बदलने की जरूरत है. भारत को तोड़ने के जो प्रयास हो रहे हैं, उनसे बचने के लिए हमें जनजागरण की आवश्यकता है.

तृतीय सत्र में ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने “वामपंथ का कलुष” विषय पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश विचारधारा को बढ़ाने का कार्य वामपन्थ ने किया है. भारत के विभाजन पर अधिकृत रूप से रिज़ोल्यूशन लाने का कार्य मुस्लिम लीग के बाद अगर किसी पार्टी ने किया तो वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया थी. देश के टुकड़े-टुकड़े का विचार मूलतः वामपन्थ का रहा है. समाज में मुस्लिम विचार को स्थापित करने का काम बॉलीवुड का कर रहा है. इस्लाम को सनातन से बेहतर दिखाकर इस्लाम के प्रति आदर दिखाना एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा रहा है. ताकि हमारे युवाओं में हिन्दू धर्म के प्रति आस्था कम हो.

उन्होंने युवाओं से कहा कि भूगोल को इतिहास के पन्नों से देखना शुरू करना होगा. इस्लाम और क्रिश्चनिटी कहां-कहां कब-कब आए और इन्होंने संस्कृति को कैसे खत्म किया, इसके प्रमाण मिलने लगेंगे. भारत पूरे विश्व में अकेली ऐसी धरती है, जिसमें सर्वधम को मानने या ना मानने का अधिकार है, यह भारत की ताक़त है. हम सनातन धर्म को मानने वाले हैं, हम हिंसा के रास्ते से चलने वाले लोग नहीं हैं.

चौथा सत्र “भारतीय संविधान -भारतीय संस्कृति का दर्पण” विषय पर केंद्रित रहा. जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संविधान विशेषज्ञ डी.के. दुबे ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्माण का आधार अर्थव्यवस्था है. इसलिए उनके संविधान आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं, जबकी हमारे संविधान का विचार समग्र और व्यापक रूप से करके ही इसका निर्माण किया गया. भारत एक ऐसा देश है, जिसमें संसार के किसी भी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा भाषाएं व प्राकृतिक संसाधन हैं.

भारत को एक सूत्र में बांधना किसी भी कानून का उद्देश्य होना चाहिए. महाभारत काल में भी महिला अधिकार की बात हुई है, इस तरह की बातों को आधार बनाकर संविधान में महिलाओं को लेकर कानून बनाए गए. समाज के अंदर हम अपनी जिम्मेदारियों को कैसे देखते हैं, उसके आधार पर भारत का भविष्य तय होगा.

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