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जबलपुर – सेवाभारती मातृछाया शिशुगृह

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जिनका कोई नहीं, उनका भगवान होता है. यह हम सबने सुना है, देखा और महसूस भी किया होगा. लेकिन जन्म होते ही जिन्हें कचरे में फेंक दिया गया हो, अस्पतालों के पास छोड़ दिया गया हो, रेलवे स्टेशन, ट्रेन की बोगी और बस स्टैंड की सुनसान गलियों में डाल दिया गया हो, उन मासूम बच्चों के लिए मातृछाया शिशुगृह किसी वरदान से कम नहीं है. या यूं कहें कि भगवान से कम नहीं है, तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी. क्योंकि यहां निस्वार्थ भाव से, जाति-धर्म से परे होकर शून्य से छह वर्ष तक के बेसहारा नवजात, अबोध एवं परित्यक्त शिशुओं को नया जीवन दिया जाता है. उन्हें अच्छी परवरिश, शिक्षा और सुरक्षा के साथ नया परिवार भी दिया जाता है.

सेवा भारती द्वारा संचालित मातृछाया शिशुगृह में अब तक 363 बच्चे प्रवेशित हुए हैं. जिनमें से 250 को अलग-अलग प्रदेशों में तथा 21 बच्चों को फ्रांस, इटली, स्पेन, यूएसए, न्यूजीलैंड आदि देशों में पात्र दंपत्तियों को गोद दिया जा चुका है. यह वही बच्चे हैं, जिनको उनके जैविक माता-पिता द्वारा कचरे की भांति यहां-वहां छोड़ दिया गया था. अब वह देश और विदेश में ठाठ से जीवन जी रहे हैं.

वर्तमान में मातृछाया शिशुगृह में चार बच्चे हैं. जिनमें से एक बच्चे को गोद देने की प्रकिया चल रही है. मातृछाया के प्रबंधक देवेश श्रीवास्तव ने बताया कि संस्थान द्वारा बच्चों का दत्तगृहण, केंद्रीय दत्तगृहण अभिकरण संसाधन (कारा) के माध्यम से निर्धारित की गई गाइडलाइन के तहत किया जाता है. यह प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन है. जिसमें पंजीकृत दंपती को संपूर्ण प्रक्रिया का पालन करने के बाद बच्चा सौंपा जाता है.

सेवा भारती जबलपुर द्वारा संचालित मातृछाया की संकल्पना एक ऐसे शिशु संरक्षण गृह के रूप में की गई है. जहां नवजात, अबोध, परित्यक्त, अनाथ, अभ्यर्पित, देखरेख व संरक्षण की आवश्यकता वाले शिशुओं के पालन पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा की सभी आवश्यकताओं को एक छत के नीचे सुनिश्चित किया जाता है. यह मध्यप्रदेश शासन महिला बाल विकास विभाग से मान्यता प्राप्त है.

मातृछाया में कहीं भी बेसहारा मिले नवजात से लेकर छह वर्ष तक के बच्चों को बाल कल्याण समिति एवं चाइल्ड लाइन के माध्यम से प्रवेशित किया जाता है. इसके बाद बच्चों का (कारा में) पंजीयन होता है. बाल कल्याण समिति तय समय में बच्चों को विधिमुक्त करती है और न्यायालय के आदेश पर (कारा) पंजीकृत देश-विदेश के दत्तक माता-पिता को बच्चा गोद दिया जाता है. गोद देने के बाद निर्धारित अवधि तक दत्तक माता-पिता से बच्चों की संपूर्ण जानकारी ली जाती है.

विजयनगर स्थित मातृछाया में बच्चों की संपूर्ण सुरक्षा एवं जरूरतों को पूरा करने के जिए विशेष प्रबंध किए गए हैं. संचालन प्रमुख संदीप पाठक, अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ठाकुर, सचिव दामोदर प्रसाद दुबे, कोषाध्यक्ष विनोद मिश्रा, संस्थापक सदस्य मुकेश तिवारी एवं सदस्य किशोर नागरानी द्वारा बच्चों की सुरक्षा के लिए संपूर्ण परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं.

छह से आठ महिलाएं बच्चों का हर समय ध्यान रखती हैं. पूरे परिसर में अग्निशमन स्वचालित यंत्र लगाए गए हैं. सुरक्षा के लिए तीन गार्ड तैनात हैं. परिसर में ही बच्चों के खेल-खिलौने की व्यवस्था है. चिकित्सकीय परामर्श के साथ प्रतिदिन का पौष्टिक आहार दिया जाता है. बीमार बच्चों का समुचित उपचार कराया जाता है. तीन वर्ष का होने पर स्कूल में प्रवेश दिलाया जाता है. इसके लिए पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग की मदद ली जाती है.

प्रबंधक देवेश श्रीवास्तव ने बताया कि इस वित्तीय वर्ष में एक अप्रैल से लेकर अब तक आठ बच्चों को देश के अलग-अलग प्रांतों में दत्तक माता-पिता को सौंपा गया है. एक बच्चे को विदेश में दत्तक माता-पिता के सुपुर्द किया गया है. वहीं पांच बच्चों का पारिवारिक पुनर्वास करते हुए उनके माता-पिता का पता लगाकर सौंपा गया है.

अब तक प्रवेशित बच्चे

बालक – 147

बालिका – 220

कुल प्रवेशित बच्चे – 363

देश में गोद दिए गए बच्चे

बालक – 93

बालिका -157

कुल – 250

विदेश में गोद दिए गए बच्चे

बालक – 6

बालिका – 15

कुल – 21

सुरेंद्र दुबे शास्त्री

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